SDG 3 क्या है?

संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से तय किये गये 17 सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) में से तीसरे का उदेश्य ‘उत्तम स्वास्थ्य सुनिश्चित करना और हर उम्र में सब की खुशहाली को प्रोत्साहन’ करना है। साल 2015 में एसडीजी के लक्ष्यों को लेकर विश्व के सभी देश काम कर रहे हैै और साल 2030 तक सभी देशों को इन लक्ष्यों को पूरा करने पर जोर देना है। SDG के तीसरे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कुछ उदेश्य तय किये गये हैं जो इस प्रकार हैं-

2030 तक दुनिया में मातृ मृत्‍यु अनुपात घटाकर प्रति एक लाख जीवित शिशु प्रसव पर 70 से भी कम करना

2030 तक नवजात शिशुओं और पांच साल कम उम्र में बच्‍चों में निरोध्‍य मौतें कम करना। सभी देशों का उद्देश्य नवजात शिशु मृत्‍यु दर प्रति एक हज़ार जीवित जन्‍म पर घटाकर कम से कम 12 करना और पांच साल से कम उम्र में बच्‍चों में मृत्यु दर प्रति एक हज़ार जीवित जन्‍म पर घटाकर कम से कम 25 करना है

2030 तक एड्स, टीबी, मलेरिया और उपेक्षित कटिबंधीय बीमारियों को समाप्‍त करना तथा हेपेटाइटिस, जल जन्‍य रोगों तथा अन्‍य संचारी रोगों का सामना करना

2030 तक असंचारी रोगों से होनी वाली असामयिक मौतों में बचाव और उपचार के ज़रिए एक-तिहाई कमी करना तथा मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य और खुशहाली को बढ़ावा देना

मादक पदार्थों सहित नशीले पदार्थों के सेवन और शराब के हानिकारक सेवन से बचाव और उपचार मज़बूत करना

2020 तक विश्वभर में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों और घायलों की संख्‍या आधी करना

2030 तक सभी को परिवार नियोजन सूचना और शिक्षा सहित यौन और प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ कराना तथा प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य को राष्ट्रीय नीतियों और कार्यक्रमों में शामिल करना

वित्तीय जोखिम संरक्षण सहित सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा प्रदान करना, उत्तम आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ कराना तथा सभी के लिए निरापद, असरदार, उत्तम और किफायती ज़रूरी दवाएं और टीके सुलभ कराना

2030 तक हानिकारक रसायनों, वायु, जल, और मृदा प्रदूषण तथा दूषण से होने वाली मौतों और बीमारियों में भारी कमी करना

तम्बाकू नियंत्रण पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रारूप (फ्रेमवर्क)संधि को, जैसे उपयुक्त हो, सभी देशों में लागू करना

मूल रूप से विकासशील देशों में फैलने वाले संचारी और असंचारी रोगों के लिए टीकों और दवाओं के अनुसंधान और विकास को मज़बूत करना, ट्रिप्स समझौते और जन स्वास्थ्य पर दोहा घोषणा के अनुरूप किफायती आवश्यक दवाओं और टीकों को सुलभ कराना। इसके अंतर्गत सभी विकासशील देशों को अधिकार दिया गया है कि वे बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं से सम्बद्ध समझौते के प्रावधानों का पूरी तरह इस्तेमाल करें। ये अधिकार जन स्वास्थ्य की सुरक्षा में लचीलेपन और विशेष रूप से सभी को दवाएं सुलभ करने से जुड़े हैं

स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए धन की व्यवस्था में उल्लेखनीय वृद्धि करना तथा विकासशील देशों विशेष रूप से सबसे कम विकसित और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों में स्वास्थ्यकर्मियों की भर्ती, विकास, प्रशिक्षण और उन्हें इस काम से जोड़े रखने के उपाय करना

राष्ट्रीय और वैश्विक स्वास्थ्य खतरों के बारे में जल्दी चेतावनी, जोखिम में कमी और प्रबंधन के लिए सभी देशों, विशेष रूप से विकासशील देशों की क्षमता मज़बूत करना


भारतीय नागरिकों को अभी तक स्वास्थ्य का अधिकार एक मौलिक अधिकार के रूप में प्राप्त नहीं हुआ है। यह शिक्षा की तरह नागरिकों का वैधानिक अधिकार भी नहीं हैं। वहीं स्वास्थ्य पर होने वाला व्यय देखें तो इसका दो तिहई हिस्सा राज्य सरकारों से आता है और बाकी का एक तिहाई हिस्सा केंद्र सरकार उपलब्ध कराता है। देश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में व्यापक स्तर पर सुधार के लिए स्वास्थ्य आरोग्य केंद्रों और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के दोहरे उपाय के साथ राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और आयुष्मान भारत जैसी सफल योजनाओं से स्वास्थ्य नीतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है। भारत सतत् विकास के 2030 के एजेंडे पर हस्ताक्षर करने वाला देश भी है जबकि एक राष्ट्र के रूप में यह सबके लिए स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और स्वास्थ्य जीवन सुनिश्चित करने के लिए भी प्रतिबद्ध है।

दूसरी ओर नीति आयोग ने स्वास्थ्य संबंधी लक्ष्य हासिल करने की गति बढ़ाने और राज्यों को एक-दूसरे के अनुभवों से प्रोत्साहित करने के लिए स्वास्थ्य सूचकांक की स्थापना की है। यह स्वास्थ्य सूचकांक प्रभावी परिणाम लाने वाला साबित हो सकता है क्योंकि यह बजट आवांटन और व्यय की जगह परिणामों पर ध्यान केंद्रित कर सकता है। हालांकि भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं की काफी प्रगति हुई है। पिछले सात दशक में 158417 स्वास्थ्य उप केंद्र, 25743 प्राथमिक स्वास्थय केंद्रों और 5624 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों का नेटवर्क तैयार हुआ है। साल 2018 के बाद से 30,000 से भी ज्यादा उप केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में सुविधाओं को बेहतर बनाते हुए इसे हेल्थ वेहनेस सेंटर का दर्जा दिया गया है।

भारत और लक्ष्‍य तीन
भारत ने पांच साल से कम उम्र में बच्‍चों की मृत्‍यु दर घटाने में कुछ प्रगति की है। यह दर 1990 में प्रति एक हज़ार जीवित जन्‍म पर 125 थी जो 2013 में घटकर प्रति एक हज़ार जीवित जन्‍म पर 49 रह गई । मातृ मृत्‍यु दर 1990-91 में प्रति एक लाख जीवित शिशु प्रसव पर 437 थी जो 2009 में घटकर 167 रह गई। भारत ने ऐसे विभिन्न वर्गों में एचआईवी और एड्स का संक्रमण कम करने में भी महत्‍वपूर्ण प्रगति की है जिनमें इसके संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। वयस्‍कों में इनका चलन 2002 में 0.45 प्रतिशत था जो 2011 में घटकर 0.27 प्रतिशत रह गया। दुनिया में टीबी (तपेदिक) के एक-चौथाई मामले भारत में होते हैं। यहां हर साल करीब 22 लाख लोगों में टीबी की पहचान होती है और इसके कारण लगभग 2 लाख 20 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है। भारत सरकार का राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मिशन, एचआईवी/एड्स और यौन संचारी रोगों से निपटने के लिए लक्षित राष्‍ट्रीय कार्यक्रमों के अतिरिक्‍त राष्‍ट्रीय खुशहाली को प्राथमिकता दे रहा है और इस क्षेत्र में बदलाव का नेतृत्व कर रहा है।


भारत में नवजात मृत्यु दर का आंकड़ा 1994 में हरेक 1000 बच्चों पर 74 था़, जो 2017 में घटकर 33 हो गया। इसी तरह प्रसूति मृत्यु अनुपात प्रति एक लाख बच्चों के जन्म पर 600 था़, जबकि 2015-17 में यह आंकड़ा घटकर 122 हो गया। 1990 में देश में औसत आयु 58 साल थी, जो 2017 में बढ़कर 69 साल हो गई। यह बता दें कि भारत चेचक, टेटनस, पोलियो और गिनिया कृमि रोग के उन्मूलन में सफल रहा है। साथ ही कालाजार, मलेरिया, कुष्ठ रोग आदि के संक्रमण को काफी हद तक नियंत्रित किया है और 2025 तक टीबी को खत्म करने के लक्ष्य पर भी काम चल रहा है।

गैर-संक्रामक और जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां
गैर-संक्रामक बीमारियों के फैलने की वजहों में बदलती जीवन शैली और शराब, सिगरेट, अस्वास्थ्कर भोजन, अपर्याप्त शारीरिक श्रम आदि शामिल हैं। गैर-संक्रामक रोगों के फैलने की एक वजह बुजुर्गों की बढ़ती संख्या भी है।

अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय ने सतत् विकास के तीसरे लक्ष्‍य के माध्यम से बीमारी को खत्‍म करने, उपचार व्‍यवस्‍था और स्‍वास्‍थ्‍य सेवा को मज़बूत करने, तथा स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी नए और उभरते मुद्दों के समाधान के लिए वैश्विक प्रयासों का संकल्‍प लिया है। इसके लिए इन क्षेत्रों में नई सोच और अनुसंधान की आवश्‍यकता बताई गई है ताकि जन नीतिगत प्रयासों को आगे बढ़ाया जा सके। बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति समग्र दृष्टिकोण में सुनिश्चित करना होगा कि सभी को स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं सुलभ हों और दवाएं तथा टीके उनके साधनों के भीतर मिलें। इसमें मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़े मुद्दों पर नए तरीके से विचार किए जाने की ज़रूरत भी बताई गई है। 19 से 25 साल की उम्र के लोगों में आत्‍महत्‍या, दुनियाभर में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है, और आखिर में स्‍वास्‍थ्‍य और खुशहाली हमारे पर्यावरण की गुणवत्ता से करीब से जुड़े हैं, और लक्ष्‍य 3 का उद्देश्‍य वायु, जल, और मृदा प्रदूषण तथा दूषण से होनी वाली बीमारियों और मौतों की संख्‍या में भारी गिरावट लाना भी है।


मोदी सरकार ने स्वास्थ्य सुविधाओं में चौतरफा विकास के लिए कुछ महत्वपूर्ण उपाय किये हैं। ये उपाय स्वास्थ्य क्षेत्र में परिवर्तनकारी हो सकते हैं और पिछले कुछ सालों में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हुईं हैं। आइए कुछ योजनाओं के बारे में जानते हैं-

आयुष्मान भारत (पीएम-जय) : दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य आश्वासन योजना है, जिसका उद्देश्य प्रति परिवार प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक का मुफ़्त इलाज माध्यमिक और तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 10.74 करोड़ से भी अधिक गरीब और वंचित परिवारों (या लगभग 50 करोड़ लाभार्थियों को) मुहैया कराना जो भारतीय आबादी का 40% हिस्सा हैं।

सुपोषित मां अभियान: इस अभियान की योजना के अनुसार, 1000 महिलाओं को 1 महीने के लिये पोषक तत्त्वों से भरपूर भोजन दिया जाएगा साथ ही जच्चे-बच्चे की स्वास्थ्य चिकित्सा जाँच, रक्त, दवा, प्रसव सहित अन्य बातों का ध्यान रखा जाएगा। यह अभियान गर्भवती माताओं और लड़कियों की पोषण सहायता से संबंधित है इस अभियान के माध्यम से न केवल गर्भवती महिलाओं की देखभाल की जाएगी बल्कि नवजात शिशु भी इस योजना का हिस्सा होंगे। इस अभियान के पहले चरण में लगभग 1000 गर्भवती महिलाओं को लाभान्वित किया जाएगा। सुपोषित माँ अभियान में एक परिवार से एक गर्भवती महिला को शामिल किया जाएगा। सुपोषित माँ अभियान के तहत नवजात बच्चे के स्वास्थ्य की भी विशेष देखरेख की जाएगी। अभियान के पहले चरण में 1,000 गर्भवती महिलाओं में से प्रत्येक को 17 किग्रा. संतुलित आहार की एक किट प्रदान की जाएगी। इस किट में गेहूँ, चना, मक्का और बाजरे का आटा, गुड़, दलिया, दाल, बड़ी सोयाबीन, घी, मूँगफली, भुने हुए चने, खजूर और चावल शामिल होंगे।

सुमन योजना : सुमन योजना 2020 में गर्भवती महिलाओं, माताओं को प्रसव के 6 महीने बाद और बीमार नवजात शिशुओं को मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाओं लाभ मिल सकेगा। सुरक्षित मातृत्व आश्वासन सुमन स्कीम 2020 का उद्देश्य देश में सौ फीसदी प्रसव को अस्पताल या प्रशिक्षित नर्स की निगरानी में सुनिश्चित कराना है।

भारत जैसे विशालकाय जनसंख्या वाले देश के सामने स्वास्थ्य क्षेत्र में बजट का खर्च बढ़ाना बड़ी चुनौती है। फिलहाल यह जीडीपी का 1.2 फीसद है और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 का मकसद है कि 2025 तक स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च जीडीपी का 2.5 फीसद तक पहुंचाना है। इसके लिए भारत सरकार और राज्य सरकारों को अपने मद में खर्च बढ़ाना होगा। तभी टीबी़ और मलेरिया जैसी बीमारियों से छूटकारा का एजेंडा पूरा किया जा सकेगा। साथ ही सतत् विकास लक्ष्यों के अनुसार स्वास्थ्य क्षेत्र के अन्य उदेश्यों को पूरा किया जा सकेगा।