केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने वर्चुअल संवाद के माध्यम से विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य देशों के मंत्रियों तथा संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों एवं सहयोगी संस्थानों के प्रमुखों एवं प्रतिनिधियों को संबोधित किया। उन्होंने, खासकर कोविड-19 संकट के संदर्भ में, बहुपक्षीय कार्रवाई को मजबूत करने और टीबी को समाप्त करने की दिशा में भारत की भूमिका एवं योगदान पर बात की।

उन्होंने कहा कि “भारत में, हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के मार्गदर्शन में भारत ने सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) से पांच साल पहले ही, 2025 तक, तपेदिक को समाप्त करने को उच्च प्राथमिकता दी है।” उन्होंने आगे कहा, “तपेदिक अति प्राचीन काल से अस्तित्व में है और यह एक प्रमुख वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बना हुआ है। पिछले दशक में हुई प्रगति के बावजूद, टीबी दुनिया भर में एक प्रमुख संक्रामक घातक बीमारी बनी हुई है।”

टीबी के उन्मूलन की दिशा में भारत के प्रयासों की सराहना करते हुए, उन्होंने कहा, “उचित संसाधनों द्वारा समर्थित साहसिक एवं नवीन नीतियों के साथ भारत ने टीबी को समाप्त करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। हमने लापता टीबी रोगियों की संख्या को 2016 में एक मिलियन से घटाकर 2019 में 0.5 मिलियन से भी कम कर दिया है, जबकि इस वर्ष के दौरान 2.4 मिलियन मामलों को अधिसूचित किया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इन अधिसूचनाओं में एक तिहाई निजी क्षेत्र द्वारा दर्ज की गयी। देश के प्रत्येक जिले में तीव्र आणविक निदान को बढ़ाने के साथ, हम 2019 में 66,000 से अधिक दवा प्रतिरोधी टीबी रोगियों की पहचान करने में समर्थ रहे।”

उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी, जिसने “हमारे जीवन में कई तरीकों से नाटकीय बदलाव लाया है” उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य पर सार्वजनिक चर्चा अब किस तरह से विमर्श के केंद्र में आ गई है। आज जनता के बीच स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है। उन्होंने कहा कि कोविड-19 और इसकी अत्यधिक संक्रामक प्रकृति ने दुनिया भर में स्वास्थ्य संबंधी जोखिम के बारे में एक व्यापक धारणा बनाई है।

उन्होंने कोविड-19 संकट के संदर्भ में टीबी को समाप्त करने की दिशा में भारत की भूमिका एवं योगदान और देश में कोविड-19 को रोकने तथा प्रबंधित करने की दिशा में भारत द्वारा उठाए गए बहुपक्षीय कदमों के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा, “मैं कहना चाहूंगा कि कोविड-19 महामारी ने हमें अपने मूल सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों को संरचनात्मक रूप से फिर से संगठित करने का अवसर दिया है।

टीबी रोगियों को दवाएं उनके घर पहुंचाने, टेली-परामर्श, आगे बढ़कर की जाने वाली गतिविधियों के माध्यम से टीबी की सक्रिय जांच आदि जैसे नवाचार, लॉकडाउन के दौरान कई रोगियों के लिए एक वरदान साबित हुए हैं। हम यह भी महसूस कर रहे हैं कि मात्र रोगी केंद्रित देखभाल के दृष्टिकोण से आगे बढ़ते हुए स्वास्थ्य प्रणाली को सामुदाय केंद्रित स्वास्थ्य दृष्टिकोण के इर्द-गिर्द मजबूत करने की जरूरत है। इस प्रक्रिया में, सामाजिक एवं पर्यावरण संबंधी निर्धारक तत्वों पर भी ध्यान देने की भी जरूरत है। रोग की निगरानी एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य नियमों पर अमल सख्त होगा और यह व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं रहेगा।”