SDG 5 क्या है?

संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की ओर से सितंबर 2015 में सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) को तय किया गया। इसमें वर्तमान पीढ़ियों के जीवन स्तर में सुधार लाने के साथ पर्यावरण, धरती, मनुष्य, जीव-जंतुओं की सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों का इस तरह दोहन करना शामिल है ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी गुजर-बसर करने में आसानी रहे। यूएनओ की ओर सभी सदस्य देशों को 17 SDGs दिये गये हैं जिसके अनुरुप ही नीति और कार्यक्रम बनाना है। साल 2015 से विकसित और विकासशील देश एसडीजी में निहित उदेश्यों को लेकर काम कर रहे हैं जिसे साल 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य है। इस कड़ी में एसडीजी के पांचवे लक्ष्य की चर्चा करेंगे। पांचवे एसडीजी का लक्ष्य ‘लैंगिक समानता हासिल करना और सभी महिलाओं व लड़कियों को सशक्‍त करना’ है। इसमें कुछ विशिष्ट उदेश्य भी समाहित हैं जो इस प्रकार हैं-

सभी महिलाओं और लड़कियों के साथ हर जगह हर प्रकार का भेदभाव मिटाना

सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में सभी महिलाओं और लड़कियों के प्रति सभी प्रकार की हिंसा समाप्‍त करना जिसमें तस्‍करी और यौन व अन्‍य प्रकार के शोषण को समाप्‍त करना शामिल है

बाल विवाह, कम उम्र में और जबरन विवाह तथा महिला जननांग भंग करने जैसी सभी हानिकारक प्रथाओं का उन्‍मूलन करना

जन सेवाओं, बुनियादी सुविधाओं और सामाजिक संरक्षण नीतियों के माध्‍यम से नि:शुल्‍क सेवा और घरेलू काम को मान्‍यता और महत्‍व देना तथा राष्‍ट्रीय स्‍तर पर उपयुक्‍तता के आधार पर घर और परिवार के भीतर साझी जिम्‍मेदारी को प्रोत्‍साहित करना

राजनीतिक, आर्थिक और सार्वजनिक जीवन में निर्णय प्रक्रिया के सभी स्‍तरों पर महिलाओं की पूर्ण और कारगर भागीदारी तथा नेतृत्‍व के समान अवसर सुनिश्चित करना।

अंतर्राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या और विकास सम्‍मेलन के कार्रवाई कार्यक्रम और बीजिंग प्‍लेटफार्म फॉर एक्‍शन तथा उनके समीक्षा सम्‍मेलनों के निष्‍कर्ष दस्‍तावेजों के अनुरूप हुई सहमति के अनुसार यौन तथा प्रजनन स्‍वास्‍थ्‍य एवं प्रजनन अधिकारों की सबके लिए सुलभता सुनिश्चित करना

महिलाओं को आर्थिक संसाधनों पर समान अधिकार तथा जमीन और अन्‍य प्रकार की संपत्ति, वित्‍तीय सेवाओं, उत्‍तराधिकार और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और स्‍वामित्‍व को राष्‍ट्रीय कानूनों के अनुसार सुलभ कराने के लिए सुधारों को अपनाना

महिला सशक्तिकरण को प्रोत्‍साहित करने के लिए विशेषकर सूचना और संचार टेक्‍नॉलॉजी सहित सामर्थ्‍यकारी टेक्‍नॉलॉजी का इस्‍तेमाल बढ़ाना

सभी स्‍तरों पर, सभी महिलाओं और लड़कियों के सशक्तिकरण और लैंगिक समानता के संवर्द्धन हेतु ठोस नीतियां एवं लागू करने योग्‍य कानून अपनाना और उन्‍हें मजबूत करना

लैंगिक समानता न सिर्फ एक बुनियादी मानव अधिकार है, बल्कि एक शांतिपूर्ण और टिकाऊ विश्‍व के लिए आवश्‍यक बुनियाद भी है। महिलाओं को मुख्‍यधारा से बाहर रखने का मतलब दुनिया की आधी आबादी को संपन्‍न समाज और अर्थव्‍यवस्‍थाओं के निर्माण में भागीदारी के अवसर से वंचित रखना है। शिक्षा की समान सुलभता, लाभकारी काम और राजनीतिक तथा आर्थिक निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी न सिर्फ महिलाओं के लिए आवश्‍यक अधिकार हैं, बल्कि इनसे कुल मिलाकर मानवता लाभान्वित होती है। महिलाओं के सशक्तिकरण में निवेश कर हम न सिर्फ सतत् विकास लक्ष्‍य 5 की दिशा में आगे बढ़ते हैं, बल्कि गरीबी कम करने में भी लाभ होता है तथा टिकाऊ आर्थिक वृद्धि को गति मिलती है।

लैंगिक असमानता, मानव इतिहास में अन्‍याय का एक सबसे निरन्‍तर और व्‍यापक रूप है, इसलिए इसे मिटाने के लिए बदलाव की दिशा में एक सबसे बड़े आंदोलन की आवश्‍यकता होगी। दुनिया के हर हिस्‍से में महिलाएं और लड़कियां आज भी भेदभाव और हिंसा झेल रही हैं। हर क्षेत्र में लैंगिक समानता के मामले में कमियां मौजूद हैं। दक्षिण एशिया में 1990 में प्राइमरी स्‍कूलों में हर 100 लड़कों पर सिर्फ 74 लड़कियां भर्ती होती थीं, लेकिन 2012 तक भी भर्ती का अनुपात वही था। 155 देशों में कम से कम एक कानून ऐसा मौजूद हैं, जो महिलाओं के लिए आर्थिक अवसरों में बाधक है। अधिकांश देशों में महिलाएं, पुरुषों को मिलने वाले वेतन की तुलना में औसतन सिर्फ 60 फीसद से 75 फीसद तक ही कमा पाती हैं। सभी देशों की संसदों में केवल 22.8 फीसद महिला सांसद हैं। हर तीन में से एक महिला अपने जीवन काल में किसी न किसी प्रकार की शारीरिक अथवा यौन हिंसा की शिकार होती है।

भारत और लक्ष्‍य 5
वैसे तो भारत ने प्राइमरी शिक्षा के स्‍तर पर लैंगिक समानता हासिल कर ली है और शिक्षा के सभी स्‍तरों में समानता हासिल करने के लिए सही दिशा में बढ़ रहा है, फिर भी अगस्‍त, 2015 तक संसद में महिलाओं को मिली सीटों का अनुपात सिर्फ 12% रहा, जबकि लक्ष्‍य 50% का है। भारत महिलाओं के प्रति हिंसा की चुनौती का सामना भी कर रहा है। उदाहरण के तौर पर एक बुनियादी अध्‍ययन से पता चला है कि नई दिल्‍ली में 92% महिलाओं ने अपने जीवन काल में सार्वजनिक स्‍थलों पर किसी न किसी रूप में यौन हिंसा का अनुभव किया है। भारत सरकार ने महिलाओं के प्रति हिंसा समाप्‍त करने को एक प्रमुख राष्‍ट्रीय प्राथमिकता माना है, जो लैंगिक समानता के बारे में संयुक्‍त राष्‍ट्र के सतत विकास उद्देश्‍यों का अंग है। प्रधानमंत्री की ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ पहल का उद्देश्‍य भारत में लड़कियों को समान अवसर और शिक्षा देना है। इसके अलावा, महिलाओं के रोजगार के बारे में विशेष प्रयास, किशोरी बालिकाओं के सशक्तिकरण के कार्यक्रम, बालिका की संपन्‍नता के लिए सुकन्‍या समृद्धि योजना और माताओं के लिए जननी सुरक्षा योजना जैसे उपाय लैंगिक समानता और लक्ष्‍य 4 के उद्देश्‍यों के प्रति भारत के संकल्‍प को आगे बढ़ाते हैं।


महिलाओं की भूमिका
महिलाएँ उत्पादक, गृह खाद्य प्रबंधक और उपभोक्ताओं के रूप में खाद्य संबंधी प्रावधानीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उत्पादकों के रूप में, वे किसानों की भूमिका में एक उच्च अनुपात में योगदान देती हैं। NSSO 2011-12 के आँकड़ों के मुताबिक भारत में 35 प्रतिशत कृषि श्रमिक महिलाएँ हैं और कृषि सेंसस के अनुसार 2010-11 और 2015-16 के बीच महिला खेत संचालक (ऑपरेटर) की संख्या 12.8 प्रतिशत से बढ़कर 13.9 प्रतिशत हो गई है। लेकिन महिलाओं की उत्पादक भूमि तक पहुंच अत्यधिक लिंग असमानता से ग्रसित है जिसके लिये विरासत के हस्तांतरण में पुरुषों को तरजीह, सरकारी भूमि हस्तांतरण और बाज़ार पहुँच जैसे कारण ज़िम्मेदार हैं।

इसका समाधान क्‍या है
लक्ष्‍य 5 का उद्देश्‍य सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति हर तरह के भेदभाव और हिंसा को मिटाना तथा महिलाओं को आर्थिक संसाधनों पर समान अधिकार और संपत्ति में स्‍वामित्व देने के लिए सुधार करना है। वहीं खाद्य सुरक्षा के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले, यह विशेष रूप से वनों, मत्स्यपालन और सिंचाई को कवर करने के लिये प्राकृतिक संसाधनों तक महिलाओं की पहुँच की व्याख्या किया जा सकता है। साथ ही SDG 1 (कोई गरीबी नहीं) और SDG 2 (शून्य भूख) से जुड़ता है जो महिलाओं को भूमि, क्रेडिट, ज्ञान और बाज़ारों तक पहुँच की आवश्यकता को लक्षित करता है। ऐसे ही SDG लक्ष्यों (SGD14 और SDG 15) को जोकि चरम जलवायु परिस्थितियों का समाधान प्रस्तुत करते हैं और जिनका केंद्रीय लक्ष्य खाद्य सुरक्षा है लेकिन वर्तमान में लिंग समानता की उपेक्षा करते हैं, के साथ सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता है। SDG से परे हमें संस्थागत नवाचारों की आवश्यकता है। जैसा कि केरल पर किये गए शोध में पाया गया है कि महिलाओं के समूह ने खेतों की वार्षिक उत्पादकता और मुनाफे में व्यक्तिगत खेती से बेहतर प्रदर्शन किया है। अतः सामूहिक खेती महिलाओं के योगदान के माध्यम से खाद्य सुरक्षा को बढ़ाने और SDG 5 को मज़बूत करने के लिये एक मार्ग प्रदान कर सकती है।