SDG2 क्या है?

साल 2030 तक शून्य भुखमरी, खाद्य सुरक्षा और बेहतर पोषण हासिल करना और सतत् खेती के प्रोत्साहन के लक्ष्य को प्राप्त करना है।इसके लिए कुछ उदेश्य तय किये गये हैं जो इस प्रकार हैं-

2030 तक भुखमरी मिटाना और सभी लोगों, विशेषकर गरीब और शिशुओं सहित लाचारी की स्थिति में जीते लोगों को पूरे वर्ष सुरक्षित, पौष्टिक तथा पर्याप्त भोजन सुलभ कराने की व्यवस्था करना।

2030 तक कुपोषण को हर रूप में मिटाना, जिसमें 5 वर्ष से छोटे बच्चों में बौनेपन और क्षीणता के बारे में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहमत लक्ष्य 2025 तक हासिल करना शामिल है। इसके अलावा किशोरियों, गर्भवती एवं स्तनपान कराती माताओं तथा वृद्धजनों की पोशाहार की ज़रूरतों को पूरा करना।

2030 तक खेतीकी उत्पादकता और खासकर महिलाओं, मूल निवासियों, पारिवारिक किसानों, चरवाहों और मछुआरों सहित लघु आहार उत्पादकों की आमदनी को दोगुना करना। यह काम ज़मीन तक पक्की और बराबर पहुँच, अन्य उत्पादक संसाधन औऱ कच्चा माल, जानकारी,वित्तीय सेवाएं, बाज़ार और मूल्य संवर्द्धन के लिए अवसर तथा गैर-कृषि रोज़गार सुलभ कराने के ज़रिए किया जाना है।

2030 तक टिकाऊ आहार उत्पादन प्रणालियाँ सुनिश्चित करना और खेती की ऐसी जानदार विधियाँ अपनाना जिनसे उत्पादकता औऱ पैदावार बढ़े, पारिस्थितिक प्रणालियों के संरक्षण में मदद मिले, जलवायु परिवर्तन, कठोर मौसम, सूखे, बाढ़ और अन्य आपदाओं के अनुरूप ढलने की क्षमता मज़बूत हो औऱ जिनसे ज़मीन एवं मिट्टी की गुणवत्ता में निरंतर सुधार हो।

2020 तक बीजों, उगाए गए पौधों, कारोबार के लिए पाले गए और पालतू पशुओं और उनकी संबंधित वन्य प्रजातियों की आनुवांशिक विविधता को राष्ट्रीय, क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर सुप्रबंधित एवं विविधिकृत बीच एवं पौध बैंकों के ज़रिए संरक्षित रखना तथा आनुवांशिक संसाधनों एवं संबद्ध पारम्परिक ज्ञान के उपयोग से उत्पन्न लाभों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई सहमति के अनुसार निष्पक्ष एवं समान रूप से बांटना तथा सुलभता को प्रोत्साहित करना

पहले से अधिक अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सहित ग्रामीण बुनियादी ढाँचागत सुविधाओं , कृषि अनुसंधान और विस्तार सेवाओं, टैक्नॉलॉजी विकास और पौध एवं मवेशी जीन बैंकों में निवेश बढ़ाना जिससे विकासशील देशों , विशेषकर सबसे कम विकसित देशों में कृषि उत्पादकता क्षमता बढ़ सके।

व्यापार प्रतिबंधों और विश्व कृषि बाज़ारों में व्यापार प्रतिबंधों और विकृतियों को सुधारना और रोकना। इनमें दोहा विकास दौर में हुई सहमति के अनुरूप सभी प्रकार की कृषि निर्यात सब्सिडी और उसके बराबर प्रभाव वाले सभी निर्यात उपायों को समानान्तर रूप से समाप्त करना शामिल है

खाद्य जिन्स बाज़ार और उनके डेरिवेटिव्ज़ के सही ढंग से संचालन के उपाय अपनाना और सुरक्षित खाद्य भंडार सहित बाज़ार की जानकारी समय से सुलभ कराना जिससे खाद्य वस्तुओं के मूल्यों में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव को सीमित करने में मदद मिल सके।


देश और दुनिया के सामने पेट की भूख शांत करना बड़ी चुनौती के तौर पर उभर रहा है। खेतों में उत्पादन बढ़ाने से लेकर लोगों तक उसकी
गुणवत्तापूर्ण पहुंच को सुनिशि्चत करना आज हमारी प्रमुख जरूरत है। नीति-नियंताओं के सामने उत्पादों की कम से कम बर्बादी और संसाधनों की कम से कम खपत करने का मामला लेकर बेजोड़ मंथन लिए है। भारत जैसे विशालकाय जनसंख्या वाले देश के सामने सबके लिए खाद्य सुरक्षा को बरकरार करना और आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों का समायोजन करना गंभीर समस्या है। आज यूं कहे तो भूखमरी से आजादी की लड़ाई भीषण जंग में तब्दील हो गई है। आने वाले दिनों में इसके आंकड़े भयावह होने वाले हैं। एक आंकड़े के मुताबिक, साल 2050 तक दुनियाभर में भूख के शिकार लोगों की संख्या दो अरब तक पहुंच जाएगी।

साल 2030 तक शून्य भुखमरी़, खाद्य सुरक्षा और बेहतर पोषण हासिल करना व सतत् खेती को प्रोत्साहन करना एसडीजी (सतत् विकास लक्ष्य) के दूसरे लक्ष्य में समाहित है। आहार और खेती की स्थिति में सुधार के लिए काम करने पर अन्य 16 सतत् विकास लक्ष्यों को हासिल करना आसान होगा। इससे जलवायु परिवर्तन का सामना करने, आर्थिक वृद्धि बढ़ाने और दुनियाभर के समाजों में शांति औऱ स्थिरता में योगदान करने में मदद मिल सकती है। इस समय हमारी मिट्टी, ताज़ा पानी, महासागर, वन और जैवविविधता, सबका तेज़ी से क्षय हो रहा है। जलवायु परिवर्तन से उन संसाधनों पर पहले से अधिक दबाव पड़ रहा है जिन पर हम निर्भर हैं और प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े खतरे बढ़ रहे हैं।

ग्रामीण महिलाएं और पुरुष जब अपनी ज़मीन से गुज़ारा नहीं चला पाते तो अवसरों की तलाश में मजबूरन शहरों में जा रहे हैं। प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने की शक्ति पैदा करना दुनिया में भूख से संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अंग है क्योंकि ऐसे संकटों से प्रभावित देशों में इनके कारण खाद्य सुरक्षा के मुद्दे गंभीर हो जाते हैं। साल 2030 सतत् विकास एजेंडा के लक्ष्य 2 का उद्देश्य अगले 15 साल में भूख और हर तरह के कुपोषण को मिटाना व खेती की उत्पादकता दोगुनी करना है। सबके लिए पौष्टिक आहार लगातार सुलभ कराने के लिए टिकाऊ आहार उत्पादन और खेती की विधियों की आवाश्यकता होगी।


भारत में कुपोषण की समस्या क्यों?
भारत में भुखमरी की समस्या वास्तव में खाद्य की अनुउपलब्धता के कारण नहीं है। भारत में अनाज का उत्पादन काफी मात्रा में होता है। देश में मांग और आपूर्ति के बीच अंतराल मुख्य समस्या है। भुखमरी अनाज की अनुउपलब्धता के कारण नहीं है बल्कि पोषक व संतुलित आहार के अभाव के कारण है। जनसंख्या के कुछ वर्गों की खरीद क्षमता में कमी भी एक प्रमुख समस्या है क्योंकि ये वर्ग पोषक खाद्य पदार्थों जैसे- दूध, फल, माँस, मछली, अंडा आदि खरीदने में समर्थ नहीं हैं।

सरकार जनसंख्या के कुछ विशेष वर्गों के लोगों को अनाज 2, 3 या 1 रुपए प्रति किलोग्राम की दर पर उपलब्ध करा रही है लेकिन पोषक खाद्य पदार्थों के संबंध में ऐसा नहीं है। जब तक मिड-डे मील या अन्य कार्यक्रमों के अंतर्गत पोषक खाद्य पदार्थों को शामिल नहीं किया जाता तब तक कुपोषण या भुखमरी की समस्या हल नहीं हो सकती। अभी भी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा पोषण युक्त खाद्य पदार्थों से वंचित है। हमें समाज के गरीब तबके की आय में सुधार के साथ पर्याप्त मात्रा में पोषक पदार्थों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।

भारत में कुपोषण तथा भुखमरी के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिये कई प्रभावशाली योजनाएँ, जैसे-मिड-डेमील, रोजगार गारंटी स्कीम आदि शुरू की गई हैं लेकिन इन योजनाओं के सही क्रियान्वयन के लिये स्थानीय, इंफ्रास्ट्रक्चर तथा ट्रांसपोर्टेशन के स्तर पर नीतियों में बदलाव किये जाने की ज़रूरत है।
इंडियन इंस्टीटूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल एवं 21 टन सब्जियाँ वितरण प्रणाली में खामियों के चलते खराब हो जाती हैं तथा उत्सव, समारोह, शादी−ब्याह आदि में बड़ी मात्रा में पका हुआ खाना बर्बाद कर दिया जाता है।

वर्तमान में देश में मात्र 4 फीसद खाद्य अनाज ही उचित रेफ्रिजरेशन के माध्यम से उपयोग के लिये भेजा जाता है, जबकि 30 प्रतिशत फल और सब्जियाँ रेफ्रिजरेशन के अभाव में बर्बाद हो जाती हैं। सरकार की ओर से महिला स्वयंसेवी समूहों को स्थानीय स्तर पर दूध की खरीदारी में लगाना चाहिये तथा स्थानीय स्तर पर सुगर मिश्रित दूध का वितरण किया जाना चाहिये। भूख तथा कुपोषण के लिये बनाए गए सभी कार्यक्रमों तथा योजनाओं का क्रियान्वयन राज्य सरकारों द्वारा किया जाना चाहिये। केंद्र द्वारा इन योजनाओं के लिये केवल तकनीकी सुझाव तथा आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये।

अगर हम अपने उत्पादन का लाभ गरीब तथा वंचित वर्ग तक पहुंचाना चाहते हैं तो हमें न केवल और अधिक न्यायसंगत वितरण की ज़रूरत होगी बल्कि सक्षम वितरण की आवश्यकता होगी। यह महत्त्वपूर्ण है कि 1951 से अब तक देश के खाद्यान्न उत्पादन में पांच गुना बढ़ोतरी हुई है पर गरीब की खाद्य सुरक्षा अभी सुनिश्चित नहीं हो पाई है। अनाज की प्रति व्यक्ति उपलब्धता बढ़ी है पर साथ में कुपोषण एवं महिलाओं में अनीमिया की समस्या भी गंभीर होती जा रही है।

देश में बड़े स्तर पर खाद्य पदार्थों की पर्याप्त उपलब्धता है लेकिन इसे प्रभावी ढंग से वितरण के लिये नीतिगत बदलाव किये जाने की आवश्यकता है। हमें वितरण व्यवस्था को बदलने की ज़रूरत है ताकि PDS सिस्टम अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सके। विश्व के 27 प्रतिशत कुपोषित लोग भारत में रहते हैं, अभी भी भारत का 1/3 भाग गरीबी रेखा से नीचे है जो दो वक्त की रोटी के लिये मोहताज है लेकिन वहीँ गोदामों में रखा 5 करोड़ टन अनाज बिना गरीबों तक पहुँचे ही सड़ जाता है।

दक्षिण एशिया पर भुखमरी का बोझ अब भी सबसे अधिक है। 28.1 करोड़ अल्पपोषित लोगों में भारत की 40 प्रतिशत आबादी शामिल है। हम अपना आहार कैसे उगाते औऱ खाते हैं इस सबका भूख के स्तर पर गहरा असर पड़ता है, पर ये बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। अगर सही तरह से काम हो तो खेती और वन विश्व की आबादी के लिए आमदनी के अच्छे स्रोत, ग्रामीण विकास के संचालक और जलवायु परिवर्तन से हमारे रक्षक हो सकते हैं। खेती दुनिया में रोज़गार देने वाला अकेला सबसे बड़ा क्षेत्र है, दुनिया की 40 फीसद आबादी और भारत में कुल श्रमशक्ति के 54.6 फीसद हिस्से को खेती में रोज़गार मिला है।


भुखमरी के कारण उत्पन्न समस्याएं

अल्पपोषण : स्वस्थ शरीर के लिये अपेक्षित पोषक पदार्थों की मात्रा जब किसी वज़ह से उपलब्ध नहीं हो पाती है तो व्यक्ति अल्पपोषण का शिकार हो जाता है। इसलिये भोजन की मात्रा के साथ-साथ उसमें गुणवत्ता का होना भी ज़रूरी है। इसका अर्थ है कि भोजन में आवश्यक कैलोरी की मात्रा के साथ-साथ प्रोटीन, विटामिन और खनिज भी पर्याप्त मात्रा में होने चाहिये

चाइल्ड वेस्टिंग : 5 वर्ष तक की उम्र के ऐसे बच्चे जिनका वज़न उनकी लंबाई के अनुपात में काफी कम हो। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2018 के अनुसार, पाँच वर्ष से कम आयु के पाँच भारतीय बच्चों में से कम-से-कम एक बच्चा ऐसा है जिसकी लंबाई के अनुपात में उसका वज़न अत्यंत कम है

चाइल्ड स्टन्टिंग : जिनकी लंबाई उनकी उम्र की तुलना में कम हो। बाल मृत्यु दर (Child Mortality Rate): 5 वर्ष तक की आयु में प्रति 1000 बच्चों में मृत्यु के शिकार बच्चों का अनुपात

पिछले कुछ वर्षों में भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर, फ़ूड चेन, भंडारण गृह, ट्रांसपोर्टेशन सुविधाओं का विकास हुआ है फिर भी इस दिशा में बहुत कुछ किये जाने की आवश्यकता है। पर्याप्त मात्रा में पोषक खाद्य पदार्थों के अतिरिक्त देश में पोषण संबंधी शिक्षा का अभाव है, विशेष रूप से मध्यम वर्ग के लोगों में। अतः पोषण संबंधी शिक्षा तथा जागरूकता के प्रचार-प्रसार की ज़रूरत है। हमें कृषि तथा कृषकों, विशेष रूप से भूमिहीन परिवारों, मजदूरों तथा छोटे एवं सीमांत किसानों पर भी ध्यान देने की जरूरत है जो प्रायः कुपोषण तथा भुखमरी के शिकार होते हैं। भूमिहीन मज़दूर भुखमरी की समस्या से अधिक प्रभावित होते देखे गए हैं। अतः सरकार को ऐसे मज़दूरों की पहचान कर उन्हें भूमि का वितरण किया जाना चाहिये। पश्चिम बंगाल सरकार भूमिहीन मजदूरों को पिछले 5-6 सालों से भूमि वितरण का काम कर रही है। अब तक राज्य के 2.6 लाख परिवार इसका लाभ उठा चुके हैं। अगर ऐसा ही देश के अन्य राज्य भी करें तो अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है।


मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान ऐसी कई योजनाएं चलाई है जो पोषण, खाद्य सुरक्षा और खेती के क्षेत्र में कारगर हो सकें। इसमें नीति आयोग थिंक टैंक की भूमिका का निर्वहन कर रहा है। सतत् विकास के दूसरे लक्ष्य में निहित शून्य भुखमरी, खाद्य सुरक्षा और बेहतर पोषण हासिल करना और सतत् खेती को प्रोत्साहन करने के उदेश्यों को केंद्र सरकार के इन योजनाओं से समझा जा सकता है-

प्रधान मंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम किसान योजना) : भारत के केन्द्रीय अंतरिम बजट में घोषित इस योजना के अंतर्गत सभी लघु एवं सीमान्त किसानों को न्यूनतम आमदनी समर्थन के रूप में हर साल 6,000 मिलेंगे।

मृदा स्वास्थय कार्ड योजना (सॉइल हेल्थ कार्ड) : यह योजना 2015 में आरम्भ की गयी थी। इसका उद्देश्य देश में सभी किसानों को मृदा स्वास्थय कार्ड जारी करने में राज्य सरकारों की सहायता करना है। इन कार्डों में किसानों को उनके खेत की मिट्टी के पोषक तत्वों की जानकारी दी जाती है और मिट्टी की गुणवत्ता तथा उर्वरकता बढ़ाने के लिए ज़रूरी पोषक तत्वों की उचित खुराक बतायी जाती है।

प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) : ‘हर खेत को पानी’ के मूलमंत्र के साथ 1 जुलाई, 2015 को प्रारम्भ की गयी इस योजना का लक्ष्य सिंचाई आपूर्ति श्रृंखला, जैसे कि जलीय स्रोत, वितरण नेटवर्क और खेत स्तर पर प्रयोग में शुरू से अंत तक समाधान उपलब्ध कराना है। इसमें ‘जल संचय’ और ‘जल सिंचन’ के माध्यम से माइक्रो लेवल पर वर्षाजल का संग्रह करके सुरक्षात्मक सिंचाई का निर्माण होता है।

मौसम-आधारित फसल बीमा : मौसम-आधारित फसल बीमा का उद्देश्य प्रतिकूल मौसम, जैसे कि वर्षा, गर्मी, पाला, आर्द्रता, आदि के कारण किसानों को होने वाले नुकसान को कम करना है। बटाईदार और काश्तकार (असामी) सहित सभी किसान जो अधिसूचित क्षेत्र में अधिसूचित फसल उगाते है, इस बीमा सुरक्षा के पात्र हैं।

प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) : पीएमएफबीआई एक बीमा क़िस्त-आधारित योजना है जिसके अंतर्गत किसान को खरीफ के लिए प्रीमियम का अधिकतम 2 फीसद, रबी और तिलहन के लिए 1.5 फीसद, और सालाना वाणिज्यिक/बागवानी फसलों के लिए 5 फीसद अदा करना होता है।

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स्‍वामित्‍व योजना : केंद्र सरकार की यह योजना राष्‍ट्रीय पंचायती दिवस (24 अप्रैल), 2020 को लॉन्‍च की गई थी। पंचायती राज मंत्रालय ही इस योजना को लागू कराने वाला नोडल मंत्रालय है। राज्‍यों में योजना के लिए राजस्‍व/भूलेख विभाग नोडल विभाग हैं। ड्रोन्‍स के जरिए प्रॉपर्टी के सर्वे के लिए सर्वे ऑफ इंडिया नोडल एजेंसी है। योजना का मकसद है कि ग्रामीण इलाकों की जमीनों का सीमांकन ड्रोन सर्वे टेक्‍नोलॉजी के जरिए हो। इससे ग्रामीण इलाकों मे मौजूद घरों के मालिकों के मालिकाना हक का एक रिकॉर्ड बनेगा। वह इसका इस्‍तेमाल बैंकों से कर्ज लेने के अलावा अन्‍य कामों में भी कर सकते हैं।

बढ़ती आबादी हेतु पर्याप्त मात्रा में पोषाहार एवं खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये भारत के अनुसंधान क्षेत्र द्वारा प्रशंसनीय कार्य किया जा रहा है। इस संदर्भ में यह कहना गलत न होगा कि पोषण को और अधिक बेहतर बनाने हेतु भोजन की मात्रा और गुणवत्ता बढ़ाने के साथ-साथ भारतीय अनुसंधान विभाग द्वारा नई खाद्य चुनौतियों का सामना करने हेतु आवश्यक नए विकल्पों के संबंध में भी उल्लेखनीय कार्य किया जा रहा है। एसडीजी2 के उदेश्यों को प्राप्त करने के में लिये भारत को देश-दुनिया के उत्कृष्ट शोध कार्यों का उपयोग किया जाना चाहिये, ताकि आने वाली पीढ़ियों को इस गंभीर संकट से सुरक्षित रखा जा सके।