SDG 4 क्या है?

संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की आम सभा ने साल 2015 में सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) का प्रस्ताव पारित किया। यूएनओ के सदस्य सभी देशों ने एसडीजी के 17 लक्ष्यों के मुताबिक काम करने की घोषणा किया। इन लक्ष्यों को साल 2030 तक प्राप्त करना है और इसके लिए कुछ विशिष्ट उदेश्य तय किये गये हैं। 17 सतत् विकास लक्ष्यों की कड़ी में चौथे लक्ष्य की चर्चा करेंगे। यह लक्ष्य ‘समावेशी और समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना और सबके लिए आजीवन सीखने के अवसरों’ के प्रोत्‍साहन को समाहित करता है।

एसडीजी 4 को 2015 से 2030 के बीच प्राप्त करने के लिए कुछ उदेश्य तय किये गये हैं। ये उदेश्य शिक्षा के क्षेत्र में मौजूदा समस्याओं का समाधान करने में कारगर होंगे, नीति-नियंताओं के लिए ये प्रमुख बिंदु सहायक हैं। ये इस प्रकार हैं-

2030 तक सुनिश्चित करना कि सभी लड़कियां और लड़के मुफ्त, बराबर और उत्‍तम प्राइमरी और माध्‍यमिक शिक्षा पूरी कर लेंजिससे उपयुक्‍त और लक्ष्‍य 4 के लिए प्रभावकारी सीखने के परिणाम हासिल हो सकें

सुनिश्चित करना कि सभी लड़कियों और लड़कों को बचपन के प्रारंभ में उत्‍तम विकास, देखभाल और प्राइमरी पूर्व शिक्षा सुलभ हो जिससे वे प्राइमरी शिक्षा के लिए तैयार हो सकें

2030 तक सुनिश्चित करना कि सभी महिलाओं और पुरुषों को किफायती और गुणवत्तापूर्णतकनीकी, व्‍यावसायिक और स्‍नातक/स्‍नातकोत्‍तर शिक्षा, विश्‍वविद्यालय सहित बराबरी के आधार पर सुलभ हो

2030 तक ऐसे युवाओं और वयस्‍कों की संख्‍या में काफी हद तक वृद्धि करना जिनके पास रोजगार, अच्‍छी नौकरीतथा उद्यमिता के लिए तकनीकी और व्‍यावसायिक कौशल सहित उपयुक्‍त कौशल हों

2030 तक शिक्षा में लड़कियों और लड़कों के बीच विषमता पूरी तरह समाप्‍त करना और विकलांग व्‍यक्तियों,मूल निवासियों और संकट की परिस्थितियों में घिरे बच्‍चों सहित लाचार लोगों के लिए शिक्षा और व्‍यावसायिक प्रशिक्षण के सभी स्‍तरों तक समान पहुंच सुनिश्‍चित करना

2030 तक सुनिश्चित करना कि सभी युवा और पुरुषों तथा महिलाओं सहित काफी बड़े अनुपात में वयस्‍क साक्षर हो जाएं और गणना करना सीख लें

2030 तक सुनिश्चित करना कि सीखने वाले सभी लोग सतत् विकास को प्रोत्‍साहित करने के लिए आवश्‍यक ज्ञान और कौशल प्राप्‍त कर लें। इसमें अन्‍य बातों के अलावा सतत विकास और टिकाऊ जीवन शैली, मानव अधिकारों, जैंडर बराबरी, शांति की संस्‍कृति और अहिंसा को प्रोत्‍साहन, वैश्विक नागरिकता,सांस्‍कृतिक विविधता की समझ और सतत विकास में संस्‍कृति के योगदान के बारे में शिक्षा प्राप्‍त करना शामिल है

ऐसी शिक्षण सुविधाएं बनाना और उन्‍नत करना जो बालक, विकलांगता और जेंडर संवेदी हों तथा सबके लिए सुरक्षित, अहिंसक, समावेशी और असरदार सीखने का माहौल प्रदान कर सकें

2020 तक दुनिया भर में विकासशील देशों, खासकर सबसे कम विकसित देशों, छोटे द्वीपीय विकासशील देशों और अफ्रीकी देशों के लिए उपलब्‍ध छात्रवृत्तियों की संख्‍या में उल्‍लेखनीय विस्‍तार करना जिससे इन देशों के लोग व्‍यावसायिक प्रशिक्षण, सूचना एवं संचार टैक्‍नॉलॉजी, तकनीकी, इंजीनियरिंगऔर वैज्ञानिक कार्यक्रमों में विकसित देशों तथा अन्‍य विकासशील देशों में उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त कर सकें

2030 तक दक्ष शिक्षकों की आपूर्ति में उल्‍लेखनीय वृद्धि करना। इसके लिए विकासशील देशों, विशेषकर सबसे कम विकसित देशों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों में शिक्षक प्रशिक्षण के लिए अंतरराष्‍ट्रीय सहयोग जुटाना शामिल है


भारत में शिक्षा की स्थिति में सुधार करना समय की सबसे बड़ी मांग है। इसके लिए शिक्षा के क्षेत्र में बजट बढ़ाने के साथ आवंटित बजट को व्यवहारिक जरूरतों के मुताबिक खर्च करना सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसके अलावा समावेशी शिक्षा की जरूरतों पर ध्यान देते हुए ढ़ांचागत विकास और शिक्षा का विस्तार प्रमुख उदेश्य होना चाहिए। क्योंकि भारत में शिक्षा क्षेत्र के आंकड़े बेहद निराशाजनक है। जबकि वैश्विक आंकड़ें भारत से कहीं बेहतर हैं। शिक्षा पर खर्च का वैश्विक औसत जीडीपी औसत 4.7 फीसद है। अमेरिका अपनी जीडीपी का 5.6 फीसद शिक्षा पर खर्च करता है। जबकि नार्वे और क्यूबा जैसे छोटे देश अपनी जीडीपी का क्रमशः 7 और 13 फीसद शिक्षा पर खर्च करते हैं। भारत के समान अर्थव्यवस्था वाले देश ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका दोनों शिक्षा पर अपनी जीडीपी का 6 फीसद के करीब खर्च करते हैं।

भारत में जहां एक तरफ शिक्षा के क्षेत्र में बजट काफी कम है, वहीं इसका वितरण भी काफी असमान सा है। यही कारण है कि भारत की प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालयीय शिक्षा बेहद नाजुक स्थिति में है। बजट के असमान वितरण के अलावा एक और समस्या यह है कि शिक्षा के क्षेत्र में जितना बजट प्रस्तावित किया जाता है, उतना खर्च नहीं हो पाता। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की एक रपट के अनुसार, पिछले 10 सालों में 8 बार ऐसा मौका आया जब शिक्षा पर प्रस्तावित बजट खर्च नहीं हो सका। इस रिपोर्ट के अनुसार 2014 से 2019 के दौरान लगभग 4 लाख करोड़ रुपये प्रस्तावित बजट शिक्षा के क्षेत्र में खर्च नहीं हो सका।

हालांकि, भारत सरकार अपने विभिन्न कार्यक्रमों और पहलों के साथ सामंजस्य स्थापित करने और अपनी समस्याओं के समाधान को मजबूत बनाने के लिए कई उपाय किये हैं। मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान शिक्षा के क्षेत्र में प्रभावी कदम के रूप में सामने आए। अगर हम इन योजनाओं को देखें, तो हम पाएंगे कि ये 2014 से चरणों में शुरू की गई थीं, लेकिन सामान्य लक्ष्य के साथ नौकरियों के लिए उद्यमशीलता को बढ़ावा देना है। जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उदेश्यों के अनुसार काम करते नजर आएंगे। अगर हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति के दस्तावेज़ देखें, तो स्कूल और उच्च शिक्षा में कौशल शिक्षा को प्रमुख महत्व दिया जाता है। यह प्री-स्कूल से कक्षा 12 वीं तक स्कूल स्तर पर प्रेरित किया जाना है और इसका उद्देश्य प्रत्येक छात्र को एक व्यावसायिक कौशल में सशक्त बनाना है। उच्च शिक्षा के लिए जारी, इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात को 26.35 फीसद (2018) से 2035 तक 50 फीसद तक बढ़ाना है। संबंधित नियामक निकाय- रूपरेखा निर्धारित करने के लिए व्यावसायिक शिक्षा के एकीकरण के लिए एक राष्ट्रीय समिति का गठन किया जाएगा।

इकोनॉमी बूस्टर
इकोनॉमी बूस्टर के रूप में शिक्षा राष्ट्रीय शिक्षा नीति की धारा 17 सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने, उच्च शिक्षा में जीईआर बढ़ाने, अधिक से अधिक युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए ज्ञान अर्थव्यवस्था पर जोर देती है। उच्च शिक्षा, राष्ट्र के निर्माण और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की आकांक्षा रखने वाले प्रतिभावान और कुशल युवाओं का एक पूल बनाना, प्रौद्योगिकी समाधानों को बढ़ावा देना। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए 6 फीसद की जीडीपी का निवेश किया जाएगा। चूकि ज्ञान अर्थव्यवस्था का समाज से संबंध होता है, इसलिए इससे सामाजिक-आर्थिक सुधारों की बहुलता होती है। व्यावसायिक अध्ययन और वित्त पोषण के माध्यम से समर्थन पर तनाव, ऊष्मायन कैंटर उद्यमशीलता के माध्यम से अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने को मजबूत करते हैं।


शिक्षकों को नवीनतम तकनीक और शिक्षा पद्धति से लैस करना होगा
शिक्षकों को नवीनतम तकनीक और शिक्षा पद्धति से लैस करना कई पहलें हैं जो विशेष रूप से स्कूल और उच्च शिक्षा में शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए शुरू की गई हैं। प्रत्येक जिले में राष्ट्रव्यापी एजेंसियों और केंद्रों की मदद से उन्हें डिजिटल तकनीक में प्रशिक्षित करना है। इसमें शिक्षकों को उद्योग में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए उच्च पारिश्रमिक का भी उल्लेख किया गया है। मुख्य अन्य विकास बी.एड के माध्यम से शिक्षा में पाठ्यक्रम शुरू कर रहा है और आकांक्षी प्रोफेसरों के लिए पीएचडी नामांकन के दौरान शिक्षण शिक्षण में एक अनिवार्य प्रमाणित शिक्षा है। एक अच्छा शोध छात्र एक अच्छा शिक्षक भी नहीं हो सकता है। उन्हें ज्ञान हस्तांतरण की पद्धति और साधनों पर शिक्षित होने की आवश्यकता है इसलिए यह एक बहुत ही आशाजनक कदम है।

यूनेस्को की महानिदेशक इरीना बोकोवा कहती हैं कि विश्व को युवाओं की ऊर्जा का दोहन करने की जरूरत है क्योंकि दुनिया के देश एमडीजी से एक सतत विकास के एजेंडे को अपनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। उन्होंने आगे कहा, 2030 में जब तक हम एसडीजी की समय सीमा तक पहुंचेंगे, युवाओं की आबादी में 7 फीसद की वृद्धि हो गई होगी। इसलिए यह बात महत्वपूर्ण है कि अगर हम इन लक्ष्यों को हासिल करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं तो हमें इनको अभी शामिल करना होगा।

भारत और लक्ष्‍य 4
भारत में प्राइमरी शिक्षा सर्व सुलभ कराने में उल्‍लेखनीय प्रगति हुई है। प्राइमरी और प्रारंभिक दोनों स्‍तर के स्‍कूलों में लड़कियों की भर्ती और शिक्षा पूरी करने में सुधार हुआ है। 2013-14 तक लड़के और लड़कियों के लिए प्राइमरी शिक्षा में शुद्ध भर्ती दर 88 फीसद थी, जबकि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर युवा साक्षरता दर लड़कों के लिए 94 फीसद और लड़कियों के लिए 92 फीसद थी। नई राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति और सतत् विकास लक्ष्‍य 4, दोनों का उद्देश्‍य सबके लिए उत्‍तम शिक्षा और आजीवन सीखने की सुविधा देना है। सरकार की प्रमुख योजना सर्व शिक्षा अभियान का उद्देश्‍य सभी भारतीयों के लिए सर्व सुलभ उत्‍तम शिक्षा प्रदान करना है और इस प्रयास में पोषाहार संबंधी समर्थन उच्‍चतर शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण के बारे में लक्षित योजनाओं से सहारा मिलता है।

Read more : SDG 3 : स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करना जरूरी
सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव के लिए कई प्रयास किये हैं जो पिछले आधे दशक में घोषित किये गये हैं। ये कदम समावेशी शिक्षा और सतत् विकास लक्ष्यों की दिशा में सहयोगी होंगे। सरकार की कुछ प्रमुख योजनाएं जो इस प्रकार हैं-

मेक इन इंडिया : मेक इन इंडिया भारत सरकार द्वारा 25 सितंबर 2014 को देशी और विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में ही वस्तुओं के निर्माण पर बल देने के लिए बनाया गया है। अर्थव्यस्था के विकास की रफ्तार बढ़ाने, औद्योगीकरण और उद्यमिता को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन। भारत का निर्यात उसके आयात से कम होता है। बस इसी ट्रेंड को बदलने के लिए सरकार ने वस्तुओं और सेवाओं को देश में ही बनाने की मुहीम को शुरू करने के लिए भारत में बनाओ नीति की शुरुआत की थी।

स्किल इंडिया मिशन : स्किल इंडिया मिशन प्रधानमंत्री मोदी जी की सरकार में शुरू की गई एक योजना है। मोदी जी ने 15 जुलाई 2015 को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना की शुरुआत की थी और आज पूरे देश में स्किल इंडिया मिशन सरकारी योजना काम कर रही है। इस योजना को राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन नाम भी दिया गया है। यह सरकारी योजना कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है।

स्टार्टअप इंडिया : 16 जनवरी 2016 को भारत सरकार ने स्टार्टअप इंडिया योजना के लिए फंडिंग सहायता, मार्गदर्शन, और उद्योग भागीदारी के अवसर प्रदान करके भारत में स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप इंडिया योजना की शुरुवात की। स्टार्टअप इंडिया भारत सरकार द्वारा की गई एक पहल है, जिसका उद्देश्य अपने नागरिकों के बीच उद्यमशीलता की भावना को बढ़ावा देना और प्रोत्साहित करना है। इस पहल को शुरू करने का मतलब इसके माध्यम से बेरोजगारों के बीच रोजगार पैदा करना है।

आत्मनिर्भर भारत : आत्मनिर्भर भारत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भारत को एक आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने संबंधी एक दृष्टि (विजन) है। इसका पहली बार सार्वजनिक उल्लेख उन्होने 12 मई 2020 को किया था जब कोरोना-वायरस विश्व महामारी सम्बन्धी एक आर्थिक पैकेज की घोषणा किया जा रहा था। सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की है जो देश की सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 10 फीसद है।

आज विश्‍व के पास पहले से कहीं अधिक ज्ञान है। किन्‍तु हर व्‍यक्ति उसका लाभ नहीं उठा सकता। दुनिया भर में देशों ने सभी स्‍तरों पर शिक्षा की सुलभता बढ़ाने और स्‍कूलों में भर्ती दरों में वृद्धि करने में बहुत प्रगति की है तथा बुनियादी साक्षरता कौशल में भी जबरदस्‍त सुधार हुआ है। 15-24 वर्ष की आयु के युवा वर्ग में दुनिया भर में 1990 और 2015 के बीच साक्षरता सुधरी है। यह दर 83 फीसद से बढ़कर 91 फीसद हो गई है। प्राइमरी स्‍कूलों में शिक्षा पूरी करने वाले बच्‍चों की दरें भी 2013 तक 90 फीसद को पार कर गईं। इन तमाम सफलताओं के बावजूद अनेक कमियां बाकी हैं। गिने-चुने देशों ने ही शिक्षा के सभी स्‍तरों पर जैंडर समानता हासिल की है। इसके अलावा 5.7 करोड़ बच्‍चे अब भी स्‍कूलों से बाहर हैं और इनमें से आधे सहारा के दक्षिणी अफ्रीकी देशों में रहते हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सतत् विकास की बुनियाद है, इसीलिए सतत् विकास लक्ष्‍य की बुनियाद भी है। नीतिगत हस्‍तक्षेप के तौर पर शिक्षा, ताकत को कई गुणा बढ़ाने वाली शक्ति है, जो आत्‍मनिर्भरता देती है, कौशल में वृद्धि से आर्थिक वृद्धि बढ़ाती है तथा बेहतर आजीविका के लिए अवसर खोलकर लोगों के जीवन स्‍तर में सुधार करती है।

जैसा कि हम जानते हैं- साल 2030 के लिए सतत् विकास लक्ष्‍यों में सभी लड़के-लड़कियों की प्राइमरी और माध्‍यमिक शिक्षा पूरी कराना और हर किसी के लिए उत्‍तम एवं व्‍यावसायिक शिक्षा पाने के अवसर बराबरी के आधार पर सुलभ कराने की गारंटी देने का आह्वान किया गया है। नीतिगत उपायों से सुलभता और शिक्षा की गुणवत्‍ता सुधारने के साथ-साथ संबद्ध बाधाओं को भी हटाना होगा। साथ ही बजट आवंटन को बढ़ाना होगा और आवंटित बजट को भी पूरी तरह खर्च करना होगा, तभी शिक्षा के समावेशी विकास की ओर कदम मजबूती से बढ़ाया जा सकता है और अगले 10 सालों में सतत् विकास के चौथे लक्ष्य को भी प्राप्त किया जा सकेगा।