मैं कोई कवि नहीं हूँ। कवि सम्मेलनों का श्रोता भी नहीं। काव्य की साहित्यिक आलोचना सी मेरा दूर-दराज़ का भी रिश्ता नहीं है। बस एक पाठक हूँ, और वह भी कभी-कभार। सच कहूँ तो कवियों के दायरे से थोड़ा दूर रहता आया हूँ। कविता और राजनीति के रिश्ते को मानता हूँ, लेकिन नारे वाली हथौड़ा छाप कविता से परहेज करता रहा हूँ। राजनीति को समझने के लिए समाजशास्त्र या विचारधाराओं की भाषा का सहारा लेता हूँ, कविता का नहीं।
लेकिन पिछले कुछ सालों से ऐसा लगने लगा है कि हमारे आज के सच को समझने के लिए कविता एक ज़रूरी माध्यम है। टीवी मजाक बन गया है और अख़बार गूँगे हो गए हैं। सोशल मीडिया पर कभी कभार सच का टुकड़ा तैरता दिखाई पड़ जाता है। लेकिन उसे भी अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए चीखना पड़ता है। सहज भाव से पूरा सच बोलना उसके भी बस का नहीं। समाज शास्त्र की भाषा पुरानी है, दुनिया बदलती जा रही है। अब ट्रम्प जो दुनिया के साथ कर रहा है उसे सिर्फ धौंसपट्टी, गुंडागर्दी या नवसाम्राज्यवाद कहना ठीक नहीं है। ग़ज़ा में जो हुआ उसे सिर्फ़ नरसंहार कहना सटीक नहीं है। हमारे देश में जो हो रहा है उसे लोकतंत्र का पतन या संविधान को चुनौती कहना काफ़ी नहीं है। इस सचाई के लिए नए शब्द गढ़ने में शास्त्रों को अभी वक्त लगेगा। लेकिन कविता शास्त्रों के अनुशासन की ग़ुलाम नहीं है। वो वक्त के साथ बह सकती है।
इसलिए विश्व पुस्तक मेले में घूमते हुए कविताओं की किताबों पर बार-बार नज़र टिकी। पुराने कवियों की कालजयी कविताएँ जो आज भी ताज़ा लगती हैं। आज़ादी के बाद की हिंदी कविता ने राजनीति से परहेज नहीं किया। कविता और जनतंत्र के इस अभिन्न रिश्ते की याद दिलाती है अपूर्वानंद की किताब ‘कविता में जनतंत्र’ (राजकमल प्रकाशन) जो पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान उनकी एक लेख शृंखला पर आधारित है। इसमें हिंदी कविता के अधिकांश बड़े हस्ताक्षर हैं-रघुवीर सहाय, विजयदेव नारायण साही, कुँवर नारायण, श्रीकांत वर्मा, मुक्तिबोध, धूमिल, नागार्जुन, केदारनाथ सिंह, शमशेर बहादुर सिंह, ओमप्रकाश बाल्मीकि, अशोक वाजपेयी, अनामिका आदि। साहित्य आलोचना की बोझिल भाषा से हटकर अपूर्वानंद हर कविता के बहाने इतिहास के कुछ पन्ने खोलते हैं। इस संग्रह में अदनान कफ़ील दरवेश, जसिंता केरकेट्टा और अनुज लुगुन जैसे युवा कवियों की उपस्थिति हमारे वक्त की आवाज को दर्ज करती है।
पुस्तक मेले में मुझे ऐसे अनेक स्वर सुनाई दिए जो हमारे समय के सच को उस सम्पूर्णता में दर्ज कर रहे हैं जो दुर्लभ है। उनकी कविता इस सच से वाक़िफ़ है कि हम इतिहास के एक नए दौर में दाखिल हो रहे हैं। विहाग वैभव घोषणा करते हैं “यह इस सदी और सभ्यता का आख़िरी मोड़ है/ इस मोड़ से जो लौटना चाहते हैं, लौट जाएँ” (मोर्चे पर विदागीत, राजकमल)। यहाँ से आगे क्या कुछ होने वाला है उसका चित्र खींचते विहाग की कविता इस नई चुनौती का सामना करने के लिए आमंत्रित करती है, यह याद दिलाती है कि “सभ्यता की अदालत में तटस्थता एक अपराध है”।
ऐसे में कविता क्या करे? इसकी जिम्मेदारी कवि अपनी तरह से कबूलते हैं। अदनान कफ़ील दरवेश वैसे तो युवा कवि कहलायेंगे, लेकिन उनका तीसरा संग्रह “लानत का प्याला” (राजकमल) उन्हें हमारे समय की प्रमुख आवाज़ के रूप में स्थापित करता है। “अच्छी कविता अच्छे दिनों में नहीं लिखी जाएगी … वो आयेगी/ एक चमकीले फूल की तरह, स्वप्न में उगती हुई/ यथार्थ का जूता डाले/ किसी और समय में/ चुपके से दाखिल हो जाएगी”। इस संग्रह में उनकी कविता ‘मुसलमान’ इतिहास के इस दौर का एक दस्तावेज है: “ये कैसी इबादत है मुसलमानों की, जो कभी ख़त्म ही नहीं होती!/ हमलावर बाजू, पैर, गोलियाँ, फब्तियाँ, गालियाँ बरसते रहे/ और मुसलमान सिजदे में ही रहे … वो धोखे से नहीं भरोसे में मारे जाने वाले लोग थे … वे इतने कम्बख़्त थे कि उम्मीद न छोड़ने पर बाज़िद थे”।
आमिर अजीज़ की कविता “सब याद रखा जाएगा” की तरह यह कविता समकालीन भारत के उस सच को पूरी ईमानदारी से उद्घाटित करती है जिसके बारे में चुप्पी परसी हुई है। “सलीब पर नागरिकता” (सेतु प्रकाशन) संग्रह में इसी सच को जावेद आलम ख़ान गला खोलकर कहने का जोखिम उठाते हैं। “मेरा देश किताबों में क़ैद कोई देवता नहीं है … देश तब हारता है जब उसे झंडे में छिपाया जाता है/ जब अपहृत रंग मज़हबी पहचान में बदल जाते हैं/ जब अपने ही नागरिक जबरदस्ती शत्रु खेमे में खड़े किए जाते हैं/ देश रोता है जनता के भीड़ में बदल जाने पर/ आदमी को कपड़ों से पहचाने जाने पर”।
राजेन्द्र राजन के नए संग्रह “यह कौनसी जगह है” (सेतु प्रकाशन) में “छींक पर एक बहस” और “बेरोजगारी पर एक बहस” हमारे समय में मीडिया का चरित्रचित्रण करती है। न्याय व्यवस्था पर कवि की दो पक्तियाँ ही काफ़ी हैं: “भेड़िये की शिकायत पर/ मेमने के ख़िलाफ़/ दर्ज कर ली गई एफ़आईआर … फ़ैसला आना बाक़ी है/ मेमने काँप रहा है/ भेड़िया मुस्कुरा रहा है।”
आज के वक्त की कविता हमें सिर्फ़ क्षुब्ध और निराश नहीं छोड़ती। पराग पावन एक नागरिक को याद दिलाते हैं: “देशप्रेम की कविता उस कवि से मत सुनो/ जो काल के कपाल पर लिखता मिटाता है/ लेकिन अपनी बरौनी पर बैठे क़ातिल को देख नहीं पाता है” (‘जब हर हँसी संदिग्ध थी’, राजकमल)। उनका यह आह्वान हमे कुछ करने के लिए प्रेरित करता है: “हम दुनिया को/ इतने ख़तरनाक हाथों में नहीं छोड़ सकते/ हमे अपनी-अपनी आत्महत्याएं स्थगित कर देनी चाहिए।”
आज की यह कविता हमें उम्मीद भी देती है: “एक दिन/तुम्हारे आँसुओं से अँकुरायेगी फिर ये धरती/ मची भगदड़ के बीच एक फूल के लिए हुलसती/ तुम्हारी गोद में ये जो बच्ची है/ अंततः बचाएगी वही/ उम्मीदों के प्राण।” (आलोक कुमार मिश्रा, “पोटली के दाने” सेतु प्रकाशन)। साथ ही यह समझ भी देती है कि उम्मीद उस कोने से आयेगी जिस ओर हम नहीं देखते हैं। फिर अदनान कफ़ील दरवेश के शब्दों में: “और तब रखना भरोसा/ सिर्फ़ अपनी हकलाहट और लड़खड़ाहट पर/ क्योंकि सबसे कमज़ोर लगने वाले लोगों ने ही/ हमेशा बचाई है लौ/ एक बेहतर दुनिया के लिए”।
इसलिए आजकल मैं कविता पढ़ने लगा हूँ।
(योगेन्द्र यादव चुनाव विश्लेषक और राजनीतिक चिंतक हैं)
