दुष्यंत कुमार की साहित्य चेतना का निर्माण इलाहाबाद के परिवेश में हुआ : प्रो विनोद तिवारी

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नयी दिल्ली। दिल्ली के आईटीओ स्थित राजेन्द्र प्रसाद भवन में 29 जनवरी को राजेन्द्र प्रसाद अकादमी और साहित्य वार्ता के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी के विख्यात कवि/शायर दुष्यंत कुमार की स्मृति में ‘दुष्यंतनामा’ कार्यक्रम आयोजित किया गया।

प्रथम सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग के प्रोफेसर व ‘पक्षधर’ के संपादक प्रो. विनोद तिवारी ने दुष्यंत कुमार के व्यक्तित्व व कृतित्व पर बात करते हुए नए तथ्यों से परिचित करवाते हुए उन्होंने कहा कि दुष्यंत कुमार का वास्तविक नाम ‘दुष्यंत नारायण सिंह त्यागी’ था और उनका जन्म सन् 1931 ई. में हुआ था। अपने वक्तव्य में वे बताते हैं कि अपने छात्र जीवन में जब दुष्यंत कुमार इलाहाबाद में थे तो कमलेश्वर, मार्कंडेय व दुष्यंत कुमार तीनों की तिकड़ी के लिए ‘त्रिशूल’ नाम प्रचलित था।

अपने वक्तव्य में ही वे बताते हैं कि सामान्यतः ‘नई कहानी’ पद का श्रेय कई बार अन्य विद्वानों को दे दिया जाता है, लेकिन ‘नई कहानी’ पद की अवधारणा दुष्यंत कुमार द्वारा गढ़ी गई (coin की गई) है, न कि नामवर सिंह द्वारा। दुष्यंत कुमार ने ‘नई कहानी : परंपरा और प्रयोग’ शीर्षक से एक लेख कल्पना पत्रिका के जनवरी 1955 के अंक में लिखा था, जोकि निश्चित तौर पर 1954 में लिखा गया होगा। इसी लेख के बाद से ‘नई कहानी’ पद साहित्य में प्रचलित हुआ।

इस अवसर पर प्रसिद्ध पत्रकार व कथाकार प्रियदर्शन ने भी दुष्यंत कुमार के रचनाक्रम पर अपनी बात रखते हुए कहा कि दुष्यंत ने उर्दू की पारंपरिक विधा गजल को हिंदी जनमानस की सहज भाषा में ढालकर एक नई क्रांति का सूत्रपात किया। उनकी शायरी में स्वतंत्रता के बाद का जन-असंतोष, व्यवस्था के प्रति विद्रोह और आम आदमी की पीड़ा अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त हुई है। उन्होंने राजनीति और रूमानियत का अनूठा संगम कर हिंदी ग़ज़ल को एक स्वतंत्र पहचान और लंबी परंपरा प्रदान की। अपनी सरलता के बावजूद उनकी रचनाएं बिंबों और प्रतीकों से समृद्ध हैं, जो पाठकों से सीधा संवाद स्थापित करती हैं। दुष्यंत कुमार ऐसे लोकप्रिय कवि हैं जिनकी आवाज़ आज भी सामाजिक बदलाव की मशाल बनी हुई है।

कार्यक्रम में मौजूद दुष्यंत कुमार के सुपौत्र विवेक कुमार त्यागी ने भी दुष्यंत कुमार के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे जमींदार परिवार से आने के बावजूद एक सामान्य आदमी और साधारण किसान का जीवन जीते रहे। दुष्यंत कुमार का नाता अपने खेतों से भी था जहाँ वे सोयाबीन, और अन्य फसलों को स्वयं बोते थे। उन्हें संगीत भी प्रिय था और वे पियानो बजाने में भी रूचि रखते थे उनकी यह धरोहर उनके घर में आज भी मौजूद है। विवेक त्यागी अपने पुरखे को याद करते हुए बताते हैं कि दुष्यंत कुमार अपनी लोक संस्कृति के निकट थे या कहें उनका मन लोक में रमता था वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर में गंगा स्नान के दौरान लगने वाले मेले में भी खूब हिस्सा लेते थे।

दुष्यंत कुमार के जीवन दर्शन और उनकी रचनाओं के क्रांतिकारी प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए डॉ. ज्योति चौहान ने कहा कि दुष्यंत ने अपनी कलम का उपयोग स्वतंत्रता के बाद की राजनीतिक विसंगतियों और आम जनता के शोषण के विरुद्ध एक सशक्त हथियार के रूप में किया। उनकी गजलें पारंपरिक प्रेम और विरह के दायरे से निकलकर मानवाधिकारों, लोकतंत्र की रक्षा और शोषित वर्ग की आवाज का प्रतिनिधित्व करती हैं। विशेष रूप से आपातकाल के दौरान, उन्होंने सत्ता की निरंकुशता को चुनौती दी और समाज में साहस एवं चेतना का संचार किया। आज भी उनकी कविताएँ सामाजिक परिवर्तन और व्यवस्था के प्रति विद्रोह की मशाल बनकर अन्याय के विरुद्ध संघर्ष को प्रेरित करती हैं।

इस अवसर पर डॉ. गोविंद कुमार ने कहा कि दुष्यंत कुमार की गजलें प्रेम, प्रतिरोध और परिवर्तन की गजलें हैं। जहाँ भी ये तीनों या इनमें से कोई भी घटक होगा दुष्यंत कुमार उस हर जगह प्रासंगिक हैं। ‘दुष्यंतनामा’ कार्यक्रम के प्रथम सत्र का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता व दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका प्रो. हेमलता ने किया।

इस अवसर पर डॉ. हिरण्य हिमकर, ‘प्रोफेसर दिल्ली विश्वविद्यालय व निर्देशक आहंग नाट्य समूह’ ने दुष्यंत कुमार के रेडियो नाटक ‘हमपेशा’ का रंगपाठ किया और रचना पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि इस नाटक में हिन्दू धर्मावलम्बियों की कट्टरता पर दुष्यंत कुमार व्यंग्यात्मक रूख अपनाते हैं, साथ ही वे किसी भी प्रकार की साम्प्रदायिकता के विरूद्ध मानवीय धरातल पर खड़े होकर मनुष्यता को बचाने की सृजनात्मक कोशिश करते हैं।

प्रसिद्ध नाट्य संस्था ‘अस्मिता’ के निर्देशक अरविन्द गौड़ ने भी दुष्यंत कुमार को भावविभोर होकर याद किया और कहा की दुष्यंत कुमार की रचनाएँ रोजमर्रा के संघर्षों में, आंदोलनों में व्यक्ति को संबल प्रदान करती हैं। जहाँ जहाँ मानवाधिकारों की बात होती है तो दुष्यंत कुमार निश्चित रूप से याद किये जाते हैं।

अरविंद गौड़ ने कहा कि दुष्यंत की नज़्मों और ग़ज़लों ने छात्र जीवन और उसके बाद पब्लिक एक्टिविज्म के वो दिन याद करा दिए जब वे उन्हें गाते हुए जुलूस निकालते और जेल जाते थे। उनकी ग़ज़ल आज भी झिंझोड़ती और व्यवस्था को खड़ी चुनौती देती हैं। वे जन संघर्ष, राजनीतिक भ्रष्टाचार और सामाजिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश रचने वाले कवि थे।

वरिष्ठ कवि ‘दिविक’ रमेश ने दुष्यंत कुमार की रचना पर बात करते हुए कहा कि उन्होंने जो भी रचा वह अपना भोगा हुआ सच रचा इसलिए उनकी रचनाओं से आम आदमी प्रेरणा ग्रहण कर पाता है क्यूंकि उन्होंने अपने जीवनानुभव को सामान्यीकृत कर के अभिव्यक्त किया है वे किसी का अनुकरण करने वाले या फार्मूलाबद्ध ढंग से लिखने वाले कवि नहीं थे। रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से तुलना करते हुए वे कहते हैं कि तीनों एक ही समय में लिख रहे हैं एक ही विषय पर लिख रहे हैं लेकिन कोई साम्यता नहीं दिखाई देती सबकी अपनी जुदा सख्शियत हैं जो उनकी रचनाओं में दिखाई पड़ती है।

आगे वे कहते हैं कि रचना करने के लिए स्वंय का अनुभव चाहिए होता है तथा वह सायास भी नहीं होती है। वहीं उसको अभिव्यक्त करने में अध्ययन का महत्व होता है। यह दोनों ही बातें दुष्यंत कुमार में थीं।

इस अवसर पर कार्यक्रम में प्रो. विनोद तिवारी,अस्मिता थियेटर समूह के निर्देशक अरविन्द गौड़, हिन्दी के प्रसिद्ध कवि दिविक रमेश के अलावा प्रो. प्रेम सिंह, राजेन्द्र भवन के अध्यक्ष प्रो. अनिल मिश्रा, दुष्यंत कुमार के सुपौत्र विवेक कुमार त्यागी, गांधीवादी रमेश शर्मा, सीनियर जर्नलिस्ट अनंत मित्तल, अनुपम कुमार, राजेश चौहान और विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए छात्र-छात्राएं व अध्यापक मौजूद रहे। कार्यक्रम की शुरुआत दुष्यंत कुमार पर आधारित बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण से हुई। इस अवसर पर उनके पुत्र आलोक त्यागी के पॉडकास्ट का भी प्रसारण किया गया।

इस अवसर पर कार्यक्रम में मशहूर शायर व् वरिष्ठ कवियों ‘अमर पंकज, अपर्णा दीक्षित, घनश्याम कुमार देवांश, और अतीक अहमद ने अपनी कविताओं व गजलों का पाठ किया विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए हुए छात्र छात्राओं ‘अतीक अहमद, दिव्यश्री मिश्रा, इल्मा मलिक, साक्षी सिंह, हर्षनाथ झा’ ने अपनी दुष्यंत कुमार की गजलों व कविताओं का रंगपाठ किया।

(आकाशदीप की रिपोर्ट)