कैनबरा। सोमवार को, इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने अपनी छठी मूल्यांकन रिपोर्ट की पहली किस्त जारी की। जैसा कि अपेक्षित था, रिपोर्ट पढ़ना अपने आप में निराशाजनक है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के सभी क्षेत्र पहले से ही जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना कर रहे हैं, और इसके गर्म होने के अनुमान डरावने से लेकर अकल्पनीय तक हैं।

लेकिन रिपोर्ट सिर्फ पढ़ने भर के लिए बनाई गई है। यहां तक ​​कि नीति निर्माताओं के लिए 42 पृष्ठों का जो सारांश दिया गया है वह भी ऐसा दस्तावेज नहीं है जिसका सार आप जल्दी से समझ सकें।

स्थानीय सरकारें, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नीति निर्माता, बीमा कंपनियां, सामुदायिक समूह, नए घर खरीदार, आप और मैं: सभी को आईपीसीसी के निष्कर्षों के कुछ पहलुओं को जानने की जरूरत है ताकि यह समझ सकें कि भविष्य कैसा दिख सकता है और हम इसके बारे में क्या कर सकते हैं।

जलवायु कार्रवाई पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होने के साथ, आईपीसीसी को यथासंभव अधिक से अधिक लोगों से स्पष्ट और दृढ़ता से संवाद करने की आवश्यकता है।

30 साल में सबसे मुखर रिपोर्ट

आईपीसीसी की कठिन प्रक्रिया और 234 वैज्ञानिकों की व्यापक लेखक सूची ने आईपीसीसी की रिपोर्ट को जलवायु परिवर्तन की जानकारी का दुनिया का सबसे आधिकारिक स्रोत बना दिया है। प्रत्येक वाक्य शक्तिशाली है क्योंकि प्रत्येक को 195 देशों के वैज्ञानिकों और सरकारी अधिकारियों द्वारा पढ़ा और अनुमोदित किया गया है।

इसलिए जब रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘यह स्पष्ट है कि मानव प्रभाव ने वातावरण, महासागर और भूमि को गर्म कर दिया है’’, तो इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। वास्तव में, आईपीसीसी उन 30 वर्षों में उत्तरोत्तर अधिक मुखर होता गया है, जिसके जलवायु विज्ञान का वह आकलन और सारांश कर रहा है।

1990 में, यह उल्लेख किया गया कि ग्लोबल वार्मिंग ‘‘काफी हद तक प्राकृतिक परिवर्तनशीलता के कारण हो सकता है’’। पांच साल बाद, ‘‘वैश्विक जलवायु पर एक स्पष्ट मानवीय प्रभाव’’ था। 2001 तक, जिस वार्मिंग का आकलन किया गया वह ग्रीनहाउस गैस सांद्रता में वृद्धि के कारण होने की संभावना है’’।

इस सप्ताह के ‘‘स्पष्ट’’ मानव प्रभाव के संदर्भ में कोई बड़ी बात नहीं लगती है।

यह भाषा क्यों बदल गई है? आंशिक रूप से क्योंकि विज्ञान ने प्रगति की है: हम पृथ्वी की जलवायु की जटिलताओं के बारे में पहले से कहीं अधिक जानते हैं।

लेकिन ऐसा इसलिए भी है क्योंकि रिपोर्ट के लेखक संदेश को प्रभावी ढंग से संप्रेषित करने की तात्कालिकता को समझते हैं। जैसा कि इस सप्ताह की रिपोर्ट स्पष्ट करती है, पेरिस समझौते के सबसे महत्वाकांक्षी 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य तक वार्मिंग को सीमित करना (कम से कम अस्थायी रूप से) दशकों के भीतर पहुंच से बाहर हो सकता है, और 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे वार्मिंग रखने का लक्ष्य भी जोखिम में है।

चूंकि आईपीसीसी की वैज्ञानिक मूल्यांकन रिपोर्ट केवल हर सात साल में प्रकाशित होती है, इसलिए लेखकों के लिए लोगों को चेतावनी देने का यह आखिरी मौका हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन संचार आसान नहीं है

किसी भी विज्ञान को संप्रेषित करना कठिन है, लेकिन जलवायु विज्ञान में विशेष चुनौतियाँ हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन के विज्ञान और भाषा की जटिलताएं, जोखिम प्रबंधन के बारे में लोगों की गलतफहमी, और जानबूझकर गलत सूचनाओं का प्रवाह शामिल है।

आईपीसीसी ने अपनी बात को पूरे आत्मविश्वास से संप्रेषित करने के लिए उपयोग की जाने वाली भाषा को मानकीकृत किया है। दुर्भाग्य से, शोध से पता चला है कि यह भाषा बहुत अधिक सटीक होने के कारण पाठकों की राय को आईपीसीसी से अलग राह पर ले जाती है।

रिपोर्ट के अनुमोदन की गहन प्रक्रिया का अर्थ यह भी है कि आईपीसीसी के बयान भ्रम की स्थिति तक रूढ़िवादी हो सकते हैं। वास्तव में, 2016 के एक अध्ययन से पता चला है कि आईपीसीसी की रिपोर्ट को पढ़ना कठिन होता जा रहा है। विशेष रूप से, आईपीसीसी के प्रयासों के बावजूद, नीति निर्माताओं के लिए दिए गए सारांश पिछले कुछ वर्षों में बहुत कम पढ़े गए, जिसके कारणों में घने पैराग्राफ और औसत पाठक के लिए बहुत अधिक शब्दजाल शामिल है।

2014 में आईपीसीसी की पांचवीं आकलन रिपोर्ट के अंतिम भाग के जारी होने के बाद से संचार बाधाओं में भी वृद्धि हुई है, जिसमें फेक न्यूज की अधिकता और भ्रामक जलवायु समाचार शामिल हैं।

राजनीतिकरण और जीवाश्म ईंधन के दिग्गजों के एक अच्छी तरह से वित्त पोषित दुष्प्रचार अभियान के कारण आईपीसीसी के जटिल परिणाम विवादास्पद और गर्मागर्म बहस में पड़ते दिखाई दे सकते हैं। और सोशल मीडिया के माध्यम से इतनी बार प्रसारित होने वाली खबरों के साथ, लोगों के लिए किसी ऐसे व्यक्ति की ओर मुड़ना आसान हो जाता है जिस पर वे भरोसा करते हैं, भले ही उस व्यक्ति की जानकारी गलत हो।

एक तरफ संचार अनिवार्यताओं में वृद्धि हुई है, जिसमें कार्रवाई की अत्यावश्यकता और विज्ञान की जानकारी में वृद्धि शामिल है, दूसरी तरफ यह सब ऐसे समय पर हो रहा है, जब एक वैश्विक महामारी दुनियाभर की खबरों में छाई हुई है। साथ ही लोग थक चुके हैं। एक महामारी के साथ अठारह महीने के जीवन ने शायद हर किसी की बड़ी समस्याओं को लेने की क्षमता को कम कर दिया है।

विज्ञान को संप्रेषित करने की चुनौतियों का समाधान करने के लिए, जलवायु संचारकों को लगातार संदेशों का लक्ष्य रखना चाहिए, विश्वसनीय जानकारी प्राप्त करनी चाहिए, अनिश्चितताओं के बजाय जो ज्ञात है उस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, ठोस कार्रवाई की पेशकश करनी चाहिए, स्पष्ट