विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) में जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं सलाहकार डॉ. अखिलेश गुप्ता ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन 5 बड़ी अंतर्राष्ट्रीय प्राथमिकताओं- जल, स्वास्थ्य, पर्यावरण, कृषि और ऊर्जा को प्रभावित करता है और इससे निपटने के लिए ग्लेशियरों के अध्ययन, जलवायु मॉडल, शहरी जलवायु, एयरोसोल अध्ययन, अति प्रतिकूल घटनाओं और हिमालयी पारिस्थितिकी के शोध पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।

डॉ. गुप्ता ने विश्व जल दिवस, 22 मार्च को आयोजित एक वेबिनार में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का जिक्र किया और अगले पांच वर्षों में इससे निपटने के डीएसटी की योजनाओं की जानकारी भी दी। उन्होंने कहा “तापमान बढ़ रहा है और इसमें लगातार बढ़ोतरी होगी और यदि जलवायु परिवर्तन को रोका नहीं गया तो इससे समुद्री जलस्तर में भी बढ़ोतरी होगी।

देशों में बड़े-बड़े महानगरों में अधिक जनसंख्या घनत्व के कारण वर्षा की तीव्रता में वृद्धि हो रही है और अचानक से आने वाली बाढ़ की घटनाएं तथा वर्षा में असमानता जैसी प्रवृतियां भी दिख रही हैं। वातावरण में पाये जाने वाले एयरोसोल्स जटिल एरोसोल-क्लाउड अंतर संपर्क प्रक्रियाओं के कारण बारिश की प्रवृत्तियों में बदलाव ला रहे हैं।

ड़ॉ. गुप्ता ने आईआईएससी के एक वैज्ञानिक के हाल ही के शोध का हवाला भी दिया जिसे विज्ञान में प्रकाशित किया गया है। उन्होंने कहा कि सभी अल नीनो की घटनाएं सूखे का कारण नहीं है और सूखे की सभी घटनाएं अल नीनो के कारण नहीं होती हैं। उन्होंने कहा ये दो प्रकार के मानसूनी सूखे न केवल उनकी सामुद्रिक स्थिति बल्कि उनकी मौसमी विकासात्मक घटनाओं के नजरिए से भी अलग-अलग है। प्रशांत क्षेत्रों के बजाए उत्तर अटलांटिक क्षेत्रों में अल नीनो सूखे के दौरान सतह के तापमान में भी काफी कमी आ जाती है।

अल नीनो सूखे की प्रक्रिया के कारण वर्षा की कमी गर्मियों की शुरूआत में होने लगती है और मध्य अगस्त तक यह काफी बदतर हो जाती है तथा पूरे देश में बड़े पैमाने पर वर्षा की कमी होने लगता है और स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता है। गैर अल नीनो सूखे के दौरान जून माह में मध्यम स्तरीय सूखा देखा जाता है लेकिन मध्य जुलाई से मध्य अगस्त तक इसमें काफी सुधार दिखने लगता है और अगस्त के तीसरे हफ्ते तक एक बार फिर बारिश की जबर्दस्त कमी देखने को मिलती है और अगले तीन हफ्तों तक पूरे देश को बारिश की कमी का सामना करना पड़ता है।

डॉ. गुप्ता ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के लिहाज से सभी भारतीय राज्य संवेदनशील हैं और “झारखंड सबसे अधिक प्रभावित होने वाला राज्य है और महाराष्ट्र में सबसे कम असर रहता है। जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले शीर्ष 8 राज्यों में झारखंड, मिजोरम, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, असम, बिहार, अरुणाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल हैं। असम में लगभग 90 प्रतिशत, बिहार में 80 प्रतिशत और झारखंड में 60 प्रतिशत जिले जलवायु परिवर्तन के लिहाज से अधिक असुरक्षित हैं।

डॉ. गुप्ता ने कहा कि इस तरह की समस्याओं से निपटने के प्रयास में, डीएसटी के जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम ने 1500 शोध पेपर तैयार किए हैं, जिनमें से 1000 से अधिक अंतरराष्ट्रीय जर्नलों में प्रकाशित हुए हैं। इसके अलावा 100 नई तकनीके विकसित की हैं, 350 कार्यशालाओं का आयोजन, 250 राज्य स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए गए हैं जहां 50,000 लोगों को प्रशिक्षित करने के अलावा छात्रों, शोधार्थियों और विद्वानों की क्षमता निर्माण पर ध्यान दिया गया। विभाग ने जन जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन भी किया, जिसमें 1.5 लाख से अधिक लोगों ने सहभागिता की।

इस कार्यक्रम में प्रो. के. शिव राम कृष्ण, वाइस चांसलर कुलपति, गीतम, प्रो जयशंकर वरियार, प्रो-वाइस-चांसलर, गीतम, प्रो ए. सुब्रह्मण्यम, डीन ऑफ साइंसेस, गीतम और प्रोफेसर एम. शरतचंद्र बाबू, प्रिंसिपल, जीआईएस, गीतम ने भी हिस्सा लिया। विश्व जल दिवस – 2021 की थीम ‘पानी की कीमत पहचाने’ पर एक नेशनल ई वेबीनार का आयोजन गीतम इंस्ट्यूट ऑफ साइंस विशाखापत्तनम के पर्यावरण विज्ञान विभाग ने किया था। इस दौरान पीने योग्य पानी की कमी और जनसंख्या में बढोतरी के कारण जल आपूर्ति से जुड़ी समस्यओं पर प्रकाश डाला गया।