भारत गणराज्य के स्वधर्म का मूल सूत्र है सेकुलरवाद

भारत गणराज्य की स्थापना छिहत्तर वर्ष पहले हुई थी, लेकिन उसके स्वधर्म की बुनियाद कोई तीन हज़ार साल पहले पड़ चुकी थी। आज का भारत गणराज्य “भारतवर्ष”, “हिन्दुस्तान” और “इंडिया” की धाराओं का त्रिवेणी संगम है। भारतीय सभ्यता की इस यात्रा के हर पड़ाव के अवशेष हमारे सामुदायिक अवचेतन में मौजूद हैं। इसलिए भारत गणराज्य का स्वधर्म जड़ और शाश्वत नहीं है। वह भीतरी और बाहरी दोनों किस्म की गतिशीलता से प्रवाहित होता है। हमारा स्वधर्म प्रवाहमान है।

इसलिए भारत के स्वधर्म की तलाश प्राचीन भारत के किसी सनातन मूल्यों में नहीं की जा सकती। भारत का स्वधर्म सिर्फ औपचारिक दस्तावेजों, लिखित आदर्शों, स्थापित विचारधाराओं की भाषा या संस्थागत धार्मिक पोथियों में नहीं बल्कि आंदोलनों की भाषा में मिलेगा। सबसे पहले बौद्ध और जैन धर्मदर्शन, फिर सूफी और भक्ति परंपरा और आधुनिक युग में राष्ट्रीय आंदोलन ने स्थापित सत्ता को चुनौती दी, सभ्यता के मूल्य बोध को खंगाला और जनमानस को उद्वेलित कर स्वधर्म को पुनःपरिभाषित किया। इन धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों को समझ कर हम मोटे तौर पर चार सूत्र चिह्नित कर सकते हैं जो भारत गणराज्य के स्वधर्म को परिभाषित करते हैं। इस और आगामी तीन आलेखों में इन चारों सूत्रों की व्याख्या की जाएगी।

स्वधर्म का पहला सूत्र मैत्री से शुरू होकर सुलह-ए-कुल कि विचार से गुजरते हुए आधुनिक सेकुलरवाद या सर्वधर्म समभाव की अवधारणा तक पहुंचता है। सेकुलरवाद की समकालीन बहस में अक्सर दोनों पक्ष मानकर चलते हैं कि पंथ निरपेक्षता एक नया विचार है। एक नई समस्या का नया समाधान। लेकिन भारतीय सभ्यता के नजरिये से देखें तो ना यह समस्या नई है, और ना ही उसका यह निदान नया है।

विविध मत, पंथ, सम्प्रदाय, सिलसिले का सह अस्तित्व भारतीय सभ्यता के विशिष्ट लक्षणों में से एक रहा है। इसलिए यहाँ समाज और सरकार दोनों तरफ़ से इस सह-अस्तित्व को महज़ एक अवस्था या मजबूरी की बजाय एक आदर्श के रूप में विकसित करने के प्रयास भी शुरू से हुए हैं। मैत्री की अवधारणा शुरू से ही हमारी सभ्यता के स्वधर्म को निरूपित करती रही है।

मैत्री को अक्सर सम्राट अशोक या फिर गौतम बुद्ध से जोड़कर देखा जाता है। यह सही भी है। लेकिन बौद्ध दर्शन ने एक पूर्ववर्ती विचार को विकसित किया था। ऋग्वेद में मित्र देवता संधि, समन्वय और सौहार्द के प्रतीक हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में मित्र सामंजस्य का द्योतक बनते हैं। इसका विस्तार करते हुए गौतम बुद्ध मैत्री (पाली में ‘मेत्ता’) को एक आदर्श के रूप में स्थापित करते हैं, चार ब्रह्मविहार में से एक। मैत्री अद्वेष और समभाव की मनःस्थिति है।

सम्राट अशोक के शिलालेखों ने मैत्री को एक सामाजिक और राजनीतिक आदर्श के रूप में स्थापित किया। अद्वेष, अहिंसा और स्नेह के विचार को अशोक ने सांप्रदायिक सद्भाव से जोड़ा। स्वयं बौद्ध होते हुए भी अशोक के शिलालेख सभी श्रमण (विविध बौद्ध निकाय, जैन, आजीविका और अन्य सधुक्कड़ संप्रदाय) और ब्रह्मण (वैदिक धर्म का पालन करने वाले) मत का सम्मान करने का निर्देश देते हैं। सर्वधर्मसमभाव को शासकीय नीति और संयम को सामाजिक आदर्श के रूप में स्थापित कर अशोक ने उस विचार की नींव डाली जिसे आज हम पंथ निरपेक्षता कहते हैं।

अकबर की सुलह-ए-कुल की नीति ने सर्वधर्मसमभाव की उस नीति का विस्तार किया जिसकी बुनियाद अशोक ने डाली थी। बादशाह का धार्मिक रूझान जो भी हो, प्रजा को अपनी धार्मिक मान्यता, उपासना और रस्मों-रिवाज की पूरी छूट होगी। जबरन धर्म-परिवर्तन नहीं होगा। राज्य की तरफ़ से धार्मिक मामलों, संस्थाओं और अनुष्ठान में कोई दखलंदाजी नहीं होगी। प्रशासनिक नियम और कानून किसी एक मजहब के नहीं होंगे। किसी भी पंथ, संप्रदाय और मजहब के साथ भेदभाव नहीं होगा। और राज्य सभी धार्मिक स्थलों और संस्थाओं को प्रश्रय और अनुदान देगा। जाहिर है, अकबर की नीति आधुनिक अर्थ में सेकुलर नहीं थी, हो नहीं सकती थी। मुद्दे की बात यह है कि अकबर ने भारत के स्वधर्म को पहचान लिया था।

हमारे संविधान की पंथ निरपेक्षता अशोक और अकबर की नीति का विस्तार भर है। समकालीन भारत में ‘सेकुलर’ का इसी अर्थ में इस्तेमाल होता है। ‘सेकुलरवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ का सामान्य मतलब है सभी धर्म-संप्रदायों को एक नज़र से देखना और किसी एक संप्रदाय के वर्चस्व का विरोध करना। लेकिन शब्दों के इतिहास और उनके निहितार्थ देखें तो इस नीति को समझने के लिए न तो ‘धर्मनिरपेक्षता’ सही शब्द है और न ही यूरोपीय अर्थ में ‘सेकुलरवाद’।

चूँकि हमारे यहाँ धर्म का मतलब ‘रिलिजन’ नहीं रहा है, इसलिए ‘धर्मनिरपेक्षता’ बिना वजह समाज के नैतिक मूल्यों के प्रति उदासीनता का संदेश देती है। इस लिहाज से संविधान के आधिकारिक हिंदी पाठ में इस्तेमाल ‘पंथ निरपेक्षता’ बेहतर शब्द है। इसी प्रकार ‘सेकुलरवाद’ बिना वजह हमारी बातचीत में उस यूरोपीय संदर्भ को घसीट लाती है जिसका हमारी समस्या और उसके निदान से कोई लेना-देना नहीं है। हमारी समस्या चर्च-राज्य सम्बन्ध की नहीं है। हमें किसी पोप, ख़लीफ़ा या धर्मगुरुओं के राज का खतरा नहीं है। इसलिए यूरोपीय काट के अनीश्वरवादी या सभी धार्मिक मामलों के प्रति आँख मूँदने वाले सेकुलर निज़ाम की हमे कोई ज़रूरत नहीं है।

शब्द जो भी हों, हमारी चुनौती कमोबेश वही है जो अशोक और अकबर की थी। हमारी चुनौती है अलग अलग मत और धर्मावलम्बियों के बीच समभाव स्थापित करना तथा वर्चस्ववाद, घृणा और हिंसा को रोकना। यह दोनों पुरानी चुनौतियाँ थी, लेकिन आधुनिक सन्दर्भ में तीखी हो गयी हैं। साथ ही नए ज़माने की नयी चुनौतियाँ भी जुड़ गई हैं। अब राज्य को धार्मिक संस्थाओं का नियमन करना भी ज़रूर है। साथ ही समकालीन राज्य धार्मिक समुदाय में अंदरूनी कुरीतियों के सुधार करने की ज़िम्मेदारी से भी कंधा नहीं मोड़ सकता।

इस चुनौती का मुक़ाबला करने के लिए हमे मैत्री और सुलह-ए-कुल के रास्ते पर चलते हुए सर्वधर्मसमभाव को परिभाषित करना होगा। यह एक ऐसी देशज दृष्टि है जो धार्मिकता का सम्मान करती है। यह दृष्टि धर्म के प्रति निरपेक्ष नहीं है, चूंकि धर्म नैतिकता का स्रोत है। लेकिन यह किसी भी पंथ या संप्रदाय के प्रति निरपेक्ष या निष्पक्ष है। मैत्री भाव से उपजी यह दृष्टि सभी धार्मिक समुदायों के प्रति समभाव रखती है। धार्मिक विचार और व्यवहार की विविधता हमारी सभ्यता की विरासत है। इसलिए राज्य सत्ता का दायित्व धार्मिक आचार-व्यवहार को रोकना नहीं है, बल्कि धार्मिक वर्चस्व को रोकना है। विविध सम्प्रदायों में आपसी विश्वास और सम्मान का रिश्ता बनाना और जहाँ ज़रूरत हो वहाँ धार्मिक समुदाय के भीतर शोषण को रोकना भी है।

इस स्वधर्म के अनुरूप बना है भारतीय संविधान। संविधान की प्रस्तावना में “सेक्युलरिज्म” कब और क्यों डाला गया, यह बहस निरर्थक है। सच यह है कि मूल संविधान की बुनियादी व्यवस्था सर्वधर्मसमभाव के अनुरूप थी। इस अर्थ में सर्वधर्मसमभाव केवल एक संवैधानिक प्रावधान नहीं है। यह केवल एक समझदार नीति नहीं है। यह हमारी सभ्यता के मूलभूत मूल्यों में से एक है। यह भारत देश को बचाए रखने की अनिवार्य शर्त है- या तो भारत सर्वधर्मसमभाव के रास्ते पर रहेगा, या फिर भारत रहेगा ही नहीं। यह भारत गणराज्य के स्वधर्म का पहला सूत्र है।

(लेखक की नई पुस्तक “गणराज्य का स्वधर्म” (सेतु प्रकाशन) से उद्धृत और सम्पादित अंश)

First Published on: February 1, 2026 11:23 AM
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