मन के वन में अकेले…

अमेरिका में शराब की लत छोड़ने में जुटे लोग समूह में और निजी तौर पर भी पिछली सदी में लिखी गई इस प्रार्थना का पाठ करते हैं- ‘हे ईश्वर, मेरे मन को इतना सुकून दे कि उन चीजों को स्वीकार कर सकूं/ जिन्हें मैं बदल नहीं सकता/ जिन्हें बदल सकता हूं उन्हें बदलने का साहस दे/ और इन दोनों के बीच के फर्क को समझने का विवेक दे।’

नशे में जकड़े एक पियक्कड़ के लिए यह प्रार्थना कुछ ज्यादा ही कठिन जान पड़ती है। लेकिन क्या बदला जा सकता है और क्या नहीं बदला जा सकता, इसका फर्क समझते चलें तो खुद को माफ करना आप जरूर सीख जाएंगे। कई मनोरोगों से यह आपको बचा सकता है।

देर रात फोन की घंटी बजती है। पलकों से लेकर मन तक पहली नींद का बोझ धरा पड़ा है। मैं टाल जाता हूं। लेकिन एक-दो मिनट रुककर घंटी दूसरी बार बजती है। तब तक पत्नी हरकत में आ चुकी हैं। मैं घड़ी देखता हूं, जो 12.55 का समय दिखा रही है। पत्नी से कहता हूं, फोन मत उठाओ लेकिन वे उठा चुकी हैं।

दूसरी तरफ से कोई बता रहा है कि अमुक लड़की ने फेसबुक पर कुछ अजीब सा स्टेटस डाल रखा है और फोन भी नहीं उठा रही है। देर रात तक इधर से उधर फोन का सिलसिला चलता रहता है। फिर दो बजे जाकर इत्मीनान होता है कि चिंता की कोई बात नहीं है। परेशान थी लेकिन अभी ठीक है।

महीने भर पहले लड़की की नौकरी गई है। नई मिलने की जल्दी कोई उम्मीद नहीं। घर से पैसे मिल सकते हैं लेकिन यह विकल्प पीछे छूट चुका है। बहुत स्ट्रेस में है। स्ट्रेस, एंग्जायटी, डिप्रेशन। ये कुछ शब्द हमने पिछले पंद्रह-बीस वर्षों में सीख लिए हैं लेकिन अपने इर्द-गिर्द इन्हें सशरीर मंडराते देखने का मौका लॉकडाउन में ही मिल रहा है।

दिमागी मुश्किलें भारत में बड़े पैमाने पर सिर्फ कश्मीर घाटी में दर्ज की जाती रही हैं, लेकिन अभी देश के हर गली-मोहल्ले में ऐसे एक-दो परिवारों या व्यक्तियों के बारे में जानकारी मिल रही है, जो हफ्ते-हफ्ते अपने घर का दरवाजा ही नहीं खोलते। गुमसुम बैठे देर तक एकटक देखते रहते हैं। हरदम उदास रहते हैं और किसी से बात करते हैं तो घूम-फिरकर मौत का जिक्र जरूर ले आते हैं।

इनमें कुछ लोगों के साथ धंधा बैठ जाने, नौकरी चली जाने, करियर बिगड़ जाने या घर में किसी को नशे की लत लग जाने की समस्या जुड़ी है। लेकिन कुछेक ऐसे भी हैं जो परिवार के लिए खुद में एक बड़ी समस्या बन चुके हैं। कुछ साल बृहन्मुंबई महानगरपालिका की ओर से मानसिक समस्याओं पर काउंसिलिंग के लिए एमपावर नाम से एक हेल्पलाइन शुरू की गई।

सिर्फ दो महीने में वहां 45,000 कॉल्स आईं। इनमें 9,000 ऐसी थीं, जिन्हें कॉलर ने एक भी शब्द बोले बगैर काट दिया। ऐसा करने वाले कौन होंगे? शायद वे, जिन्हें पागल या सटकैल कह दिए जाने का डर सताता है। इस डर से पीछा छुड़ाने तक हम अपने बीच से न जाने कितने लोगों को खो चुके होंगे।

First Published on: July 19, 2026 9:44 AM
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