शी जिनपिंग और पुतिन की तरह सत्ता को कंट्रोल करना चाहते थे ट्रंप


भारत के लिए यह चुनाव परिणाम आश्चर्य से भरा है। सुखद भी है, दुखद भी है। विश्व भर के तमाम देशों की विदेश नीति को दरकिनार करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के हुस्टन शहर में अमेरिका की घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप की कोशिश की।


संजीव पांडेय संजीव पांडेय
मत-विमत Updated On :

डोनाल्ड ट्रंप चुनाव हार चुके हैं। जो बाइडेन अमेरिका के अगले राष्ट्रपति होंगे। बाइडेन नई चुनौतियां के साथ अमेरिका के अगले राष्त्रपति होंगे। उन्हें घरेलू चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। एक बिखरे हुए सामाजिक ताने-बाने की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। चुनावों के दौरान अमेरिकी सामाजिक व्यवस्था में अंसतोष नजर आया। अमेरिका में हथियारों की बिक्री तेज हो गई और लाखों की संख्या में हथियार चुनाव प्रचार के दौरान बिक गए। हथियारों की इस बिक्री के लिए सीधे तौर पर ट्रंप जिम्मेवार है।

हालांकि इससे अमेरिका के गन लॉबी को खासा मुनाफा हुआ जिनका सलाना कारोबार 20 अरब डालर के करीब है। लेकिन अमेरिकी समाज में इससे हिंसा की आशंका बढ़ी हुई है। आखिर बाइडेन भविष्य में आने वाली इन चुनौतियों से कैसे निपटेंगे यह समय बताएगा। ट्रंप ने अमेरिकी फेडरल एजेंसियों को अपने हिसाब से कंट्रोल करने की कोशिश की। फेडरल एजेंसियों का राजनीतिकरण किया। विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल किया। आखिर बाइडेन के सामने यह भी एक बड़ी चुनौती है।

सवाल यही उठ रहे हैं कि ट्रंप ने दुनिया से क्या सीखा? दुनिया को क्या दिया? चूंकि ट्रंप ने अपने आप को राष्ट्र से ऊपर माना। इसलिए उन्होंने कई वैश्विक संस्थाओं को चुनौती दी। उनसे अमेरिका को अलग किया। दुनिया को संकेत दिया कि अगर वे साथ नहीं रहेंगे तो वैश्विक संस्थाएं नहीं चलेगी। ट्रंप ने दुनिया के कुछ डेमोक्रेट तानाशाहों और कुछ देशों में मौजूद वन पार्टी सिस्टम के नेताओं से बहुत कुछ सीखने की कोशिश की। उसी का परिणाम था रिपब्लिकन पार्टी पर ट्रंप दवारा नियंत्रण की कोशिश।

चुनावों में हार के बाद जिस तरह से डोनाल्ड ट्रंप जूनियर ने कुछ रिपब्लिकन लीडरों पर धोखा देने का गंभीर आरोप लगाया है, वह यह बताता है कि ट्रंप को लेकर रिपब्लिकन पार्टी में नाराजगी थी। इसके वाजिब कारण थे। ट्रंप और उनका परिवार रिपब्लिकन पार्टी को पूरी तरह से कंट्रोल में लेकर परिवार की पार्टी बनाने के खेल में लग गए थे। इसके लिए कारपोरेट सेक्टर का सहयोग भी लिया जा रहा था। बताया जाता है कि ट्रंप और उनके परिवार ने अपने ही पॉलिटिकल पार्टी को कंट्रोल में लेने की कला चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति पुतिन से सीखी।

पिछले चार सालों में व्हाइट हाउस के फैसले साफ बता रहे थे कि ट्रंप का परिवार ही अमेरिका की बड़ी नीतियों के निर्धारण में अहम भूमिका निभा रहा है। ट्रंप अपने फैसलों से अपने पर्सनल फॉलोविंग को बढ़ा रहे थे, अपने कद को रिपलब्किन पार्टी से ऊपर कर रहे थे। वैसे मे पार्टी के अंदर ही ट्रंप को नुकसान पहुंचना तय था। व्हाइट हाउस पर ट्रंप के बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर, बेटी इवांका ट्रंप और दामाद जेरेड कुशनर का कब्जा था। ट्रंप के मुख्य एडवाइजर भी यही थे।

जेरेड कुशनर, डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और इवांका ट्रंप अमेरिका की तमाम नीतियों को प्रभावित कर रहे थे। चूंकि ट्रंप परिवार खुद बड़ा कारोबारी है और जेरेड कुशनर भी कारोबारी है, इसलिए विदेश नीति संबंधी तमाम फैसलों में ट्रंप परिवार के कारोबारी हितों को बढ़ाया गया। इजरायल और अरब देशों के बीच मध्यस्थ बने कुशनर के अपने आर्थिक हित रहे है।

भारत के लिए यह चुनाव परिणाम आश्चर्य से भरा है। सुखद भी है, दुखद भी है। विश्व भर के तमाम देशों की विदेश नीति को दरकिनार करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के हुस्टन शहर में अमेरिका की घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप की कोशिश की। हालांकि अमेरिका में भारतीय मूल के मतदाता बमुश्किल 20 लाख है। यह कुल मतदाता का लगभग 1 प्रतिशत बनता है। इसके बावजूद मोदी ने हुस्टन में आयोजित भारतीय मूल के लोगों के कार्यक्रम ‘हाउडी मोदी’ में कहा “अबकी बार ट्रंप सरकार”।

मोदी के इस एलान से दुनिया के तमाम देश आश्चर्यचकित थे। यह भारतीय विदेश नीति पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था। क्योंकि ज्यादातर भारतीय मूल के लोग अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन करते है। चुनाव परिणाम भी यही बताता है कि भारतीय मूल के मतदाताओं ने जो बाइडेन का साथ दिया। मोदी के नारे से अमेरिका में बसे भारतीय मूल के लोग भी असहज हो गए। हालांकि ट्रंप की विदाई और बाइडेन की ताजपोशी भारत-अमेरिका संबंधों पर असर नहीं डालेगी।

1990 के बाद भारत अमेरिका संबंधों को नए तरीके से निर्धारित किया गया। दोनों मुल्कों के बीच सहयोग की भावना आयी, क्योंकि अमेरिका को भारत की जरूरत है और भारत को अमेरिका की जरूरत है। चाहे अमेरिका में डेमोक्रेट का शासन हो या रिपब्लिकन का, भारत में कांग्रेस का शासन हो या भाजपा का, भारत- अमेरिका संबंधों में खास उतार चढ़ाव नहीं आया। संबंध बेहतर बनाने को लेकर दोनों मुल्क आगे आए।

चूंकि भारत डिफेंस और ऑयल का बड़ा बाजार है, वैसे में जो बाइडेन अमेरिकी कारपोरेट सेक्टर के हितो को कतई नजर अंदाज नहीं करेंगे। लेकिन भारत के लिए बाइडेन पाकिस्तान के खिलाफ आक्रमक कतई नहीं होंगे। वहीं चीन को लेकर बाइडेन की भाषा में वो आक्रमकता नहीं होगी जो ट्रंप की भाषा में रही है।

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत को अमेरिकी लोकतंत्र की कुछ बदसूरत और और खूबसूरत पहलूओं से सीखना होगा। जो बाइडेन ने अपनी ही डेमोक्रेटिक पार्टी में विरोधी कमला हैरिस को उप राष्ट्रपति का उम्मीदवार चुना। ये अमेरिकी लोकतंत्र की खूबसूरती है। बाइडेन ने उस अफ्रीकी-भारतीय मूल के कमला हैरिस को उम्मीदवार बनाया जो अमेरिका में अल्पसंख्यक है। क्या भारत के राजनीतिक दलों में यह संभव है?

भारत के तमाम राजनीतिक दलों के अंदर काबिज लोगों का विरोध कर क्या कोई उनकी ही पार्टी का कोई नेता उच्च पद हासिल कर सकता है? अमेरिका में बिना चुनाव आयोग के चुनाव निष्पक्षता से हो गए है। भारत में स्वतंत्र चुनाव आयोग के रहते हुए भी क्या चुनाव निष्पक्षता से हो जाते है? हां अमेरिकी लोकतंत्र का एक बदसूरत चेहरा भी है। अमेरिका के दोनों प्रमुख दलों को कारपोरेट सेक्टर ही नियंत्रित करता है। चुनावों के दौरान दोनों दलों को कारपोरेट सेक्टर से अरबों डालर का चंदा मिलता।

अमेरिकी फार्मा सेक्टर, डिफेंस सेक्टर और एनर्जी सेक्टर की कंपनियां अमेरिकी लोकतंत्र को खासा प्रभावित करती है। निश्चित तौर पर अमेरिकी लोकतंत्र के इस बदसूरत चेहरे को भारतीय लोकतंत्र ने जरूर अपनाया है। तमाम राजनीतिक दल कारपोरेट सेक्टर के चंदे पर निर्भर है, उनके इशारे पर नीतियां बनाते है।

बाइडेन के लिए ट्रंप ने एक लक्ष्मण रेखा खींच दी है। ट्रंप के ‘अमेरिका फर्स्ट’ से बाइडेन संभल के ही पीछे हटेंगे। अमेरिका के ग्रामीण इलाके में ट्रंप को खासे वोट मिले है। गांवों में मौजूद ‘व्हाइट’ आबादी ने ट्रंप को जमकर वोट किया है। कई राज्यों मे डेमोक्रेटिक पार्टी को ग्रामीण इलाकों मे ट्रंप के मिले वोट से निराशा हुई। क्योंकि ट्रंप की संरक्षणवादी नीति ने गोरे किसानों को लाभ पहुंचाया। ट्रंप ने चीन समेत दुनिया के कई देशों पर अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद के लिए दबाव बनाया। इसका लाभ अमेरिकी किसानों को भी मिला।

हालांकि बाइडेन ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों से हटेंगे, पर सम्हल कर। पर सीमा क्या होगी यह समय बताएगा? हां अमेरिकी कारपोरेट सेक्टर में एक घबराहट यह है कि बाइडेन कारपोरेट टैक्स बढ़ाकर 28 प्रतिशत तक कर सकते है। बाइडेन कारपोरेट टैक्स बढ़ाकर सरकारी खजाने की आमदनी बढ़ाना चाहते ताकि संघीय सरकार गरीबों, बेरोजगारों और वर्किंग क्लॉस को ज्यादा लाभ देने की स्थिति में सरकार आ जाए।