सतत विकास लक्ष्य SDGs10के लक्ष्य

संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की ओर से सितंबर 2015 में अपनी आम सभा में 17 सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) को पारित करने के बाद यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) को कार्यक्रमों की निगरानी और संरक्षण की जिम्मेदारी सौंप दिया गया। सतत् विकास लक्ष्य 1 जनवरी, 2016 से प्रभाव में आ गए और अगले 15 सालों तक प्रभावी रहेंगे। यूएनडीपी 170 देशों में इन लक्ष्यों की प्राप्ति पर नजर रखेगी। SDGs लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये सरकारी, निजी क्षेत्र, नागरिक समाज और सभी लोगों को आपसी सहयोग से काम करना होगा। आइए इस कड़ी में SDGs 10 के बारे में बात करेंगे। इसका लक्ष्य दुनियाभर में फैली असमानताओं में कमी करना। सतत विकास के 10वें लक्ष्य में असमानताओं में कमी हेतु उत्कृष्ट कार्य के बारे में व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए कुछ विशिष्ट उदेश्य तय किये गये हैं।

असमानताओं में कमी SDGs10 के द्वावारा तय किए गए लक्ष्य के उद्देश्‍य

इसका सबसे बड़ा लक्ष्य साल 2030 तक, जनसंख्‍या के सबसे निचले स्‍तर के 40 फीसद हिस्से की आमदनी में वृद्धि दर निरंतर राष्‍ट्रीय औसत से ऊपर हासिल करना और कायम रखना। इसके साथ-साथ साल 2030 तक, आयु, सेक्‍स, विकलांगता, नस्‍ल, जातीयता, मूल, धर्म या आर्थिक अथवा किसी अन्‍य हैसियत के भेदभाव के बिना सभी के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समावेशन को प्रोत्‍साहन देना और सशक्‍त करना।

समान अवसर सुनिश्चित करना तथा परिणाम की असमानताएं कम करना। इसमें भेदभावपूर्ण कानूनों, नीतियों और प्रथाओं को मिटाना तथा इस संदर्भ में उपयुक्‍त कानूनों, नीतियों और कार्रवाईयों को प्रोत्‍साहन देना शामिल है। विशेषकर राजकोषीय, वेतन और सामाजिक संरक्षण नीतियां अपनाना तथा धीरे-धीरे पहले से अधिक समानता हासिल करना।
वैश्विक वित्‍तीय बाजारों और संस्‍थाओं के विनियमन और‍ निगरानी में सुधार करना तथा ऐसे विनियमों पर अमल को सशक्‍त करना।

वैश्विक स्‍तर पर अंतर्राष्‍ट्रीय आर्थिक एवं वित्‍तीय संस्‍थाओं में निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्‍व दिलाना और उनकी आवाज सुना जाना जिससे संस्‍थाएं अधिक असरदार, विश्‍वसनीय, जवाबदेह और वैध हो सकें। विकासशील देशों, विशेषकर सबसे कम विकसित देशों के लिए विश्व व्यापार संगठन समझौते के अनुसार विशेष तथा अलग-अलग व्‍यवहार के सिद्धांत को लागू करना।

सरकारी विकास सहायता और प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश सहित वित्‍तीय प्रवाह को सबसे अधिक जरूरतमंद उन देशों, विशेषकर सबसे कम विकसित देशों, अफ्रीकी देशों, छोटे द्वीपीय विकासशील देशों और भूमि से घिरे विकासशील देशों की राष्‍ट्रीय योजनाओं और कार्यक्रमों के अनुसार प्रोत्‍साहित करना। 2030 तक, प्रवासियों द्वारा भेजी गई राशि की लेनदेन लागत घटाकर 3 फीसद से भी कम करना और रकम भेजने के ऐसे प्रेषण गलियारों को समाप्‍त करना जिनमें लागत 5फीसद से अधिक हो।

सतत विकास के 10वे लक्ष्य में भारत की स्थिति
भारत के लिए आय में असमानता का गिनि कोएफिशिएंट 2010 में 36.8 फीसद था, जो घटकर 2015 में 33.6 फीसद रह गया। तीन तरफा जनधन-आधार-मोबाइल कार्यक्रम पर भारत सरकार जितना बल दे रही है, उसका उद्देश्‍य समावेशन, वित्‍तीय सशक्तिकरण और सामाजिक सुरक्षा की एक समग्र रणनीति है। यह प्राथमिकताएं 2030 तक सबके लिए समानता हासिल करने और सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक समावेशन को प्रोत्‍साहित करने के उद्देश्‍यों के अनुरूप हैं।

जनधन-आधार-मोबाइल कार्यक्रम

जन-धन, आधार और मोबाइल नंबर को संयुक्त रूप से जैम कहा जाता है। इसका उद्देश्य सुरक्षित और बिना किसी बाधा के डिजिटल भुगतान तंत्र का विकास करना है । इसके अलावा इसमें सभी भारतीयों को और विशेष रूप से गरीबों को डिजिटल मुख्य- धारा का हिस्सा बनाना है।

इससे सरकार और गरीब दोनों को लाभ हो रहा है। गरीब वित्तीय सेवाओं का उपयोग कर पा रहे हैं। सरकार को सब्सिडी का बोझ घटने और लीकेज़ ख़त्म होने से राहत मिल रही है। वह ज़रुरतमंदों तक संसाधनों को तेज़ी से एवं सुरक्षित तरीके से पहुँचा पा रही है। वर्तमान में, सरकार हर साल 35 करोड़ लाभार्थियों के खातों में 74000 करोड़ रुपए सीधे हस्तांतरित करती है।

वर्तमान में, भारत में 52.4 करोड़ आधार नंबरों को 73.62 करोड़ खातों से जोड़ा जा चुका है। जनधन-आधार-मोबाइल कार्यक्रम के चलते गरीब लोग प्रत्येक महीने लगभग 7 करोड़ रुपए इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भुगतान कर पा रहे हैं प्रधानमंत्री जन-धन योजना ने मुद्रा योजना के कार्यान्वयन में भी मदद की है, जिसमें से 3.66 लाख करोड़ रुपए 8.77 करोड़ लाभार्थियों को वितरित किये गए हैं। इसके साथ ही मुद्रा योजना भी शुरुआत 8 अप्रैल 2015 में की गई थी। इसका उद्देश्य लघु उद्योगों को वित्तीय सहायता पहुँचाकर देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करना है।

यह क्‍यों जरुरी हैं?
असमानता प्रगति में बाधक होती है, जब वह लोगों से अवसर छीनती है और बहुत से लोगों को निपट गरीबी की हालत में धकेल देती है। उदाहरण के लिए 2000 के दशक के अंतिम वर्षों में दक्षिण एशिया में सबसे दौलतमंद जनसंख्‍या के बच्‍चों के लिए प्राइमरी स्‍कूल की पढ़ाई पूरी करने की संभावना सबसे गरीब वर्गों के बच्‍चों की तुलना में दोगुनी अधिक थी। लैटिन अमरीका और पूर्व एशिया में सबसे गरीब परिसंपत्तियों वाले वर्गों में पांच वर्ष की आयु से पहले ही बच्चों की मृत्‍यु की आशंका सबसे अमीर वर्गों के बच्चों की तुलना में तीन गुना अधिक है।

इस बात पर सहमति बढ़ रही है कि आर्थिक वृद्धि यदि समावेशी नहीं है और यदि उसमें सतत् विकास के तीनों पहलू- आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरण संबंधी- शामिल नहीं हैं तो वह गरीबी कम करने के लिए पर्याप्‍त नहीं है। बढ़ती असमानताएं मानव विकास पर विपरीत असर डालती हैं। असमानता समायोजित मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के अनुसार असमानता के कारण सहारा के दक्षिण में अफ्रीकी देशों की एचडीआई की क्षति 33फीसद और दक्षिण एशिया की 25फीसद रही।