जलवायु परिवर्तन की समस्या वर्तमान में दुनिया भर के सभी क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। बढ़ते समुद्री जल के स्तर और मौसम के बदलते पैटर्न ने हज़ारों लोगों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। दुनियाभर के तमाम प्रयासों के बावजूद भी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि जारी है। इसी बीच जलवायु परिवर्तन के खिलाफ मुहिम चला रहे संगठनों के लिए एक अच्छी खबर सामने आई है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की हार के बाद नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बिडेन ने एक बार फिर से पेरिस जलवायु समझौते शामिल होने का वादा किया है। अगर अमेरिका यह कदम उठाता है तो निसंदेह धरती को बचाने की मुहिम में तेज़ी आएगी। आइए सबसे पहले समझते है कि पेरिस जलवायु समझौता है क्या और इसकी जरुरत दुनिया को क्यों है ?

दरअसल दुनिया के 195 देश साल 2015 में फ्राँस राजधानी पेरिस में इकट्ठा हुए। जिसमें वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने के उद्देश्य से जलवायु परिवर्तन पर एक नया वैश्विक समझौता किया गया। जो जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने की दृष्टि से एक प्रभावी कदम माना गया। इस समझौते का उद्देश्य वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को काफी हद तक कम करना है ताकि इस सदी में वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखा जा सके।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने साल 2016 में व्हाइट हाउस में दाखिल होने के साथ ही पेरिस जलवायु समझौता से किनारा कर लिया था। उनका कहना था कि “ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन कुछ होता ही नहीं, यह बस भारत और चीन जैसे देशों के द्वारा खड़ा किया एक नाटक है जो विकसित देशों से जलवायु परिवर्तन की समस्या के नाम पर पैसा “लूटना” चाहते हैं लेकिन अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन ने चुनाव जीतने के बाद यह वादा किया कि अमेरिका फिर से इस पेरिस जलवायु समझौता का हिस्सा बनेगा। यह क्लाइमेट चेंज कार्यकर्ताओं और संगठनों के अलावा उन कई विकासशील देशों के लिये भी एक हौसला बढ़ाने वाली खबर है।

जो जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभाव झेल रहे हैं क्योंकि अमेरिका जैसे बड़े और शक्तिशाली देश जो कि आज चीन के बाद दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है। उसके फिर से इस पेरिस संधि में वापस आने से इस समझौते को एक मजबूती मिलेगी। उधर यूरोपियन यूनियन ने भी ऐलान किया है कि कोरोना से रिकवरी की मुहिम का असर क्लाइमेट चेंज की लड़ाई पर नहीं पड़ेगा। चीन कहने को तो विकासशील देश है लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था न केवल सबसे बड़ी है बल्कि दुनिया में सबसे तेज़ रफ्तार से बढ़ रही है। हैरत की बात नहीं है कि चीन ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में नंबर वन है और अपने निकटतम प्रतिद्वंदी अमेरिकी से बहुत आगे है।

चीन न केवल कार्बन के उत्सर्जन अंधाधुंध बढ़ा रहा है बल्कि वह दुनिया के कई ग़रीब विकासशील देशों में कोयले और दूसरे जीवाश्म ईंधन को बढ़ावा भी दे रहा है, बात यहीं पर नहीं रुकती जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों के बावजूद ज़्यादातर देशों ने ग्लोबल वॉर्मिंग रोकने के लिये संयुक्त राष्ट्र में अपना अपडेटेड प्लान जमा नहीं किया। इसके तहत दुनिया के सभी देशों को 31 दिसंबर तक यह बताना था कि साल 2030 तक कार्बन इमीशन कम करने के घोषित कदमों को वो कैसे और कड़ा बनायेंगे। हालांकि यूनाइटेड किंगडम और यूरोपियन यूनियन समेत कुल 70 देशों ने अपना प्लान जमा जरूर किया लेकिन चीन, भारत, कनाडा, इंडोनेशिया और सऊदी अरब जैसे देशों ने अपना प्लान जमा ही नहीं किया है।

कोरोना महामारी ने दुनिया में तमाम शासकों और सरकारों को यह अवसर दिया है कि वो इसकी आड़ में “आर्थिक नुकसान कि भरपाई तो करे ही इस सबके साथ साथ क्लाइमेट चेंज के लिये किये गये अपने संकल्प पर ध्यान दे अध्ययन बताते हैं कि तमाम दबाव के बावजूद दुनिया भर की सरकारों ने अपने आर्थिक रिकवरी पैकेज में क्लाइमेट चेंज जैसे विषय को नज़रअंदाज़ किया है और व्यापार को ही तरजीह दी है। विवड इकोनोमिक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 17 बड़े देशों के कोरोना रिकवरी पैकेज में 3.5 लाख करोड़ डॉलर उन सेक्टरों को दिया गया जिनके कामकाज से पर्यावरण पर बड़ा दुष्प्रभाव पड़ता है।

भारत तथा उसके द्वारा किए जा रहे जलवायु परिवर्तन की दिशा में प्रयासों के बारे में

वैसे तो भारत हमेशा से ही यह बातने नही चूकता कि हम एक जिम्मेदार देश के रूप में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए कई कदम उठा रहे है। जलवायु परिवर्तन को लेकर किये गए प्रयासों की वजह से जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक 2021 में भारत को टॉप 10 में रखा गया है। ये लगातार दूसरी बार है जब भारत टॉप 10 मे शामिल रहा है। हालांकि भारत के लिए चिंता के कुछ सबब भी है। क्लाइमेट चेंज से लड़ने में भारत की स्थिति तमाम घोषणाओं के बाद भी बहुत अच्छी नहीं है। वर्ल्ड रिस्क इंडेक्स – 2020 रिपोर्ट के मुताबिक “क्लाइमेट रियलिटी” से निपटने के लिये भारत की तैयारी काफी कमज़ोर रही है। इस रिपोर्ट में भारत कुल 181 देशों की लिस्ट में भारत 89 स्थान पर है यानी हमारी जलवायु परिवर्तन के ख़तरों से निपटने के लिये तैयारी बहुत कम है। दक्षिण एशिया में क्लाइमेट रिस्क की वरीयता में भारत , बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बाद चौथे नंबर पर है। हाल यह तो है कि श्रीलंका, मालदीव और भूटान जैसे देशों की तैयारी हमसे बेहतर है।