
कार्ल मार्क्स ने 19वीं सदी में वैज्ञानिक समाजवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। तब से लेकर आज तक दुनिया भर में अलग-अलग देशों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समाजवाद के अलग-अलग रूप सामने आते रहे हैं। इसी सिलसिले में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान समाजवादियों द्वारा भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप समाजवाद का एक स्वतंत्र सिद्धांत विकसित किया। औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक युग में भारत में समाजवाद के कई रूप गढ़े गए हैं।
औपनिवेशिक युग में भारत में 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी) की स्थापना हुई। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के मुख्य संस्थापक आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, यूसुफ मेहरअली आदि थे। औपनिवेशिक युग के दौरान, भारत में समाजवादी आंदोलन का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद से स्वतंत्रता प्राप्त करना और स्वतंत्र भारत में सामाजिक और आर्थिक समानता कायम करना था। वे यह समानता लोकतांत्रिक तरीकों से और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बनाए रख कर हासिल करने के हिमायती थे।
भारत का समाजवादी आंदोलन कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी के नामों से चला। 1977 में सोशलिस्ट पार्टी का जनता पार्टी में विलय हो गया। परिणामस्वरूप एक संगठित राजनीतिक पार्टी के रूप में समाजवादी आंदोलन अवरुद्ध हो गया। कुछ समाजवादी नेताओं द्वारा, जिन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के जनता पार्टी में विलय का विरोध किया था, सोशलिस्ट पार्टी को बनाए रखने का प्रयास भी किया गया। 1991 में नई आर्थिक नीतियों के साथ शुरू हुए पूंजीवाद के नवउदारवादी चरण का विरोध करने के लिए कुछ समाजवादी नेताओं ने 1995 में समाजवादी जन परिषद, और 2011 में सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) का गठन किया।
26 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ आधिकारिक रूप से भंग कर दिया गया था। परिणामस्वरूप, संयुक्त राज्य अमेरिका का आधिपत्य स्थापित हुआ और दुनिया एकध्रुवीय हो गई। तीसरी दुनिया के ज्यादातर राज्य, जो वित्त, सैन्य और व्यापार में सोवियत संघ पर निर्भर थे, अब अमेरिका पर निर्भर हो गए। संयुक्त राज्य अमेरिका ने दुनिया में नवउदारवाद की नीतियों को लागू करना शुरू कर दिया। नवउदारवाद की सुनामी ने दुनिया के हर देश को अपने प्रवाह में बहा दिया। भारत इसका अपवाद नहीं रहा। नवउदारवाद उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों का संश्लेषण है। यह कोई निरुद्देश्य कवायद नहीं है। यह दुनिया में नवसाम्राज्यवाद की स्थापना के नियोजित उद्देश्य से परिचालित है।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और पूंजीपति सरकारों, उनकी नीतियों और उनके कार्यक्रमों को नियंत्रित करते हैं। परिणामस्वरूप भारत सहित पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर कॉरपोरेट घरानों का नियंत्रण है। इन नीतियों के परिणामस्वरूप धन का तीव्रता से केंद्रीकरण हो रहा है जिसके चलते अमीरों और गरीबों के बीच एक बड़ी खाई पैदा हो गई है। स्वतंत्रता, न्याय, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य उन्हीं के लिए हैं जिनके पास धन जमा हो रहा है। इस पृष्ठभूमि में डॉ प्रेम सिंह की पुस्तक ‘पंडित होई सो हाट न चढ़ा: समाजवादी नेताओं के प्रति मेरी श्रद्धांजलियां’ की विशेष प्रासंगिकता है।
लेखक ने ‘आमुख’ में लिखा है, “ये सभी श्रद्धांजलियां 1991 के बाद की हैं, जब भारत में नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के साथ शासक-वर्ग में उत्तरोत्तर नवउदारवाद की स्वीकृति बनती चली गई थी। नतीजतन, भारत के राष्ट्रीय जीवन की छाती पर अश्लील पूंजीवाद और आपराधिक संप्रदायवाद के गठजोड़ ने गहरी जड़ें जमा लीं। प्रतिरोध भी हुआ था। लेकिन वह कारगर नहीं हो पाया। यह “नीच ट्रैजडी” क्यों नहीं रोकी जा सकी, पुस्तक के आमुख में इसका जवाब नहीं लिखा जा सकता। अलबत्ता, इन सभी श्रद्धांजलियों में इस परिघटना की एक रेखा विद्यमान मिलेगी।”
डॉ. प्रेम सिंह एक शिक्षक, समाजवादी विचारक और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। वे अपने कॉलेज के दिनों से ही समाजवादी आंदोलन से जुड़े रहे हैं और 1995 से 2009 तक समाजवादी जन परिषद और 2011 से सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के साथ काम कर रहे हैं। महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, डॉ राम मनोहर लोहिया, किशन पटनायक, मधु लिमये और सच्चिदानंद सिन्हा जैसी महान हस्तियों ने उन्हें समाजवादी आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। 26 दिसंबर 1991 को यूएसएसआर के विघटन की आधिकारिक घोषणा के बाद नवउदारवाद ने जीवन के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया।
एक सामाजिक विचारक और राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में डॉ प्रेम सिंह ने देश-विदेश में प्रकाशित विभिन्न समाचारपत्रों, पत्रिकाओं और पुस्तकों में हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी में अपने लेखन में नवउदारवाद के खतरनाक प्रभावों को गहराई से समझते हुए अपनी समीक्षा प्रस्तुत की है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन, भारत के संविधान, और समाजवादी मूल्यों के संश्लेषण से विकास का एक वैकल्पिक रास्ता भी प्रस्तुत किया है।
इस पुस्तक में कुछ समाजवादी नेताओं के प्रति उनके निधन पर लिखी गईं श्रद्धांजलियां शामिल हैं। ये नेता हैं – मधु लिमये, किशन पटनायक, चंद्रशेखर, बृजमोहन तूफान, सुरेंद्र मोहन, मृणाल गोरे, प्रोफेसर विनोद प्रसाद सिंह, सुनील, भाई वैद्य, जस्टिस राजेंद्र सच्चर, प्रोफेसर केशव राव जाधव, जॉर्ज फर्नांडीज, रघुवंश प्रसाद सिंह, जगदीश तिरोड़कर और कर्पूरी ठाकुर। इनमें समाजवादी आंदोलन के कुछ नामचीन और कुछ गुमनाम नायक हैं।
पुस्तक की भूमिका वरिष्ठ पत्रकार अरुण त्रिपाठी ने लिखी है। साथ ही पुस्तक के बारे में वरिष्ठ पत्रकार हरिमोहन मिश्र की टिप्पणी है। इस पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण राममनोहर लोहिया समता न्यास, हैदराबाद के सौजन्य से सदर्न स्प्रिंग्स पब्लिशर्स, हैदराबाद से प्रकाशित हुआ है। वरिष्ठ समाजवादी लेखक रावेला सोमैया और प्रतिष्ठित विद्वान डॉ रघु ए कुमार द्वारा लिखित अंग्रेजी संस्करण की भूमिका और प्रकाशक की टिप्पणी को भी हिंदी संस्करण में शामिल किया गया है।
मधु लिमये (1 मई 1922 – 8 जनवरी 1995) से डॉ प्रेम सिंह की पहली मुलाकात उनके शिक्षक और युवा समाजवादी नेता राजकुमार जैन के साथ छात्र जीवन में एक सांस्कृतिक समारोह में होती है। मधु लिमये की सादगी और वैचारिक मेधा से पहले से ही प्रभावित डॉ प्रेम सिंह उनसे मिलने के बाद समाजवादी आंदोलन से जुड़ जाते हैं।
डॉ प्रेम सिंह ने श्रद्धांजलि में लिखा है कि मधु लिमये, जो एक समाजवादी नेता के रूप में कांग्रेस के घोर आलोचक रहे, अपने अंतिम दिनों में कांग्रेस को मजबूत बनाने की वकालत करते हैं। उनकी इस मान्यता का विश्लेषण करते हुए डॉ प्रेम सिंह ने कहा है कि सांप्रदायिकता की बढ़ती ताकत, जिसे परास्त करने के लिए मधु लिमये कांग्रेस की मजबूती की बात करते हैं, का गठजोड़ नवउदारवादी नीतियों के साथ है। कांग्रेस ने नवउदारवादी नीतियां देश पर थोपीं। लेकिन एक नई समाजवादी वैकल्पिक राजनीति की जरूरत की तरफ मधु लिमये का ध्यान नहीं जाता। इसे विडंबना ही कहा जाएगा।
डॉ प्रेम सिंह ने किशन पटनायक (30 जुलाई 1930 – 27 सितंबर 2004) के निधन पर विस्तृत श्रद्धांजलि लिखी है। यह उनके ऊपर किशन पटनायक के वैचारिक प्रभाव को दर्शाता है। उन्होंने किशन पटनायक के नजरिए से भारतीय बुद्धिजीवी-वर्ग की भूमिका का खुलासा किया है कि कैसे वह नवसाम्राज्यवादी गुलामी के पक्ष में खड़ा हो गया है। साथ ही किशन पटनायक के नवउदारवाद के बरक्स वैकल्पिक राजनीति चिंतन पर प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक का शीर्षक किशन पटनायक के प्रति लिखी गई श्रद्धांजलि से लिया गया है। श्रद्धांजलि में उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ से विस्तृत संदर्भ दिए गए हैं।
चंद्रशेखर (1 जुलाई 1927-8 जुलाई 2007) के प्रति लिखी गई श्रद्धांजलि में उनके राजनीतिक व्यक्तित्व के नवउदारवाद विरोधी पक्ष को उभार कर सामने रखा गया है। डॉ प्रेम सिंह के अनुसार चंद्रशेखर नवउदारवाद की आड़ में भारत में बाजार अर्थव्यवस्था के प्रवेश के पूरी तरह खिलाफ थे। लेकिन मीडिया ने चंद्रशेखर के इन विचारों को ज्यादा महत्व नहीं दिया। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक द्वारा भारत पर डाले जा रहे दबाव का विरोध किया। और महात्मा गांधी के विचारों की संगति में नवउदारवाद के विकल्प के रूप में स्वदेशी और स्वावलंबन पर जोर दिया।
चंद्रशेखर ने देश की आर्थिक गुलामी के विरोध में जनचेतना पैदा करने के लिए डंकल प्रस्तावों के खिलाफ जनचेतना अभियान चलाया, और अगस्त क्रांति दिवस के अवसर पर वैश्वीकरण के दूसरे चरण के खिलाफ वैकल्पिक अभियान चलाया। डॉ प्रेम सिंह ने लिखा है कि वैश्वीकरण के खिलाफ चंद्रशेखर के तर्क केवल मौखिक नहीं थे, बल्कि उन्होंने जनता को जगाने के लिए ठोस प्रयास भी किए। मुख्यधारा राजनीति में वे अकेले बड़े नेता थे जिन्होंने आर्थिक गुलामी के संकट को साफ तौर पर पहचाना और उसका भरसक मुकाबला किया।
समाजवादी आंदोलन के मजदूर संगठन हिंद मजदूर सभा (एचएमएस) के तूफ़ानी नेता बृजमोहन तूफान (11 जुलाई 1920-14 अक्तूबर 2010) के साथ पुस्तक के लेखक का बहुत ही आत्मीय संबंध व्यक्त होता है। तूफान हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू भाषाओं में पारंगत थे। उन्होंने अपने कार्यों और रचनाओं के माध्यम से एक प्रखर समाजवादी नेता और लेखक की भूमिका निभाई। कुछ वर्षों तक इंग्लैंड में समाजवादी समूहों में काम करने वाले तूफान ने देश लौटने के बाद दिल्ली को अपनी कर्मभूमि बनाया और आजीवन नए-पुराने राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रेरित करते रहे। वे एक ओजस्वी वक्ता थे। उन्होंने वैचारिक और रचनात्मक सृजन की कई पुस्तकें लिखीं। उनकी छोटी-सी पुस्तक ‘गांधी से आगे’ समाजवादी सर्कल में काफी चर्चित हुई थी।
सुरेंद्र मोहन (4 दिसम्बर 1926 -17 दिसम्बर 2010) को डॉ प्रेम सिंह ने एक स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी नेता एवं विचारक, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू के लेखक, सांसद और सबसे बढ़कर समाज के हाशिये पर पड़े समूहों- दलितों, महिलाओं, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, मजदूरों और किसानों – के हितों के सतत पैरोकार के रूप में याद किया है।
एक समाजवादी राजनीतिक नेता के रूप में, भारत के अन्य समाजवादियों की तरह, सुरेंद्र मोहन नवउदारवादी नीतियों के विरोधी थे। वे लगातार समाजवादी एक के प्रयास भी करते रहे। दिल्ली और देश अधिक से अधिक राजनीतिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों, धरनों, रैलियों, विरोध प्रदर्शनों में उनकी हिस्सेदारी रहती थी। उनका देश के सभी परिवर्तनकारी समूहों के साथ रिश्ता था। अपनी श्रद्धांजलि में डॉ प्रेम सिंह ने बहुत सही लिखा है कि सुरेंद्र मोहन ने वास्तव में समाजवादी विचार के दायरे को बढ़ाया।
मृणाल गोरे (24 जून 1928-17 जुलाई 2012) एक प्रतिबद्ध समाजवादी नेता थीं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया था। आजाद भारत में वे उन्होंने समाजवादी आंदोलन, गोवा मुक्ति आंदोलन और संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में भाग लिया। आपातकाल के दौरान अन्य दिग्गजों के साथ उन्हें भी जेल में डाला गया था। राजनीति में उनका लंबा करियर 70 वर्षों तक फैला रहा। उन्होंने अपना करियर मुंबई में नगरपालिका पार्षद के रूप में शुरू किया।
पार्षद होने के अलावा गोरे एक सफल विधायक और सांसद भी रहीं। उनका राजनीतिक उद्देश्य सत्ता हासिल करना नहीं बल्कि लोगों की सेवा करना था। इसीलिए जब भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें भारत का स्वास्थ्य मंत्री बनाने की पेशकश की, तो उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। वे लोगों के बीच ‘मृणाल ताई’ और ‘पानी वाली बाई’ के नाम से लोकप्रिय थीं। उनके मन में यह स्पष्टता थी कि ‘लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता’ उनकी मुख्य प्राथमिकताएँ हैं।
डॉ प्रेम सिंह ने बताया है कि वे उन सभी प्रयासों में शामिल रहती थीं जो भारत के समाजवादी आंदोलन को फिर से प्रतिष्ठित करने के लिए किए जाते थे। गरीबों और वंचितों को अपने राजनीततिक कर्म के केंद्र में रख कर चलने वाली मृणाल गोरे कारपोरेट-कम्यूनल गठजोड़ की स्वाभाविक विरोधी थीं।
प्रोफेसर विनोद प्रसाद सिंह (10 जून 1940 – 8 फरवरी 2013) एक उत्कृष्ट शिक्षक, विद्वान, समाजवादी नेता तथा संपादक थे। उन्होंने लंबे समय तक जॉर्ज फर्नांडीज के साथ ‘प्रतिपक्ष’ पत्रिका का सम्पादन किया, और आचार्य नरेंद्र देव द्वारा संपादित पत्रिका ‘संघर्ष’ का ‘नया संघर्ष’ के नाम से पुनर्प्रकाशन शुरू किया। उन्होंने डॉ प्रेम सिंह के साथ ‘मधु लिमये: जीवन और राजनीति’ पुस्तक का सम्पादन भी किया।
डॉ प्रेम सिंह उन्हें बहुत करीब से जानते थे, और उन्होंने उनके व्यक्तित्व और लोगों तथा उनके छात्रों के साथ संबंधों के बारे में बताया है। वे ‘विनोद जी’ या ‘विनोद बाबू’ के नाम से लोकप्रिय थे। वे हमेशा लोगों की मदद के लिए तैयार रहते थे। उनके पास एक अच्छी लाइब्रेरी थी। अन्य समाजवादी नेताओं और विपक्षी दलों के नेताओं की तरह वे भी आपातकाल के दौरान जेल गए थे। प्रोफेसर विनोद प्रसाद सिंह मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीज, चंद्रशेखर आदि राष्ट्रीय नेताओं के साथी थे। वे समाजवादी जन परिषद (एसजेपी) के संस्थापकों में से एक थे। विनोद जी अपने जीवन के अंतिम चरण में गठिया से पीड़ित हो गए और उनकी आंखों की रोशनी भी चली गई। इसका उन्हें गहरा दुख था।
साथी सुनील (4 नवंबर 1959-21 अप्रैल 2014) पर डॉ प्रेम सिंह ने दो श्रद्धांजलि लेख लिखे हैं। यह उनकी नजर में सुनील के महत्व को रेखांकित करता है।। सुनील नवउदारवाद के रूप में आने वाले पूंजीवादी और नवसाम्राज्यवाद के न केवल खिलाफ थे, उसका विचारधारात्मक विकल्प भी प्रस्तुत करते थे। जवाहरलाल यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में एमए करने के बाद उन्होंने मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव भूमकापुरा (केसला) को अपनी कार्य-स्थली बनाया और मृत्यु-पर्यंत वहीं लोगों के बीच रहते हुए संघर्ष करते रहे। उन्होंने कई लेखों, पुस्तिकाओं, पर्चों आदि के माध्यम से नवउदारवाद और उसकी चुनौतियों के खिलाफ लगातार लिखा। शिक्षा के अधिकार की वकालत करते हुए सुनील पूरे भारत में समान, मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के पक्षधर थे। डॉ प्रेम सिंह लिखते हैं कि साथी सुनील को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी शिक्षा समेत राष्ट्रीय जीवन के सभी आयामों पर आए नवसाम्राज्यवाद के हमले को विफल किया जाए।
‘भाई वैद्य’ के नाम से प्रसिद्ध भालचंद्र भाई वैद्य (22 जून 1928 – 2 अप्रैल 2018) ने भारत छोड़ो आंदोलन, गोवा मुक्ति आंदोलन और जेपी आंदोलन में भाग लिया था। वे चंद्रशेखर की भारत यात्रा में भी पूरा समय साथ रहे। वे महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री (1978-1980) और पूना के मेयर (1974-1975) भी रहे थे। उनके राजनीतिक विचारों पर मुख्यत: ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर और जयप्रकाश नारायण की विचारधाराओं का प्रभाव था। उन्होंने समाजवादी जन परिषद और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) में काम करते हुए नवउदारवाद, निजीकरण और वैश्वीकरण का लगातार विरोध किया। डॉ प्रेम सिंह ने उनके प्रति लिखी श्रद्धांजलि में उन्हें बहुत ही आत्मीयता के साथ याद किया है।
पुस्तक: ‘पंडित होई सो हाट न चढ़ा: समाजवादी नेताओं के प्रति मेरी श्रद्धांजलियां’
लेखक: प्रेम सिंह
प्रकाशक: नामक पब्लिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली 110025
दिसंबर 2024, पृष्ठ: 102, मूल्य: 299 रुपये
पुस्तक में जस्टिस राजेंद्र सच्चर (22 दिसम्बर 1923–20 अप्रैल 2018) पर भी दो श्रद्धांजलि लेख मिलते हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस सच्चर डॉ राममनोहर लोहिया को अपना हीरो मानते थे। वे 1948 में सोशलिस्ट पार्टी के गठन के बाद से ही उसके सदस्य और कार्यकर्ता बने रहे। वे 2011 में सोशलिस्ट पार्टी का सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के नाम से पुनर्स्थापना करने वाले महत्वपूर्ण नेताओं में से एक थे। वे एक उत्कृष्ट न्यायाधीश, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतंत्रवादी, मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के हिमायती थे।
डॉ प्रेम सिंह ने उन्हें बहुमुखी प्रतिभा का धनी और अद्वितीय व्यक्तित्व का स्वामी बताते हुए एक गहन संवेदनशील इंसान के रूप में याद किया है। वे निजीकरण-निगमीकरण की नीतियों को संविधान विरोधी मानते हुए, बिना किंतु-परंतु के उनका विरोध करते थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति पर एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए उनकी अध्यक्षता में एक सात सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था।
जस्टिस सच्चर ने निर्धारित समय के भीतर समिति की रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। समिति के तथ्य और सिफारिशें पूरे देश में गंभीर बहस का विषय बने। इस रिपोर्ट ने ‘मुसलमानों के तुष्टीकरण’ के मिथक को एक झटके में धराशायी कर दिया। लेखक ने अफसोस जाहिर किया है कि एक समय सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू करने की बढ़-चढ़ कर बात करने वाले नेता और दल बहुसंख्यक सांप्रदायिक फासीवाद के उफान के दौर में उसका भूल कर भी उल्लेख नहीं करते।
प्रोफेसर केशव राव जाधव (27 जनवरी 1933 – 16 जून 2018) एक प्रमुख समाजवादी विचारक और नेता थे। वे उस्मानिया विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। वे डॉ राम मनोहर लोहिया के राजनीतिक दर्शन से गहराई से प्रभावित थे। वे छात्र जीवन से ही समाजवादी आंदोलन में शामिल हो गए थे और समाजवादी युवजन सभा (एसवाईएस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए थे। एक छात्र नेता के रूप में, वे डॉ राम मनोहर लोहिया और अन्य समाजवादी नेताओं के करीब आए और जीवनपर्यंत समाजवादी आंदोलन से जुड़े रहे।
वे समाजवादी जन परिषद से संबद्ध रहे और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के संस्थापक नेताओं में थे। अलग तेलंगाना राज्य के लिए चलाए गए आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण सक्रिय भूमिका थी जिसमें उन्हें 17 बार गिरफ्तार किया गया और दो साल की जेल हुई। वे नागरिक स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के चैंपियन थे। उन्होंने एक सच्चे समाजवादी नेता की तरह कारपोरेट-कम्यूनल गठजोड़ का सतत विरोध किया।
जॉर्ज फर्नांडीज (3 जून 1930 – 29 जनवरी 2019) एक तेजतर्रार ट्रेड यूनियन नेता, समाजवादी राजनीतिज्ञ, प्रखर सांसद, सफल मंत्री, उत्कृष्ट वक्ता और संगठक और संपादक थे। डॉ प्रेम सिंह ने अपनी श्रद्धांजलि में उनके राजनीतिक कर्म को दो हिस्सों – समाजवादी राजनीति और सांप्रदायिक राजनीति – में बांटते हुए पहले हिस्से के जॉर्ज को याद किया है। एक उग्र समाजवादी मजदूर नेता के रूप में उन्होंने रेलवे कर्मचारियों की लंबी हड़ताल (1974) का नेतृत्व किया। यह रेलवे के इतिहास की सबसे बड़ी हड़ताल थी। उन्होंने कोका-कोला जैसी दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनी को भारत छोड़ने पर मजबूर करने में सफलता हासिल की।
रघुवंश प्रसाद सिंह (6 जून 1946 – 13 सितंबर 2020), जिन्हें रघुवंश बाबू के नाम से जाना जाता है, एक प्रतिबद्ध समाजवादी थे। महात्मा गांधी, डॉ. राम मनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के विचारों, आदर्शों और दृष्टिकोण से प्रभावित होने के कारण वे कॉर्पोरेटवाद, पूंजीवाद और नवउदारवाद के विरोधी थे। डॉ प्रेम सिंह के अनुसार, हालांकि वे एक अगड़ी जाति से थे और उनके पास गणित में पीएचडी की डिग्री थी, लेकिन उन्होंने खुद को पिछड़ी जातियों के हित या पिछड़ी जातियों की राजनीति के लिए समर्पित कर दिया। यह समाजवाद के प्रणेता डॉ राममनोहर लोहिया की विचारधारा के प्रभाव के कारण था, जो इस बात की वकालत करते थे कि समाजवादी कार्यकर्ताओं को पिछड़ी जातियों और समाज के हाशिए के वर्गों के उत्थान के लिए खाद बनने का काम करना चाहिए।
जगदीश तिरोड़कर (23 मार्च 1937 – 29 अक्टूबर 2022) को डॉ प्रेम सिंह ने दिल की गहराइयों से बहुत सम्मान के साथ याद किया है। वे एक बेहद विनम्र इंसान, समाजवादी कार्यकर्ता और पृष्ठभूमि में रह कर काम करने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता थे। डॉ प्रेम सिंह की जगदीश तिरोडकर से पहली मुलाकात जॉर्ज फर्नांडीज के एक परिचयात्मक पत्र के साथ 1989 में हुई थी, जब वे और उनकी पत्नी कुमकुम यादव किसी काम से किंग एडवर्ड जॉर्ज मेमोरियल अस्पताल, मुंबई (तब बॉम्बे) गए थे।
डॉ प्रेम सिंह लिखते हैं कि उनकी सहजता और सौम्यता ने दोनों पर गहरा प्रभाव डाला था। जगदीश तिरोड़कर न केवल समाजवादी और मजदूर आंदोलनों में सक्रिय रहे, उन्होंने गोवा मुक्ति सत्याग्रह में भी भाग लिया था। इसके लिए उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा भी मिला हुआ था। जगदीश तिरोड़कर को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए डॉ प्रेम सिंह लिखते हैं कि समाजवादी आंदोलन के साथी लंबे समय तक उनके चुपचाप चले जाने से पैदा हुए खालीपन को महसूस करते रहेंगे।
जननायक कर्पूरी ठाकुर (24 जनवरी 1924 – 12 फरवरी 1988) का स्मरण उनके राजनीतिक कर्म और विचारों की मौजूदा दौर में प्रासंगिकता के मद्देनजर किया गया गया है। कर्पूरी ठाकुर पर समाजवादी विचारक आचार्य नरेंद्र देव, लोकनायक जयप्रकाश नारायण और डॉ राम मनोहर लोहिया का प्रभाव था। यही कारण है कि वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य बने। साथ ही उन पर ज्योतिबा फुले, दक्षिण भारत के प्रगतिशील विचारक पेरियार और डॉ भीमराव अंबेडकर के विचारों का भी प्रभाव था। लोगों की गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और अपने परिवार की हाशिए पर स्थिति ने कर्पूरी जी के जीवन और चिंतन को गहराई प्रदान की। वे हमेशा वंचित, उत्पीड़ित और शोषित-वर्ग के लिए लड़ते रहे।
डॉ प्रेम सिंह के अनुसार मुख्यमंत्री रहते हुए कर्पूरी ठाकुर की सादगी उनके गांधीवादी समाजवादी धारा से जुड़ाव को दर्शाती थी और वे हमेशा भीड़ से घिरे रहते थे। इस संदर्भ में डॉ प्रेम सिंह जाबिर हुसैन की कर्पूरी ठाकुर पर लिखी गई कविता ‘भीड़ से घिरा आदमी’ का हवाला देते हैं।
उन्होंने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होकर और पढ़ाई छोड़कर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। एक प्रतिबद्ध समाजवादी नेता के रूप में उन्होंने 1952 में बिहार विधान सभा का चुनाव जीता; तब से लेकर अपनी मृत्यु तक वे लगातार विधानसभा चुनाव जीतते रहे। वे 1977 में लोकसभा के लिए भी चुने गए और 1984 में केवल एक बार चुनाव हारे। वे लंबे समय तक बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता और दो बार मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने बिहार में पिछड़ों के लिए 26 प्रतिशत आरक्षण का फार्मूला तैयार किया और उसे लागू किया। कर्पूरी ठाकुर का उद्देश्य हाशिए पर पड़े समूहों को समग्रता में आगे लाना था। लेकिन उन्होंने कभी भी ‘सांप्रदायिक जातिवाद और जातिवादी अस्मितावाद’ का सहारा नहीं लिया। डॉ प्रेम सिंह ने सही टिप्पणी की है कि वे जनता के नेता – जननायक – के रूप में प्रतिष्ठित हुए, किसी जाति के नेता के रूप में नहीं।
डॉ प्रेम सिंह की यह पुस्तक समाजवादी नेताओं की सादगीपूर्ण जीवन-शैली और समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों के हितों की रक्षा के लिए उनके जीवन संघर्ष के बारे में बताती है। ये सभी समाजवादी नेता नवउदारवाद और कॉर्पोरेटवाद का विरोध करते हुए एक संविधान-निर्देशित विकल्प पर जोर देते हैं। मुझे उम्मीद है कि प्रस्तुत पुस्तक छात्रों, शिक्षकों और शोधार्थियों के साथ-साथ साधारण जनता के लिए भी इन समाजवादी नेताओं के योगदान को जानने में मददगार और उपयोगी साबित होगी।
( समीक्षक डॉ रामजी लाल समाज वैज्ञानिक और दयाल सिंह कॉलेज, करनाल, हरियाणा के पूर्व प्राचार्य हैं)