पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका के बाहर निकलने पर संयुक्त राष्ट्र और कुछ सदस्य देशों ने अफसोस जताया है और कहा है कि वे जलवायु के मुद्दे पर कार्रवाई को गति देने के लिए सभी अमेरिकी हितधारकों और विश्व भर में साझेदारों के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। अमेरिका चार नवंबर को औपचारिक रूप से ‘जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते 2015’ से हट गया। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सचिवालय- ‘यूएनएफसीसीसी’ ने जलवायु के मुद्दे पर कार्रवाई को गति देने के लिए अमेरिका और उसके बाहर मौजूद हितधारकों के साथ मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।

बुधवार को संयुक्त राष्ट्र ने चिली, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन के साथ संयुक्त वक्तव्य जारी कर कहा, “हमें अफसोस है कि आज अमेरिका औपचारिक रूप से पेरिस समझौते से बाहर हो गया।” पेरिस समझौते के तहत देशों को तापमान में दो डिग्री सेल्सियस से कम वृद्धि रखने और वैश्विक ऊष्मा को 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक न होने देने का संकल्प लेना होता है। समझौते से अमेरिका के पीछे हटने के बारे में पूछे जाने पर संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता स्टीफेन दुजारिक ने न्यूयार्क में संवाददाताओं से कहा, “मजबूत और सक्रिय पेरिस समझौते के प्रति हमारा विश्वास और समर्थन दृढ है।” अगस्त 2017 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समझौते से पीछे हटने के फैसले से संयुक्त राष्ट्र महासचिव को अवगत कराया था।

पेरिस जलवायु समझौता क्या है ?
साल 2015 तक 195 देशों की सरकारें पेरिस, फ्राँस में इकट्ठा हुईं और वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के उद्देश्य से जलवायु परिवर्तन पर एक नए वैश्विक समझौते को संपन्न किया, जो जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने की दृष्टि से एक प्रभावी कदम होगा। वर्तमान में पेरिस समझौते में कुल 197 देश हैं। गौरतलब है कि युद्धग्रस्त सीरिया इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला आखिरी देश था। इस समझौते का उद्देश्य वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को काफी हद तक कम करना है, ताकि इस सदी में वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस कम रखा जा सके। इसके साथ ही आगे चलकर तापमान वृद्धि को और 1.5 डिग्री सेल्सियस रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

पेरिस जलवायु समझौते से बाहर होने के नियम क्या है?

पेरिस समझौता किसी भी पक्ष या देश को उसके शामिल होने की तारीख़ से तीन साल के बाद बाहर होने का विकल्प देता है। बाहर होने की नीयत की आधिकारिक सूचना मिलने के एक वर्ष बाद वापसी प्रभावी हो जाएगी। संयुक्त राज्य अमेरिका ने राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रशासन के दौरान 3 नवम्बर 2016 को पेरिस समझौते को स्वीकार किया था, और उसके दो महीने बाद ये सम्बन्ध प्रभावी हो गया था। अगस्त, 2017 में, राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प प्रशासन ने यूएन महासचिव को औपचारिक रूप से सूचित किया था कि उनका देश जिस तारीख़ को पेरिस समझौते से बाहर होने के लिये योग्य हो जाए, उसी दिन इस समझौते से बाहर होना चाहेगा।

पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका के बाहर होने क्या मतलब है ?

अमेरिका का इससे अलग होने का सबसे बड़ा प्रभाव जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिये प्राप्त होने वाले वित्तीय संसाधनों पर पड़ेगा। समझौते के अंतर्गत हरित जलवायु कोष में अमेरिका की सर्वाधिक भागीदारी थी। अतः इसकी अनुपस्थिति में समझौते के लक्ष्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। समझौते के अनुसार सभी विकसित देशों का यह कर्त्तव्य होगा कि जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिये वे हरित जलवायु कोष में वर्ष 2020 से प्रतिवर्ष 100 बिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता दें। अमेरिका के इससे अलग होने से अन्य देशों पर अतिरिक्त वित्तीय भार बढ़ेगा। अमेरिका के इस कदम से विश्व के अन्य देशों को भी इस ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी, जो कि बिलकुल भी वैश्विक समाज के हित में नहीं है।

पेरिस जलवायु समझौता में भारत की भूमिका क्या हैं ?

भारत विश्व में ग्रीन हाउस गैसों का उत्‍सर्जन करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है. वहीं इस कड़ी में चीन पहले नंबर पर है। भारत विश्व के 4.1 फ़ीसद उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। पिछले 21 वर्षों से सीओपी बैठकों में विवाद का सबसे बड़ा विषय सदस्य देशों के बीच जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी और इसके आर्थिक बोझ का रहा है। विकसित देश भारत और चीन जैसे विकासशील देशों पर कार्बन उत्‍सर्जन में वृद्धि करने का दोष लगाकर अपनी जिम्‍मेदारी से पल्‍ला झाड़ते रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर आज भी विकासशील और विकसित देशों के बीच प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन में बड़ा अंतर है। भारत जलवायु परिवर्तन के खतरों से प्रभावित होने वाले देशों में से एक है। साथ ही कार्बन उत्सर्जन में कटौती का असर भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं पर सबसे अधिक पड़ेगा। साल 2030 तक भारत ने अपनी उत्सर्जन तीव्रता को 2005 के मुकाबले 33-35 फीसदी तक कम करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए कृषि, जल संसाधन, तटीय क्षेत्रों, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर भारी निवेश की जरूरत है।