जिन्ना की शरीके हयात रतनबाई पेटिट ने किस मजबूरी में किया था इस्लाम कबूल


भारत जैसे बहुधर्मी देश में दो मतावलंबियों के बीच शादी शुरू से ही वैमनस्य का कारण रहा है। अंतरधार्मिक शादियों से सांप्रदायिक दंगा होने तक की संभावना बन जाती है। इस समय देश में अंतरधार्मिक शादी को ‘लव जिहाद’ नाम दिया गया है। 20वीं सदी में मोहम्मद अली जिन्ना और रतनबाई पेटिट की शादी ने पूरे भारतीय उप महाद्वीप को हिला कर रख दिया था।


प्रदीप सिंह प्रदीप सिंह
देश Updated On :

भारतीय उपमहाद्वीप में मोहम्मद अली जिन्ना एक विवादित शख्सियत हैं। पाकिस्तान में तो वह कायद-ए-आजम (महान नेता) और बाबा-ए-आजम (राष्ट्रपिता) हैं लेकिन भारत में उनकी पहचान देश को दो टुकड़ों में बांटने वाले ‘खलनायक’ की है। उनका राजनीतिक जीवन तो विवादित रहा ही, निजी जीवन भी कम जटिलताओं से भरा नहीं था। फिर भी राजनीति, इतिहास और अविस्मरणीय प्रेम कहानी में रुचि रखने वालों के लिए मोहम्मद अली जिन्ना का प्रेम विवाह किसी आश्चर्य से कम नहीं।

इस लेख में हम जिन्ना की राजनीति और बैरिस्टरी की सफलता-असफलता नहीं उनके प्रेम कहानी की बात करेंगे। जिस विवाह ने समूचे भारतीय उपमहाद्वीप को हिला दिया था। आज रोज हो रहे सैकड़ों तथाकथित “लव-जिहाद” से समाज जितना उद्देलित नहीं होता है उससे कहीं अधिक मोहम्मद अली जिन्ना और रतनबाई पेटिट के विवाह ने देश भर में हंगामा खड़ा कर दिया था।

मोहम्मद अली जिन्ना और रतनबाई पेटिट की 1918 में हुई शादी बॉक्स-ऑफिस थ्रिलर से कम नहीं थी। इस “निकाह” ने समूचे भारत को हिला दिया था। मुंबई के एक समृद्ध पारसी घराने की रतनबाई पेटिट उर्फ ‘रत्ती पेटिट’ ने गुजराती मूल के इस्माइली मुसलमान जिन्ना से निकाह करने के पहले इस्लाम तो कबूल कर लिया था लेकिन इस ‘निकाह’ को उस समय न तो ‘इस्लाम’ कबूल कर पा रहा था और न ही पारसी समुदाय।

मुंबई में दोनों समुदायों के बीच तलवारें खिंच गयीं। गुजरात का खोजा इस्माइली संप्रदाय मूलत: व्यापारी वर्ग है और उस समय इस्माइली समाज का समूचा व्यापार मुंबई के पारसियों के रहमोकरम पर निर्भर था। इस्माइली समाज के ताकतवर लोगों ने पारसियों के नाराज हो जाने की स्थिति में पूरे समाज का व्यापार चौपट होने का हवाला दिया लेकिन जिन्ना पर इसका कोई असर नहीं हुआ।

मोहम्मद अली जिन्ना तब चालीस वर्ष के थे जब वह सोलह वर्षीय लावण्यमयी एवं चंचल रत्ती पेटिट के प्रेम में पड़े। रत्ती उनके दोस्त और पारसी उद्योगपति  दिनशा पेटिट की बेटी थी। दिनशा पेटिट और मोहम्मद अली जिन्ना हमउम्र थे। लिहाजा जिन्ना ने जब रत्ती से प्रेम और शादी करने के संदर्भ में दिनशा पेटिट की राय जानना चाहा तो पेटिट ने जिन्ना को जमकर फटकारा और उम्र का हवाला देकर शादी की सहमति देने से इनकार कर दिया। लेकिन दो वर्ष बाद जब रत्ती 18 वर्ष की हुईं और कानूनन शादी करने की अड़चन दूर हो गयी तब वह अपने पिता के वैभवशाली घर की सुख-सुविधाओं को छोड़कर जिन्ना के पास चली आयीं। रतनबाई पेटिट उर्फ ‘रत्ती पेटिट’ (Jewel of Bombay) के नाम से प्रसिद्ध थीं।

धर्म के अलावा दोनों परिवारों की स्थिति में बहुत अंतर था। जिन्ना की पहचान एक इकलौता सफल मुसलमान बैरिस्टर के अलावा कुछ खास नहीं थी। जबकि दिनशा पेटिट बंबई के उद्योगपति थे। इसलिए, जब अप्रैल 1918 में शादी हुई, तो जिन्ना और उनकी नवविवाहिता दुल्हन के खिलाफ एक निंदनीय अभियान शुरू हो गया। इससे बचने के लिए जिन्ना और रत्ती अपने हनीमून के लिए नैनीताल चले गए। लेकिन विरोध और निंदा का क्रम यहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। रत्ती बॉम्बे प्रेस के कीचड़ उछालने के कैंपेन से बेहद परेशान हो गयीं थी।

पारसी रतनबाई पेटिट का इस्लाम कबूल करना 

इस निंदा अभियान के पीछे का कारण धर्मपरिवर्तन था। जिन्ना की पहचान एक सफल बैरिस्टर के साथ ही प्रगतिशील मूल्यों को मानने वाले इंसान की थी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है जिन्ना को अपनी पत्नी का धर्म परिवर्तन कराने की क्या जरूरत पड़ी?

जिन्ना चाहते थे कि शादी से पहले उनकी पत्नी को इस्लाम में धर्मांतरित किया जाए। जबकि दो धर्मों के जोड़ों के बीच शादी के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट अस्तित्व में था जिसमें बिना अपना धर्म बदले युवक-युवतियां शादी कर सकते थे। यह कानून अब भी अस्तित्व में है। कानूनी दृष्टि से रत्ती के धर्म परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं थी। मुस्लिम न्यायशास्त्र के तहत, एक मुस्लिम पुरुष अहल-उल-किताब (शाब्दिक रूप से ‘एक किताब को मानने वाले लोग’) यानी ईसाई, यहूदी और पारसी माहिलाओं से शादी कर सकता है। 

क्या जिन्ना के मन में कोई धार्मिक भावना उमड़ रही थी, जिन्ना तो अपने जीवन के अंत-अंत तक ठीक से नमाज पढ़ना, उर्दू बोलना और अपनी मातृभाषा गुजराती-कछी भी नहीं जानते थे। इस्लाम के जिस संप्रदाय से वह संबंध रखते थे उसकी रुचि धर्म से ज्यादा व्यापार में था। रत्ती के धर्मपरिवर्तन के पीछे का सीधा कारण राजनीतिक था। वह नहीं चाहते थे कि शादी की वजह से वह मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर आएं और मुस्लिम लीग में उनके नेतृत्व को चुनौती मिले। वह मुस्लिम लीग और मुसलमानों के बीच अपने को सच्चा मुसलमान साबित करना चाह रहे थे। हिंदुओं और पारसियों की उन्हें चिंता नहीं थी।

लेकिन रत्ती ने इसे कैसे स्वीकार किया। वह खुद एक स्वाभिमानी महिला थीं। रत्ती के व्यक्तित्व का अभी तक जिन लोगों ने अध्ययन किया है, वे जानते हैं कि उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ भी करने के लिए उन्हें मजबूर नहीं किया जा सकता था। फिर भी रत्ती को इस्लाम पर किताबें प्रदान की गई थीं। कहा जाता है कि यह काम या तो पत्रकार सैयद अब्दुल्ला बरेलवी उर्फ एसए बरेलवी या उनकी भाभी शिरीन जिन्ना ने किया था।

रतनबाई पेटिट धर्मपरिवर्तन के बाद बनीं ‘रतन मरियम जिन्ना’

कहा जाता है कि जिन्ना एक गैर-संप्रदायवादी मुसलमान थे। निजी जीवन में धर्म के प्रति उनकी बहुत निष्ठा नहीं थी। वह इस्माइली संप्रदाय में रत्ती का धर्मपरिवर्तन कराना चाह रहे थे लेकिन इस्माइली सर्वोच्च परिषद ने इसे अस्वीकार कर दिया था।

18 अप्रैल 1918 की शाम को प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान मौलाना नज़ीर अहमद ख़ुजंदी के हाथों रत्ती का औपचारिक रूप से सुन्नी मत में धर्म परिवर्तन कराया गया था। एक सुन्नी धर्मशास्त्री होने के अलावा मौलाना एक लेखक, एक पत्रकार और एक राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे। वे लंबे समय तक ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के सदस्य रहे। उन्होंने बंबई की जामिया मस्जिद में जहां जिन्ना की दुल्हन का धर्मपरिवर्तन कराया था वहीं पर अठारह साल बाद गांधी के सबसे बड़े बेटे हरिलाल गांधी को भी इस्लाम कबूल कराया था।

तकनीकी रूप से धर्म परिवर्तन के बाद नाम परिवर्तन आवश्यक नहीं था, क्योंकि रतन स्वयं एक महिला का नाम था, जो कि गुजराती मुसलमानों में आम है। लेकिन मौलाना ख़ुजंदी का मत था कि इस्लामी नाम दिया जाए और जिन्ना की इच्छा पर रत्ती का नाम ‘मरियम’ रख दिया गया। अब वह रतनबाई पेटिट से रतन मरियम जिन्ना हो गयीं। लेकिन रत्ती ने औपचारिक रूप से कभी इस नाम का उपयोग नहीं किया।

पारसी और मुस्लिम प्रेस के बीच वाकयुद्ध

टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अंग्रेजी अखबारों ने इस शादी को कवर किया था, लेकिन यह खबर का एक टुकड़ा था। पारसी नियंत्रित प्रेस और मुस्लिम-नियंत्रित अखबार (ज्यादातर उर्दू) एक दूसरे से जंगली बिल्लियों की तरह लड़ रहे थे। ऐसा प्रतीत होता है कि यह शादी पूरे देश के लिए एक समस्या थी, सिवाय इसमें शामिल दो व्यक्तियों के। रत्ती के इस्लाम स्वीकार करने पर कैसर-ए-हिंद और जैम-ए-जमशेद जैसे पारसी अखबार ने 19 अप्रैल 1918 को ब्लैक फ्राइडे कहा। कुछ कागजातों को आधार बनाते हुए जिन्ना ही नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम समुदाय पर यह आरोप लगाया गया कि रतनबाई पेटिट को इस्लाम में परिवर्तित करके पारसियों के खिलाफ साजिश रची गई थी।लाहौर के प्रसिद्ध उर्दू अखबार पाईसा ने मुस्लिम समुदाय पर हमला करने का साहस करने वालों के खिलाफ धमकी भरे लेख और संपादकीय प्रकाशित किए।

पारसी पंचायत की प्रतिक्रिया

बंबई के पारसी समाज के लिए यह अनहोनी घटना थी। अभी तक पारसियों का बंबई के व्यापार और वकालत जैसे क्षेत्रों पर एकाधिकार था। लेकिन इस घटना को उन्होंने अपने ऊपर व्यक्तिगत हमला माना। पारसी धार्मिक परिषद या पंचायत ने शादी को स्वीकार नहीं किया। 26 मई 1918 को बॉम्बे के अग्नि मंदिरों के सभी पुजारी अपने मुख्य पुजारी शम्स-उल-उलेमा दस्तूर दोराब संजोना की अध्यक्षता में अगियारी लेन के मुख्य पारसी गिरिजाघर दादी सेठ फायर मंदिर में इकट्ठे हुए। रत्ती और जिन्ना का नाम लिए बिना पारसी पंचायत ने गैर-पारसियों के साथ पारसी लड़कियों के विवाह की निंदा की। और ऐसा करने वाले किसी भी पारसी के बहिष्कार की घोषणा की जिन्होंने उनके विश्वास के बाहर शादी की।

दक्षिणपंथी मुस्लिम राजनीतिक समूहों ने शादी पर अख्तियार किया हमलावर रूख

दक्षिणपंथी मुस्लिमों और कांग्रेस समर्थित मुस्लिम राजनीतिक समूहों ने जिन्ना-रत्ती की शादी पर हमलावर रूख अख्तियार किया। कट्टरपंथियों का तर्क था कि जिन्ना मुसलमानों के रोल मॉडल बनते हैं लेकिन उनका व्यवहार सच्चे मुसलमान की नहीं है। इन दक्षिणपंथी दलों में जमीयत उलेमा-ए-हिंद, खाकसार आंदोलन और मजलिस-ए-अहरार शामिल थे। मौलाना हुसैन अहमद मदनी, अल्लामा इनायतुल्लाह मशरीकी और मज़हर अली अज़हर ने तीनों दलों का नेतृत्व किया।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के नेता मौलाना हुसैन अहमद मदनी कांग्रेस के साथ थे और जमीयत पाकिस्तान के विचार का विरोध कर रही थी। ‘जिन्ना विवाह निषेध अभियान’ में एक पुस्तिका प्रकाशित कर यहां तक कहा गया कि जिन्ना ने रत्ती से शादी के लिए इस्लाम त्याग दिया था।

1945-46 के राष्ट्रीय चुनावों में मजलिस-ए-अहरार के मजहर अली अज़हर मशरिकी और मदनी की तरह जिन्ना के अंतरधार्मिक विवाह को निशाना बनाने लगे। यह मुस्लिम लीग को हराने और “पाकिस्तान के विचार को दफन” करने के नाम पर किया जा रहा था। इस आक्रामक गुट ने अपनी एक कविता को मुस्लिम लीग के खिलाफ राजनीतिक नारे के रूप में इस्तेमाल किया गया था:

“इक काफ़िरा के वास्ते इस्लाम को छोड़ा, ये क़ायद – ए – आज़म है या काफ़िर – ए – आज़म।”

जिन्ना के विरोध में उनकी शादी को मुद्दा बनाने पर बॉम्बे में मजलिस-ए-अहरार के सहयोगी हाफ़िज़ अली बहादुर खान ने अजहर का विरोध किया था। हाफिज अली ने एसोसिएटेड प्रेस ऑफ़ इंडिया के माध्यम से रतनबाई पेटिट के धर्मांतरण और निकाहनामा के कागजात के साथ कई समाचार प्रकाशित करवाया। लेकिन अजहर ने निंदा अभियान नहीं रोका। जिन्ना के धार्मिक विश्वास पर सवाल उठाकर ऐसे लोग उनको भावनात्मक पीड़ा पहुंचाना चाहते थे। सचाई यह है कि रत्ती की मौत के डेढ़ दशक बाद भी उनके राजनीतिक विरोधी उनके धार्मिक विश्वास को निशाना बनाकर मजाक उड़ाते थे। अंतत: जिन्ना को सार्वजनिक रूप से अपनी पत्नी के बचाव में आना पड़ा, हालाँकि वह सार्वजनिक जीवन में अपने निजी जीवन पर चर्चा करने से परहेज करते थे।

जिन्ना और रत्ती की शादी एक अनमेल और असंभाव्य मिलन था जो बहुत कम होता है। दोनों एक दूसरे को बहुत चाहते थे लेकिन जैसे-जैसे भारत की राजनीतिक घटनाओं ने करवट बदलना शुरू किया रत्ती अपने को अलग-थलग और अकेला महसूस करने लगीं। वह अपने परिवार, दोस्तों और समुदाय से कट गयीं। रत्ती को जिन्ना से शादी की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। जिन्ना से शादी के महज 11 साल बाद सन 1929 में उन्तीस वर्ष की उम्र में ही रत्ती की मौत हो गई।

आज लव जिहाद के दैर में जिन्ना और रत्ती के प्रेम विवाह की फिर से चर्चा शुरू हो गयी है। प्रगतिशील और पढ़े-लिखे  जिन्ना ने भी रत्ती का धर्मपरिवर्तन कराया। आज भी जिन्ना को राष्ट्रवादी, हिंदू-मुस्लिम एकता का पैरोकार और प्रगतिशील मानने वालों की कमी नहीं है। फिलहाल जिन्ना के बारे एक ही सच है जो स्थिर है, वह है- 25 दिसंबर 1876 को कराची में जन्म और 11 सितंबर 1948 को कराची में ही निधन। बाकी सब समय एवं परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहा।  जिन्ना के पिता जिन्नाभाई पूंजा और मां मीठीबाई गुजरात के खोजा इस्माइली शिया मुसलमान थे जो कराची में व्यापार करने गए थे। लेकिन उनके निधन के बाद उनके रिश्तेदारों और अन्य प्रत्यक्षदर्शियों का मानना था कि बाद के दिनों में जिन्ना सुन्नी मत अपना लिए थे।



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