केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर लोकसभा में हाल में कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान देश का कोई भी बच्चा ऑनलाइन शिक्षा से वंचित नहीं रहा। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि सरकार ने इस दिशा में कई अहम कदम उठाए। जावडेकर ने ये भी दावा किया कि ऑनलाइन शिक्षा हासिल करने के मामले में भारत दुनिया के तमाम देशों से आगे है। बकौल मंत्री जी अब तो 5 साल के बच्चों की पढ़ाई से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक हर चीज ऑनलाइन हो गई हैं।  इसके अलावा वर्तमान समय में भारत में आनलाइन एजुकेशन के लिए 34 चैनल चल रहे हैं, जिनमें से 22 उच्च शिक्षा और 12 स्कूली शिक्षा दे रहे हैं।

आइए जानते हैं कि ऑनलाइन शिक्षा पर किए गए मंत्री जी इस दावें में कितनी सच्चाई हैं?

कोरोना महामारी जैसी वैश्विक आपदा के दुष्प्रभाव की वजह से देश के लगभग 32 करोड़ छात्र-छात्राओं को स्कूल-कॉलेज जाने से रोक दिया गया। जिसके बाद एक नई चुनौती बनकर सामने आई आया। ऑनलाइन शिक्षा हम आनलाइन शिक्षा को चुनौती इसलिए कह रहे हैं कि क्योंकि इसमें कई प्रकार की खामियां हैं। जिसको वर्तमान समय में दुरुस्त करने की जरूरत है। एक उदाहरण से समझिए।

दिल्ली विश्वविद्यालय ने हाल ही में निर्देश था कि वह अपने अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए ऑनलाइन ओपेन बुक परीक्षा आयोजित कराएगा। इसके लिए दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने एक सर्वे किया। जिसमें लगभग 50 हज़ार छात्रों ने हिस्सा लिया था। इसमें 85 फीसदी से अधिक बच्चे ऑनलाइन कक्षा, ऑनलाइन परीक्षा के लिए नकारात्मक जवाब दिया था। जब दिल्ली विश्वविद्यालय की हक़ीकत ऐसी है, तो देश के बाकी हिस्सों का अंदाजा आप लगा सकते हैं।

आंकड़े बतातें हैं कि वर्तमान समय में भारत में उच्च शिक्षा के लिए छात्र-छात्राओं की विश्वविद्यालय तक पहुंच की संख्या काफी कम है। भारत में उच्च शिक्षा में ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो महज़ 26 फीसदी ही है जो ज्यादातर देशों से कम है। इसी क्रम में द एनुअल स्टेट ऑफ एजुकेशन यानी असर 2018 की रिपोर्ट बताती है कि देश के ग्रामीण इलाकों में पांचवीं क्लास के आधे बच्चे ही दूसरी क्लास की किताबें पढ़ पाते हैं। सर्वे के दौरान सिर्फ 28 फीसदी बच्चे ही गुणा-भाग के सरल सवाल का हल निकाल सकें।

इंटरनेट की मौजूदा स्थिति भारत के डिजिटल इंडिया को कितना डिजिटल बना पाई है जिससे कि हमारे देश में छात्रों को ऑनलाइन शिक्षा आसानी से उपलब्ध हो पा रही हैं यह आपको इस आकड़ों से असानी से पता चल जयेगा।

हमारे देश मे इंटरनेट व सूचना तकनीकी की पहुंच अभी भी बेहद संकुचित है। नेशनल सैंपल सर्वे के 2017-18 के आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ 42 फीसदी शहरी और 15 फीसदी ग्रामीण घरों में इंटरनेट की सुविधा है। इसमें देश के सिर्फ दो राज्य ऐसे हैं, जहां ग्रामीण इलाकों के 40 फीसदी घरों में इंटरनेट सुविधा है। ये राज्य हैं हिमाचल और केरल। ग्रामीण विकास मंत्रालय 2017-18 एक सर्वे के मुताबिक भारत के 16 फीसदी घर ऐसे हैं, जहां एक से 8 घंटे तक ही बिजली मिल पाती है। वहीं 33 फीसदी घर ऐसे हैं, जिनको सिर्फ 9 से 12 घंटे ही बिजली मिलती है।

सर्वे में यह भी बताया गया कि भारत में अभी तक महज़ 11 फीसदी घरों में ही कंप्यूटर, लैपटॉप या टैबलेट जैसे डिवाइस उपलब्ध हो पाया हैं। यह आंकड़ा यह अंदाजा लगाने के लिए काफी है कि जिन बच्चों के पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है, वो लॉकडाउन की वजह से स्कूल-कॉलेज न खुलने से किस कदर पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं।

अगर सरकार की इंटरनेट योजना की करे, तो ग्रामीण भारत में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी की शुरुआत साल 2014 में किया गया था। जिसका लक्ष्य लक्ष्य ढाई लाख ग्राम परिषदों को आपस में कनेक्ट करना था, जिसके तहत छह लाख से ज़्यादा गांव आते हैं। इस योजना को पूरा करने का डेडलाइन मार्च 2019 रखा गया था। इसमें बड़ी समस्या यह है इस योजना को पूरा होने में अभी साल भर की देरी हैं।

हालांकि भारत सरकार ने ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अनेक कार्यक्रमों की शुरुआत की है मसलन पीएमईविद्या कार्यक्रम ,मल्टी-मोड डिजिटल, ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म टीवी चैनलों, कम्युनिटी रेडियो और पॉडकास्ट इत्यादि लेकिन इन सारी योजनाओं को मध्य में रखकर एक बात पर गौर करेंगे, तो इन योजनाओं की बुनियाद बिजली और इंटरनेट पर ही जाकर टिकती है।

ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि जिस देश में इंटरनेट और बिजली के इतनी ख़स्ता हालत हो उस देश में ऑनलाइन शिक्षा पर पूरी तरीके से निर्भर कैसे हुआ जा सकता है। इसलिए सत्ता में बैठे लोगों को समझना चाहिए। हर चुनौती से निपटने के लिए उसका एक ही माध्यम ‘ऑनलाइन’ नहीं हो सकता , इसमें शिक्षा तो बिल्कुल नहीं , इसके लिए जरूरत है। हमारी शिक्षा व्यवस्था है बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए।