इंडिगो संकट और निजी एकाधिकार का भ्रम : क्रोनी-कैपिटलिज़्म आधारित नीतियों पर कड़ा प्रहार

इंडिगो की भारी अव्यवस्था और हज़ारों उड़ानों के रद्द होने ने केवल उड्डयन क्षेत्र की कमज़ोरियों को उजागर नहीं किया है-यह मोदी सरकार की उस व्यापक आर्थिक दिशा पर भी रोशनी डालता है जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र और व्यापक प्रतियोगिता को लगातार कमजोर कर के निजी एकाधिकार, द्वैधाधिकार (Duopoly) और कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट समूहों की शक्ति को बढ़ाया गया है।

आज न सिर्फ़ विमानन, बल्कि दूरसंचार, सीमेंट, लॉजिस्टिक्स, निर्माण और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी यह प्रवृत्ति साफ़ दिखाई दे रही है। परिणामस्वरूप महंगी सेवाएँ, सीमित विकल्प, गैर-जवाबदेह निजी कंपनियाँ और उपभोक्ताओं पर बढ़ता बोझ दिखाई देता है।

इंडिगो का संकट कोई दुर्घटना नहीं है- यह एक अस्थिर और पक्षपाती आर्थिक मॉडल का स्वाभाविक परिणाम है।

I. इंडिगो संकट: जब निजी दिग्गज लड़खड़ाए, तो पूरा देश थम गया

सरकार वर्षों से एक वाक्य दोहराती रही है: “निजी कंपनियाँ अधिक कुशल और जवाबदेह होती हैं।” इसी आधार पर एयर इंडिया को कमजोर कर बेचा गया, BSNL को 4G-5G से दूर रखा गया, और उड्डयन क्षेत्र को दो-तीन बड़े खिलाड़ियों तक सीमित कर दिया गया।

लेकिन इंडिगो की भारी विफलता ने इस दावे को पूरी तरह झुठला दिया। हज़ारों यात्री फंसे, उड़ानें रद्द, संचार व्यवस्था ठप-और कोई जवाबदेही नहीं। यह विफलता सिर्फ़ एक कंपनी की नहीं, यह नीति-मॉडल की विफलता है। जब किसी क्षेत्र में केवल दो-तीन निजी खिलाड़ी हों, तो उनकी एक छोटी सी गलती भी राष्ट्रीय संकट बन जाती है। यह वही स्थिति है जिसे आज देश झेल रहा है।

II. दूरसंचार क्षेत्र: ‘सुधार’ के नाम पर तैयार किया गया महंगा Duopoly

एक समय भारत में दर्जनों टेलीकॉम कंपनियाँ थीं। उपभोक्ता के पास विकल्प भी थे और कीमतें भी प्रतिस्पर्धात्मक थीं। आज परिदृश्य बदल चुका है- देश का टेलीकॉम क्षेत्र प्रभावी रूप से जियो + एयरटेल तक सीमित है। वोडाफोन-आइडिया अस्तित्व बचाने में संघर्ष कर रही है और BSNL को सालों तक 4G-5G से जानबूझकर दूर रखा गया। यह “सुधार” नहीं था, बल्कि एक मजबूरन तैयार किया गया संकेन्द्रण था:


• छोटी कंपनियों को दिवालिया होने दिया गया
• विलय को प्रोत्साहन
• स्पेक्ट्रम महंगा ताकि केवल बड़े उद्योगपतियों की पहुँच रहे
• BSNL को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया गया

जब प्रतियोगिता खत्म हुई, कीमतें बढ़नी ही थीं- और बढ़ रही हैं। दूरसंचार क्षेत्र साबित करता है कि निजीकरण बिना प्रतिस्पर्धा = निजी एकाधिकार, न कि मुक्त बाज़ार।

III. सीमेंट क्षेत्र: बढ़ती कीमतें, घटती प्रतियोगिता और कॉर्पोरेट नियंत्रण

सीमेंट सिर्फ़ एक उत्पाद नहीं-यह आवास, सार्वजनिक निर्माण, रोज़गार और महंगाई से गहराई से जुड़ा है। फिर भी सरकारी नीतियों ने इस क्षेत्र को कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट समूहों के हाथों में समेटने में बड़ी भूमिका निभाई है। विशाल विलय-अधिग्रहण, छोटे-मझोले संयंत्रों का निगल जाना, और क्षेत्रीय दबदबे का निर्माण-इन सबने उपभोक्ता को महंगा सीमेंट और बिल्डरों-ठेकेदारों को सीमित विकल्प देकर बुरी तरह प्रभावित किया है।

सवाल उठता -जब कच्चा माल सस्ता है, उत्पादन क्षमता बढ़ी है, तो कीमतें इतनी ऊँची क्यों? उत्तर स्पष्ट है प्रतिस्पर्धा नहीं, सिर्फ़ चंद खिलाड़ियों का वर्चस्व।

IV. निजीकरण नहीं-असल समस्या है क्रोनी-कैपिटलिज़्म

निजीकरण तभी लाभकारी होता है जब:
• प्रतिस्पर्धा हो
• नियमन मजबूत हो
• अवसर समान हों
• राजनीति और उद्योग अलग-अलग हों

लेकिन मोदी सरकार के दौर में हुआ उल्टा:
• लाइसेंस और ठेके “चयनित” समूहों को
• क़ानूनों और नीतियों का झुकाव उन्हीं की ओर
• नियामक संस्थाओं की स्वतंत्रता कम
• सार्वजनिक कंपनियों को कमजोर कर बेचने का दबाव
• बड़े कॉर्पोरेटों की जबर्दस्त विस्तार गति

यह “मुक्त बाज़ार” नहीं। यह नियंत्रित बाज़ार है-कुछ के लिए, बाकी के खिलाफ़। यह नीति भारत को प्रतिस्पर्धी पूँजीवाद की ओर नहीं, कॉर्पोरेट सामंती-अर्थव्यवस्था की ओर ले जा रही है।

V. सार्वजनिक क्षेत्र बनाम निजी एकाधिकार: सरकार का बनाया हुआ झूठा द्वंद्व

सरकार का दावा है:
“सार्वजनिक क्षेत्र = अक्षमता,
निजी क्षेत्र = दक्षता।

यह दावा वास्तविकता से बहुत दूर है।

सार्वजनिक क्षेत्र:
• संसद से जवाबदेह
• सामाजिक दायित्व निभाता है
• दूरदराज़ क्षेत्रों तक सेवा पहुँचाता है
• कीमतों को स्थिर रखता है
• निजी क्षेत्र को अनुशासित करता है
• संकट के समय भरोसा बनता है

निजी क्षेत्र:
• लाभ सर्वोपरि
• दूरगामी सामाजिक ज़िम्मेदारी बहुत सीमित
• प्रतिस्पर्धा खत्म होते ही कीमतें बढ़ाता है
• कम खर्च के लिए कर्मचारियों पर दबाव
• किसी क्षेत्र में नुकसान हो तो तत्काल सेवाएँ बंद

सारांश: सार्वजनिक क्षेत्र को सुधारा जा सकता है। निजी एकाधिकार को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

VI. उपभोक्ता क्यों भुगत रहे हैं? इस मॉडल के प्रत्यक्ष दुष्परिणाम

  1. बढ़ती कीमतें

टेलीकॉम, सीमेंट, एयरलाइन किराया-सब महंगे।

  1. सेवा की गुणवत्ता में गिरावट

कम प्रतिस्पर्धा = कम सुधार।

  1. मनमानी और श्रम-दमन

निजी कंपनियाँ मनचाहे समय बंद, छँटनी करती हैं।

  1. MSMEs का विनाश

बड़े समूह कच्चे माल से लेकर रिटेल तक पूरी श्रृंखला पर कब्ज़ा कर रहे हैं।

  1. प्रणालीगत जोखिम

दो खिलाड़ियों में से एक भी गिरे, पूरा क्षेत्र ठप।

  1. महंगाई पर दबाव

एकाधिकार कीमतों को ऊपर रखता है, गरीब पर सबसे ज्यादा बोझ डालता है।

VII. आर्थिक शक्ति का संकेन्द्रण = लोकतंत्र के लिए खतरा

जब कुछ कॉरपोरेट समूह:
• मीडिया
• इंफ्रास्ट्रक्चर
• बैंकिंग
• खुदरा
• बिजली
• दूरसंचार
• सीमेंट
• परिवहन

सब पर नियंत्रण पा लेते हैं, तो यह केवल अर्थव्यवस्था पर प्रभुत्व नहीं रहता-यह लोकतंत्र तक को प्रभावित करता है।

धन का संकेन्द्रण
⇒ राजनीतिक चंदे का संकेन्द्रण
⇒ मीडिया पर दबदबा
⇒ नीतियों पर प्रभाव
⇒ जनता की आवाज़ कमजोर

यह एक खतरनाक चक्र है जिसमें अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र दोनों खोखले होते जाते हैं।

VIII. भारत को किस रास्ते की जरूरत है?

  1. रणनीतिक क्षेत्रों में सशक्त सार्वजनिक क्षेत्र

टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा वितरण, उड्डयन सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स-इनमें सार्वजनिक उपस्थिति ज़रूरी है।

  1. असली प्रतियोगिता

विलयों पर सख्त नज़र, नए खिलाड़ियों के लिए आसान प्रवेश, पारदर्शी नीतियाँ।

  1. स्वतंत्र नियामक संस्थाएँ

TRAI, CCI, DGCA, SEBI—इनकी स्वतंत्रता बहाल और बढ़ाई जाए।

  1. जनता से जुड़ी जवाबदेही

नीतियों में पारदर्शिता, संसद की भूमिका, सार्वजनिक रिपोर्टिंग।

  1. एंटी-ट्रस्ट कानूनों को मजबूत करना

एकाधिकार और बाजार-दुरुपयोग पर कठोर कार्रवाई।

  1. श्रमिक और उपभोक्ता सुरक्षा

लाभ के नाम पर सामाजिक सुरक्षा का बलिदान नहीं।

  1. आर्थिक शक्ति का विकेन्द्रीकरण

हज़ारों कंपनियाँ = स्वस्थ अर्थव्यवस्था।
कुछ कंपनियाँ = असुरक्षित राष्ट्र।

IX. निष्कर्ष: इंडिगो संकट चेतावनी है-अंतिम सच नहीं

इंडिगो की दुर्घटना इस बात का संकेत है कि:
• जब सरकार सार्वजनिक क्षेत्र को कमजोर करती है,
• प्रतियोगिता को खत्म करती है,
• और चुनिंदा निजी समूहों पर अर्थव्यवस्था छोड़ देती है,

तो विफलता सिर्फ़ निजी कंपनी की नहीं होती- पूरा देश उसकी कीमत चुकाता है। यह समय है इस दिशा को बदलने का। निजीकरण तब तक उपयोगी है जब तक जनता का हित, प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता सर्वोपरि हों। लेकिन जब निजीकरण का अर्थ “निजी एकाधिकार” बन जाए, तो यह राष्ट्र के लिए संकट बन जाता है।

भारत को ऐसी अर्थनीति चाहिए जिसमें:
• सार्वजनिक क्षेत्र मज़बूत हो,
• निजी क्षेत्र गतिशील हो,
• नियमन स्वतंत्र हो,
• और लोकतंत्र सर्वोपरि।

इंडिगो संकट एक संकेत है-अगर हमने मार्ग नहीं बदला, तो एक-एक क्षेत्र इसी तरह ढहता जाएगा और हर बार नुकसान आम जनता को ही होगा।

First Published on: December 7, 2025 9:01 AM
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