अरुणाचल प्रदेश के उत्तर में क्या चल रहा है…


ऐसे 175 नए गांवों की पहल अभी पिछले हफ्ते सुनने में आई है। ये मुख्यतः घुमंतू बंजारों के गांव हैं, जिनकी बौद्ध धर्म में गहरी आस्था है। अपने घर में वे दलाई लामा का छोटा फोटो भी टांगते हैं लेकिन खुद को तिब्बती से ज्यादा चीनी समझते हैं। कारण यह कि इतिहास में हाल-हाल तक उनका कोई देश नहीं था।


चंद्रभूषण मिश्र
देश Updated On :

चीनियों ने पिछले कुछ सालों में अरुणाचल प्रदेश की कई सारी जगहों के चीनी नाम घोषित किए हैं। इनमें बस्तियां, झीलें, चोटियां और घाटियां शामिल हैं। कोई विदेशी पर्यटक चीन घूमने जाए और तिब्बत के पूर्वी-दक्षिणी इलाकों में टहलने निकले तो चीन के नक्शे पर इन जगहों को इनके चीनी नामों से ही खोजेगा। मेरे तिब्बती मित्रों को लगता रहा है कि हजारों साल से चला आ रहा किसी नदी या पहाड़ का नाम कोई कैसे बदल सकता है? लेकिन धंधे-पानी की जरूरतें लोगों को अपनी आदत बदलने को मजबूर कर देती हैं। तिब्बती अपने जिस इलाके को निंग्ठी कहते हैं, चीनियों द्वारा वहीं बनवाया गया ‘लिंझी’ एयरपोर्ट दुनिया के पर्यटन नक्शे पर आ चुका है।

अरुणाचल प्रदेश में पड़ने वाली जगहों को लेकर उनका यह प्रयास सफल नहीं होने वाला, लेकिन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के आर-पार रहने वाले एक ही कबीले के लोगों का रवैया नामों को लेकर ठीक-ठीक वैसा ही तो नहीं हो सकता, जैसा हमें हिंदी हार्टलैंड में लगता है। सीमा पार से दूसरी कोशिश दुर्गम जगहों पर नए गांव बसाने की चल रही है। चीनियों ने पिछले कुछ वर्षों में अरुणाचल प्रदेश के बहुत करीब, एलएसी से सटे हुए नौ सौ से ज्यादा नए गांव बसाए हैं, जिनमें दो सौ मैकमहोन रेखा के इस तरफ यानी अरुणाचल प्रदेश के आधिकारिक नक्शे में पड़ते हैं।

ऐसे 175 नए गांवों की पहल अभी पिछले हफ्ते सुनने में आई है। ये मुख्यतः घुमंतू बंजारों के गांव हैं, जिनकी बौद्ध धर्म में गहरी आस्था है। अपने घर में वे दलाई लामा का छोटा फोटो भी टांगते हैं लेकिन खुद को तिब्बती से ज्यादा चीनी समझते हैं। कारण यह कि इतिहास में हाल-हाल तक उनका कोई देश नहीं था। अलग-अलग मौसमों में अपनी भेड़ें और याक लेकर वे अलग-अलग इलाकों में डेरा डालते थे लेकिन 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद चीनियों को उनका महत्व समझ में आ गया और उसने इन्हें संवेदनशील लेकिन निर्जन सीमावर्ती क्षेत्रों में बसाने का फैसला कर लिया।

लद्दाख में बारिश नहीं के बराबर होती है लेकिन पूर्वी तिब्बत की जलवायु अच्छी है। यहां वैसी ही नम हरियाली के दर्शन होते हैं, जो हमारे नॉर्थ-ईस्ट की पहचान है। लूलांग नाम के एक वर्षावन में सैर करने का मौका भी हमें यहां मिला। चीनियों ने इन बंजारों को बसने के लिए जमीनें दीं, उनके लिए घर बनवाए, उपजाऊ जमीनों की यहां कोई कमी नहीं थी, सो आसपास उनकी खेती-बाड़ी शुरू कराई और ऐसे चार-पांच गांवों के बीच में एक फौजी छावनी बसाकर उनकी उपज खरीदने की व्यवस्था भी कर दी।

ऐसा एक गांव मेरा देखा हुआ है, सो बता सकता हूं। सीमा पर ये बस्तियां चीन की सबसे बड़ी ताकत हैं। आगे के हिस्से दो साल पहले आई मेरी किताब ‘तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत’ से हैं, जो और चीजों के अलावा 2015 में भारतीय और नेपाली पत्रकारों के एक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य रूप में मेरे तिब्बत दौरे पर भी आधारित है। उम्मीद करता हूं कि पाठकों को बीच-बीच में अखबार-टीवी में आने वाली इस तरह की खबरों का सिर-पैर समझने में इससे कुछ मदद मिलेगी।

आधी रात का नाच

हमें इतना पता था कि बोली-बानी से अनजान जिस जगह पर हम लाए गए हैं उसके कई उच्चारण हैं और जिस मुख्यालय शहर में हम ठहरे हैं उसका कुछ अलग ही नाम है। लेकिन तिब्बत में यह जगह ठीक-ठीक है कहां, भारत से कितनी दूर, इसका हमें कोई अंदाजा नहीं था। जगह का नाम हमें न्यिंग्ची बताया गया था लेकिन साथ में यह भी जोड़ा गया था कि इसका असल नाम न्यिंग्त्री (निंग्ठी) है, उच्चारण को सहज बनाने के लिए न्यिंग्ची कर दिया गया है। यह जानकारी हमें साथ चल रहे तिब्बती अधिकारियों से मिली थी। बहरहाल, पेइचिंग से हमारे साथ चल रहे चीनी विदेश मंत्रालय के दोनों प्रतिनिधि लगातार इसे लिंझी ही बोलते रहे और विदाई के वक्त वहां के हवाई अड्डे पर भी हमें लिंझी-मैनलिंग एयरपोर्ट ही लिखा हुआ मिला। इस उपप्रांत के जिस शहर में हम ठहरे थे उसका नाम बाई था।

तो यहां ठहरने के दूसरे दिन काफी घुमाई के बाद रात में कोई दस बजे कुल पांच में से चार भारतीयों ने फैसला किया कि यह जीवन सोकर बिताने के लिए नहीं है। एक ने कहा कि इसे खुले में सिगरेट पीकर टहलते हुए बिताना चाहिए। दूसरे ने इसमें इतना इजाफा किया कि यह शुभकार्य पासपोर्ट-वीजा जेब में डाले बगैर किया जाना चाहिए ताकि अगर कोई पुलिस वाला हड़काना शुरू करे तो इससे हमारे प्रिय देश की बदनामी न हो। हम बाहर निकले और भीड़भाड़ वाले इलाके के उलटी तरफ कुछ दूर बढ़ने के बाद अललटप्पू ढंग से एक चौराहे से बाएं मुड़ गए क्योंकि उधर ज्यादा खाली दिख रहा था। संयोग ऐसा कि उस रास्ते पर बमुश्किल सौ कदम चलने के बाद हमें एक ऐसी इमारत दिखी, जो शहर कोतवाली के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकती थी। वहां जाकर अपनी फजीहत कराने के बजाय हम चौड़ी सड़क पार करके दूसरी पटरी पर चले गए और आपस में थोड़ी दूरी बनाकर चलने लगे।

थोड़ा ही आगे जाकर दाईं तरफ तेज हाई मास्ट रोशनी दिखाई पड़ने लगी और म्यूजिक सुनाई देने लगा। कोई वेस्टर्न डांस नंबर। अजीब नजारा था। रात साढ़े दस बजे एक लंबे-चौड़े खुले सीमेंटेड मैदान में बड़ा सा घेरा बनाए हुए कोई दो सौ लोग एक-दूसरे के पीछे चलते हुए हल्का-फुल्का नाच रहे थे। ढीले घरेलू कपड़ों में औरत-मर्द, बूढ़े-जवान, हर मिजाज के लोग। क्या नाटक है? हम वहां पहुंचे और किनारे खड़े होकर डांस देखने लगे। लेकिन यह मुश्किल से दो-तीन मिनट और चला। फिर अचानक म्यूजिक बंद हो गया और हाई मास्ट लाइट बुझ गई। लोग तितर-बितर होकर स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी में घर जाने लगे। हम समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर हुआ क्या। हमारे आते ही यह कार्यक्रम समाप्त कैसे हो गया। एक मित्र ने सुझाया कि बात करके देखते हैं। मैंने कहा, बात होगी कैसे। न तिब्बती दुभाषिया हमारे साथ है न चीनी। हम इनका जवाब कैसे समझेंगे, उससे बड़ी समस्या यह कि सवाल कैसे करेंगे।

लेकिन यह रिपोर्टरों की जमात थी, जो हिचक को घर छोड़कर ही फील्ड में उतरती है। एक साथी ने पहले एक ग्रुप को घेरने की कोशिश की, जो बात को अनसुना करता हुआ गुजर गया। फिर उन्होंने तीन-चार नौजवानों के दूसरे ग्रुप को घेरा और अपनी तरफ उंगली उठाकर इंडिया-इंडिया बोले। पता नहीं कैसे उस ग्रुप के एक सदस्य को बात समझ में आ गई। उसने कहा, ‘इंडिया, शारुक खान…तुझे देखा तो ये जाना सनम…।’ फिर मेरे मित्र ने उससे तिब्बत, चाइना, दलाई लामा… काफी कुछ पूछा, पर ‘इल्लै’ की मुद्रा में हथेली पसारकर वह और उसके साथी खयाली मैंडोलिन बजाते आगे बढ़ गए।

बंजारों का गांव

इसके अगले दिन हमें एक तिब्बती गांव में जाने का मौका मिला, जिसके बारे में आयोजकों ने बता रखा था कि यह घुमंतू चरवाहों का गांव है। इसकी बसावट कुल पैंतीस-चालीस साल पुरानी ही बताई गई थी। गांव की मिट्टी सलेटी रंग की थी और उसमें उगने वाली फसलों को लेकर गांव वालों से मेरी कोई बात नहीं हो पाई। अलबत्ता रास्ते में बाजरा भरपूर लहराता दिख रहा था और घरों के सामने हमारे पहाड़ों की तरह बड़े-बड़े चमकीले रंगबिरंगे फूल खिले हुए थे। गांव में घुसते ही माओ की तस्वीरों वाला चायखाना दिखा तो मुझे चाय की तलब लग गई। आयोजकों ने कहा, अभी बस्ती में इंतजार हो रहा है, लौटते में पी लेना।

दुनिया भर की किसान-कामगार बस्तियों की तरह उस गांव में भी मेहमान को लेकर एक गर्मजोशी का माहौल था। मेहमान कौन है, कहां का है, इसकी उन्हें कोई फिक्र नहीं थी। पता चला, गांव में ज्यादातर लोग ऊन का काम करते हैं। भेड़ों के इर्दगिर्द घुमंतू जीवन बिताने वाली आखिरी पीढ़ी के पांव कब्र में लटकने लगे हैं। मिजाज में बंजारापन अभी बचा है, लेकिन घर व्यवस्थित हैं और सारे बच्चे स्कूल जाते हैं।

जानवरों के बारे में पूछा- पालतू और जंगली दोनों तरह के जानवरों के बारे में। गांव के मुखिया बोले, भेड़-बकरी और गाय ज्यादा पाली जाती है। याक इधर नहीं होते। यह भी कि उत्तर के पहाड़ों से जब-तब भालू उतर आते हैं। जानवर चराते वक्त उनसे सावधान रहना बहुत जरूरी है। यह भी कि कभी-कभी इंडिया की तरफ से बाघ आकर बकरी उठा ले जाते हैं या गाय मार देते हैं।

इंडिया? मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि तिब्बत में मैं आखिर हूं कहां। यह बातचीत जहां हो रही थी, वह गांव का पंचायत भवन था, जिसकी दीवारों पर चीन के कुछ बड़े फौजी और राजनीतिक नेताओं की तस्वीरें गांव के दस साल और पचीस साल पूरे होने पर गांव वालों से हाथ मिलाते हुए लगी थीं। मुझे लगा, यह प्रॉपेगैंडा है। भारत के प्रति शत्रुता पैदा करने के लिए इनके दिमाग में यह बात भर दी गई है कि उनके जानवर मार देने वाले बाघ इंडिया से आते हैं। हकीकत जानने के लिए मैंने उनसे घुमा-फिराकर कुछ सवाल किए। इससे माहौल में थोड़ी कड़वाहट आ गई।

ऐसा इसलिए भी हुआ कि बात कई चैनलों से होकर मुझतक पहुंच रही थी। गांव वाले अपनी शांग्ला बोली में बोलते। न्यिंग्ची उपप्रांत के मुख्यालय बायी से आए अफसर उसे शहरी तिब्बती में लाते। फिर ल्हासा के भाषा अधिकारी चीनी में उसका तर्जुमा करते और अंत में पेइचिंग से हमारे साथ चल रही इंटरप्रेटर लिन अंग्रेजी में मुझे उसका सार-संक्षेप बतातीं। लेकिन इतनी देर ठहरकर फिर इसी प्रक्रिया में मेरा अगला सवाल सुनकर जवाब देने का धीरज किसी नेता या कूटनीतिज्ञ में हो सकता था, जंगल में दिन गुजारने वाले खानाबदोश में नहीं। थोड़ी देर बाद मुखियाजी जोश में आ गए। बोले, इंडिया वाले बहुत खराब हैं। उन्होंने हमारी दो काउंटी (जिले या तहसीलें) दबा ली हैं, उधर हमारे जानवर भी नहीं चरने देते।

इससे एक बात तो तय हो गई कि हम भारत-तिब्बत सीमा से सटे किसी जिले में ही हैं। लेकिन इससे मैं और परेशान हो गया कि यह जगह कहां है। दीवार पर टंगा नक्शा देखा, कुछ भी पल्ले न पड़ा। घर आकर जान पाया कि तिब्बत का वह मितोक (मेडोग) जिला, जिसका पुराना नाम पेमाको (पद्म कोष) है, हमारे अरुणाचल प्रदेश के अपर सियांग जिले से सटा है। अभी कुछ समय से चीनियों के भारत और भूटान के साथ अपने विवादित इलाकों में घुसकर अपनी सैनिक छावनियां बनाने और चरवाहों के गांव बसाने की खबरें अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम से आ रही हैं। शायद इससे ठीक पहले वाला चरण हमने उस दिन तिब्बत के न्यिंग्ची प्रांत के मितोक जिले में उस दिन देखा था।

लड़ाई का दौर

1962 के युद्ध में ठेठ पश्चिम में लद्दाख के मोर्चे पर तो भारत ने चीन का सख्ती से मुकाबला किया था लेकिन पूरब में नेफा (मौजूदा अरुणाचल प्रदेश) में हमारी तरफ से कुछ खास नहीं किया जा सका था। देखते-देखते चीनी बूट असम में जोरहाट तक धमकने लगे थे। मामूली प्रतिरोध की स्थिति में अपनी फौजों के इस आसान बढ़ाव के बावजूद चीन ने अचानक न सिर्फ एकतरफा युद्धविराम की घोषणा करके अपनी फौजें युद्धपूर्व स्थिति में वापस बुला लीं, बल्कि सारे युद्धबंदी सही-सलामत स्थिति में वापस कर दिए। यहां तक कि लड़ाई के दौरान फटे हुए उनके कपड़े भी रफू करके, धोकर और प्रेस करके भेजे। इसकी वजह कूटनीतिक बताई जाती है। यानी अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के बाद रिश्ते सामान्य बनाने की कोशिश, या फिर अमेरिका के लिए इधर टांग फंसाने की गुंजाइश न छोड़ना।

उस समय ताइवान में चीन और अमेरिका के बीच तनाव बना हुआ था और कोरिया में थोड़ा ही पहले खत्म हुआ था। लेकिन चीन की आंतरिक स्थिति के जानकार बताते हैं कि 1962 में चीनी फौजों के लिए इस इलाके में देर तक लड़ पाना आसान नहीं था। न्यिंग्ची उपप्रांत से ही तिब्बत के तीन प्राचीन प्रांतों में एक, खाम की शुरुआत होती है, जहां के लड़ाकों ने चीन के गृहयुद्ध के अंतिम चरण (1948-49) में कम्युनिस्टों के खिलाफ खुलकर क्वोमिंतांग (बाद में ताइवान को अपना गढ़ बनाकर दोबारा चीन पर राज करने की उम्मीद बांधने वाली पार्टी) का साथ दिया था और 1956 में चीनी सत्ता के खिलाफ तिब्बती विद्रोह की शुरुआत भी यहीं से हुई थी।

खाम की ख्याति तिब्बत में योद्धाओं की धरती की है। कम्युनिस्ट शासन की शुरुआत से पहले खाम पर ल्हासा का नियंत्रण भी नाम मात्र का ही था लेकिन किसी बाहरी शासन की सख्ती स्वीकार न करना यहां रहने वाले खंपा लोगों का स्वभाव है। उत्तराखंड के चकराता में तिब्बती प्रवासियों की जिस टूटू रेजिमेंट का मुख्यालय है, उसमें ज्यादातर खंपा ही शामिल हैं। 1959 में दलाई लामा के भारत आते समय खंपा समेत काफी सारे तिब्बती विद्रोही उनके साथ चले आए थे लेकिन खाम का इलाका 1962 में भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ था। दूसरी समस्या सप्लाई लाइन कमजोर पड़ने की थी। दक्षिण-पश्चिम चीन की अकेली बड़ी फौजी छावनी छंग्तू न्यिंग्ची के मुख्यालय बाई से लगभग डेढ़ हजार किलोमीटर के ठेठ पहाड़ी रास्ते पर है।

याद रहे, 1949 के अंत में ताइवान भागने से पहले क्वोमिंतांग ने अपना आखिरी गढ़ छंग्तू को ही बनाया था। 1962 में इसी छंग्तू से न्यिंग्ची के बीच अपनी सप्लाई लाइन में तोड़फोड़ की आशंका चीन की कम्युनिस्ट सत्ता को परेशान कर रही थी। संक्षेप में कहें तो किसी वास्तविक लड़ाई की स्थिति में छंग्तू से नेफा तक फौजी साजोसामान और रसद की नियमित सप्लाई सुनिश्चित करने को लेकर चीन सरकार गहरी दुविधा में थी। भारत उस समय नेफा में टिककर लड़ने की स्थिति में होता, या असम में पांव जमाकर महीने-दो महीने में कुछ बाहरी मदद मिल जाने के बाद कोई जवाबी हमला कर पाता तो इस इलाके में पासा पलट भी सकता था। चीन को डर था कि लड़ाई लंबी खिंचने की स्थिति में तिब्बत का अधिक बागी मिजाज वाला यह हिस्सा उसके कब्जे से निकल सकता है।

न्यिंग्ची की किलेबंदी

संभव है, जुलाई 2015 में हमें यहां लाने का उनका मकसद यह दिखाने का रहा हो कि अभी वहां स्थितियां बहुत बदल गई हैं। हमारे साथ समस्या यह थी कि यहां की जनता की मुख्यधारा का मिजाज समझ पाने का कोई तरीका हमारे पास नहीं था। न ही हम यह जान पाने की स्थिति में थे कि यहां की मुख्यधारा अभी है कौन। खड़ी नाक वाले और चीनी-तिब्बती, दोनों से ही काफी अलग चेहरों वाले पशुपालक बंजारों के इन नए-नए बसे हुए गांवों की नृतात्विक (एंथ्रोपोलॉजिकल) मुख्यधारा कुछ और ही दिख रही थी।

न्यिंग्ची का मुख्यालय बाई शहर पूरी तरह चीनियों का है। वहां समुद्रतटीय चीन के पुराने व्यापारी शहर कैंटन की पूंजी लगी है और सैर करने, एडवेंचर का आनंद लेने, सोने की खदानों और पनबिजली परियोजनाओं में काम करने के लिए बड़ी तादाद में चीनी इस तरफ आ रहे हैं। एक तरह से यह चीन के सिचुआन प्रांत का विस्तार लगता है। स्थानीय आबादी में घुमंतू बंजारों और गड़रियों को सीमावर्ती क्षेत्रों में जमीनें देकर बसा दिया गया है। आसपास फौजी छावनियां बना दी गई हैं, जो इनके पशुधन और कृषि उपजों की ग्राहक हैं। चीन का कितना कुछ यहां दांव पर है, इसका अंदाजा अरबों डॉलर लगाकर न्यिंग्ची में खड़ा किए जा रहे इन्फ्रास्ट्रक्चर से लगाया जा सकता है।

जिस सड़क से हम आए थे, बीच-बीच में ठहरने और खाने-पीने का समय निकाल दें तो उससे ल्हासा से न्यिंग्ची पहुंचने में कम से कम आठ घंटे तो हमें लग ही जाते। तब से अब तक यह दूरी साढ़े चार घंटे में निपटा देने वाली एक और सड़क बनने और ल्हासा-न्यिंग्ची बुलेट ट्रेन चल जाने की खबर आ चुकी है। इसे छंग्तू से जोड़ने की कवायद इन पंक्तियों के लिखे जाते समय आखिरी दौर में थी। इसके पूरी होते ही न्यिंग्ची की चीनी किलेबंदी भी पूरी हो जाएगी।