श्रद्धांजलि: जब चौधरी के चेले मुझे धमकाने पहुंचे…


ये बात मार्च महीने की थी। किसान आंदोलन पर बात चली। बोले थे, अब सेंगर, मैं दस साल और जीना चाहता हूं। किसानों का साथ देना है। उनके जरिए मोदी,योगी की निरंकुशता से जूझना है। मैंने कुछ कहा, तो बोले, वीरेंद्र, अब सत्ता का कोई मोह नहीं बचा। लेकिन किसानों को जीत का सिकंदर बना देखना चाहता हूं। आखिरी तमन्ना है।


वीरेंद्र सेंगर
मत-विमत Updated On :

आप भी साथ छोड़ गए। ऐसे दौर मे जब आंदोलनकारी किसानों को आपकी बहुत जरूरत थी। तमाम कारणों से आप कई सालों से खामोशी के बियाबान में थे। फोन पर मैं आपकी खामोशी तोड़ने की कोशिश करता था। आप का जवाब मायूसी वाला ही होता था।

अक्सर यही कहते थे,सेंगर किसके लिए करूँ श्रंगार सजनी, मोर पीयू तो हुए आंधर!मैं इसका प्रतिकार करता। कहता, भाई साहब आप इतने कायर तो कभी नहीं थे? वे कुछ क्षणो के लिए चुप हुए थे। मुझे लगा वे नाराज हो गए है।तभी आवाज आई, सेंगर आज मैं तुम्हारे नाम में जी नहीं लगा रहा। मैं बुजुर्ग हूं। 82 का हो चला हूँ। इसी के साथ उन्होंने जोर का ठहाका लगाया।

ये बात मार्च महीने की थी। किसान आंदोलन पर बात चली। बोले थे, अब सेंगर, मैं दस साल और जीना चाहता हूं। किसानों का साथ देना है। उनके जरिए मोदी,योगी की निरंकुशता से जूझना है। मैंने कुछ कहा, तो बोले, वीरेंद्र, अब सत्ता का कोई मोह नहीं बचा। लेकिन किसानों को जीत का सिकंदर बना देखना चाहता हूं। आखिरी तमन्ना है।

फिर बोले, बहुत साल हो गये साथ-साथ खाना नहीं खाया। आ जाओ अपने दोस्त, विनोद के साथ। विनोद यानी वरिष्ठ पत्रकार, विनोद अग्निहोत्री। भाई साहब! उनका उपनाम जैसा था। मैं अक्सर विनोद के साथ ही भाई साहब से मुलाकात करता था। वे कभी भोजन घर में नहीं कराते थे। फाइव स्टार में ही कराते थे। डिनर पर कभी नहीं ले गए। कहते थे, तुम तो सिर्फ नाम के ठाकुर हो, कुछ लेते ही नहीं। विनोद का तो समझ में आता है।वो पंडित जी हैं। ये ताना देकर वे जोरदार ठहाका लगा देते। आप का वो बेलौस ठहाका बहुत याद आएगा भाई साहब!

जब मैंने कहा था, कोरोना कुछ कमजोर पड़ेतो आपके फॉर्म हाऊस में आता हूं। जवाब में फिर वही ठहाका। आप बोले थे। यार! कैसे ठाकुर हो! जीवाणु से डर गए। फिर बोले थे, चलो होटल में लंच करते हैं। मैंने भी चुटकी ली। भाई साहब, फिरपेमेंट मेज के नीचे से नोट गिनकर करोगे? आपने झिड़का था। बहुत शरारती हो।

कई बार मतभेद भी हुए। ओमप्रकाश चौटाला पर एक रिपोर्ट लिखी थी। अमर उजाला के सभी संस्करणों में बॉटम स्टोरी थी। आप तुनक गए थे। में दरियागंज कार्यालय में बैठता था। शाम को आप के कुछ चेले धमकाने आ धमके थे। मैंने आपको फोन किया था, तो आपने अपनी मासूमियत जाहिर की। कुछ देर बाद, वे लड़के
लौटे। हाथ में गुलाब के फूल और मिठाई थी। लड़कों ने माफी मांगी।

एक ने बता भी दिया कि भाई साहब ने ही आपको धमकाने के लिए भेजा था। आपके फोन के बाद फिर ये स्वांग करने के लिए भेजा है। वैसे हम आपकी रिपोर्ट बहुत पसंद करते हैं, देर रात फिर बात हुई। मैंने कहा भाई साहब आप भी सभी खेल सीख गये हैं। आपने ठहाका लगाया था। जल्दी ही सब ठीक हो गया था। आपकी शिकायत रहती थी। यही कि मैं सोमपाल शास्त्री से बहुत दोस्ती क्यों रखता हूँ? आप से इस पर कई बार संवाद भी हुआ था।

हाल की बातचीत में आपने कहा था, वीरेंद्र! सोमपाल और मेरी मीटिंग कराओ। साथ में तुम भी रहना। मैंने सोमपाल जी से घुमा -फिराकर बात भी की थी। वे उत्साहित थे। मैंने आपको ये बताया भी था। फिर आपको कोरोना ने ही जकड़ लिया। सादर नमन। आपकी क्या-क्या बात याद करूँ?। 1987 से आपसे जुड़ा था। सर ! अलविदा!