क्या है मजबूरी, पुलिस क्यों लेती है मुठभेड़ का सहारा ?


भारतीय दंड संहिता के तहत अदालतों से अपराधी को सजा मिलने की डर मात्र 40 प्रतिशत है। यानी 60 प्रतिशत अपराधी येन-केन प्रकारेण अदालतों से बरी ही हो जाते हैं। अदालतों से सजा भी केवल गंभीर अपराधियों को ही मिल पाती है। यौन उत्पीड़न जैसे मामलों में अपराधी को सजा मिलने की दर तो बहुत कम है।



कानपुर के दुर्दांत समझे जाने वाले अपराधी विकास दुबे की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत के बाद एक बार फिर पुलिस मुठभेड़ में होने वाली मौत का मुद्दा राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। यह सही है कि अपराधी जो भी हो उसे अपराध की सजा अवश्य मिलनी चाहिए। इसके साथ ही यह बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि अपराधी को सजा देने का काम पुलिस का नहीं अदालत का है। अदालत हमारे संविधान के प्रावधानों का अनुपालन करते हुए अपराधी को उसके बचाव का पूरा मौका देने के बाद ही उसके अपराध के अनुरूप सजा सुनाती है। दुर्भाग्य से हमारे देश के अधिकांश राज्यों की पुलिस विकास दुबे जैसे अपराधियों के अधिकांश मामलों में खुद ही सजा देने का काम कर देती है और जब भी ऐसा होता है पुलिस कुछ गलतियां भी कर जाती है और यही गलतियां पुलिस की कमजोरी बन कर चर्चा का मुद्दा बन जाती हैं। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ। 

उज्जैन से कानपुर आते हुए चलती कार का पलट जाना एक दुर्घटना हो सकती है लेकिन विकास जैसे दुर्दांत अपराधी को 700 किलोमीटर दूर का सफ़र कराने के दौरान हथकड़ी भी न लगाना समझ से परे है, जबकि ऐसे अपराधी को जिसके उपर एक हफ्ते पहले ही 8 पुलिसकर्मियों की मौत का आरोप हो उसे तो पुलिस नियमों के हिसाब से हथकड़ी के साथ ही बेड़ियों में भी जकड़ा होना चाहिए था। यही नहीं एक गलती और भी हुई वो यह कि जिन पुलिसकर्मियों को गारद से बन्दूक, राइफल और पिस्तौल जैसे असलहे दिए जाते हैं उनसे यह उम्मीद भी की जाती है कि वो अपने सरकारी असलहों को अपनी बेल्ट या शरीर के किसी हिस्से के साथ किसी जंजीर या डोरी के साथ लटका कर रखे ताकि कोई अपराधी इनका दुरुपयोग न कर सके। इस केस में ऐसा ही हुआ अपराधी ने पुलिस के सिपाही की पिस्तौल को ही भागने और पुलिस वालों पर हमला करने का साधन बनाया था।

इन हालात में रह-रह कर यह सवाल भी पैदा होता है कि आखिर हमारे देश की पुलिस अपराधी को अदालत तक पहुंचाने के बजाय खुद ही सजा देने का फैसला ले लेती है। पुलिस ऐसा क्यों करती है इसकी एक वजह शायद यह भी हो सकती है कि हमारे यहां न्यायिक प्रक्रिया इतनी पेचीदी और गलत है कि अधिकांश मामलों में अपराधी अदालतों से बरी हो जाते हैं। हमारे यहां अदालतों के माध्यम से अपराधियों को सजा देने की दर बहुत कम है। हैरानी की बात है कि भारतीय दंड संहिता के तहत अदालतों से अपराधी को सजा मिलने की डर मात्र 40 प्रतिशत है। यानी 60 प्रतिशत अपराधी येन-केन प्रकारेण अदालतों से बरी ही हो जाते हैं। अदालतों से सजा भी केवल गंभीर अपराधियों को ही मिल पाती है। यौन उत्पीडन जैसे मामलों में अपराधी को सजा मिलने की दर तो बहुत कम है।

अपराधियों को सजा देने की दर धीरे-धीरे कम होती जा रही है। जानकारी के मुताबिक़ 2016 में गंभीर अपराध के मामलों में सजा देने की यह दर 46 प्रतिशत थी जो अब घट कर 40-41 प्रतिशत रह गई है। चार साल पहले (2016 ) की बात करें तो गंभीर ओराध के मामलों में 5 लाख 76 हजार लोगों को सजा मिली थी जबकि 6 लाख 78 हजार से ज्यादा आरोपी अदालतों से बरी हो गए थे। अदालतों से अपराधियों के इस तरह बच कर निकल जाने से भी कई बार पुलिस बल की परेशानी और तनाव बढ़ जाता है। पुलिस को जब ऐसा लगने लगता है कि विकास दुबे जैसा शातिर अपराधी भी अदालत को गच्चा देकर बरी हो सकता है तब फिर मायूसी में ही सही पुलिस उसे अदालत पहुंचने से पहले ही ठिकाने लगाना ज्यादा ठीक समझती है शातिर अपराधियों को ठिकाने लगाने का पुलिस के पास सबसे बेहतर तरीका मुठभेड़ ही तो है।

विकास दुबे से पहले भी असंख्य अपराधी पुलिस मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं। हाल की वर्षों की बात करें तो कुख्यात वन ब्रिगेड वीरप्पन को भी इसी तरह 18 अक्टूबर 2004 को पुलिस मुठभेड़ में मार दिया गया गया था। कुछ साल पहले ही दिल्ली के जामिया स्थित बाटला हाउस चर्चित इनकाउंटर मामले दिल्ली पुलिस के एक इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की भी आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ में मौत हो गई थी। कुछ संदिग्ध आतंकवादी भी इस घटना में मारे गए थे। इससे पहले उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में 1991 के एक कथित इनकाउंटर मामले के सम्बन्ध में अदालत ने 47 पुलिस कर्मियों को साल 2016 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। 1991 के कथित इनकाउंटर मामले में 11 सिख तीर्थ यात्रियों की हत्या कर दी गई थी। 

इसके बाद 6 दिसम्बर 2019 का वह इनकाउंटर सभी को आज तक याद ही है जिसमें हैदराबाद की एक महिला पशु चिकित्सक के साथ बलात्कार के बाद हत्या कर देने के मामले में चार आरोपियों को पुलिस मुठभेड़ में मार दिया गया था। मुठभेड़ की ये घटनाएं फौरी तौर पर इंसान को बहुत सूकून देती हैं और आम जनता को लगता है कि पुलिस ने अपराध का बदला ले लिया है। पर इनकाउंटर के परिणाम बाद में बहुत परेशानी भी पैदा करते हैं। दिल्ली पुलिस के जो इंस्पेक्टर बाटला काण्ड में मारे गए थे वो भी एक इनकाउंटर एक्सपर्ट ही थे। इस क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि देश के ज्यादातर इनकाउंटर एक्सपर्ट पुलिसकर्मियों की मौत भी एक दिन ऐसी ही किसी मुठभेड़ में होती है। दिल्ली पुलिस के ही एक और नामी इनकाउंटर एक्सपर्ट हुआ करते थे राजबीर सिंह। अपनी कर्तव्य परायणता के चलते ही उनको सब इंस्पेक्टर से सहायक पुलिस आयुक्त तक की पदोन्नति भी मिली लेकिन पुलिस सेवा से अवकाश लेने के बाद उनकी भी एक ऐसे हादसे में मौत हो गई थी।

कहना गलत नहीं होगा कि अपराधी को सजा तो जरूर मिले लेकिन सजा देने का काम पुलिस नहीं अदालत करे इससे न्याय पालिका, पुलिस और प्रशासन सभी का महत्त्व भी बना रहेगा और अपराध पर नियंत्रण भी किया जा सकेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा करना क्यों जरूरी है, इस सम्बन्ध में हमारे एक वरिष्ठ साथी गोपाल राठी ने जो कहा है उसका यहां उल्लेख करना प्रासंगिक भी है और महत्वपूर्ण भी। उनके शब्दों में कहा जाए तो- 

“राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे और उनकी घृणित विचारधारा के खिलाफ पूरे देश में जबरदस्त आक्रोश था। उस समय अगर सरकार सब कुछ खुला छोड़ देती तो नाथूराम गोडसे और उनके साथियों का जनता ही इनकाउंटर कर देती। तब सरकार ने मामले की गम्भीरता को देख समझ कर बहुत सावधानी से काम किया और नाथूराम गोडसे को पर्याप्त सुरक्षा देने के साथ ही उनके पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा कर उनको जनाक्रोश से भी बचाया। यही नहीं सरकार ने नाथूराम गोडसे को अदालत में अपना बचाव करने का पूरा मौका भी दिया और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही गांधी की हत्या का आरोप सिद्ध होने पर उन्हें मृत्युदंड दिया गया, तब सरकार चाहती तो जेल लाने -ले जाने के बहाने कभी भी उनका इनकाउंटर कर सकती थी।”

इसी तरह- “पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उन्ही के अंगरक्षकों द्वारा हत्या कर देने के बाद भी भारत की तत्कालीन सरकार भी उनके हत्यारों का आसानी से एनकाउंटर कर सकती थी और इस पर कोई बवाल भी नहीं मचता। लेकिन इंदिरा गांधी के हत्यारों को भी पुलिस ने नहीं अदालत ने सजा दी थी। बात यहीं तक सीमित नहीं है, मुंबई में हुए आतंकी हमले में पकडे गए आतंकवादी अफजल कसाब को भी उस समय प्राप्त विडियो साक्ष्य के आधार पर एनकाउंटर के जरिये तत्काल मौत के घाट उतारा जा सकता था लेकिन ऐसा करने के बजाय सरकार और पुलिस ने आतंकवादी कसाब को भी अदालत के माध्यम से अपना बचाव करने का पूरा मौका दिया और अदालत से सजा दिलवा कर पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया को यह सन्देश भी दिया कि भारत में आज भी क़ानून का राज चलता है न कि जंगल का।” इस पृष्ठभूमि में जब हम इसके ठीक विपरीत एनकाउंटर के जरिये अपराधियों को ठिकाने लगाने में लगे रहते हैं तो निश्चित ही भारत की छवि पर भी प्रतिकूल असर ही पड़ता है।