विपक्ष को नीचा दिखाने के लिए दुर्घटनाओं का उत्सवीकरण


क्या 1975 के आपातकाल के दौरान तत्कालीन संघ प्रमुख देवरस द्वारा आपातकाल के विरुद्ध हो रहे किसी भी आंदोलन से अपने संगठन के पृथक रहने के उनके निर्णय को संविधान की रक्षा से विचलन के रूप में देखा जाएगा ?


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मत-विमत Updated On :

कुछ लोग दुर्घटनाओं को भी उत्सवोचित वातावरण देने से नहीं शरमाते, बशर्ते उसमें विरोधी को नीचा दिखाने और राजनीतिक लाभ लेने की भरपूर संभावनाएं हों। इस तरह के व्यवहार के पीछे अपनी असफलताओं से लोगों का ध्यान भटकाने की भी एक वजह रहती है। कोरोनाकाल की त्रासदी के बीच जनता से ताली-थाली करवाने के मूर्खतापूर्ण प्रहसन के भी अपने संकेत रहे होंगे।

अभी “संविधान हत्या दिवस” मनाने की ताजा-ताजा घोषणा हुई है। कुछ वर्ष पहले लालकिले से “विभाजन विभीषिका दिवस” मनाने का भी एक प्रस्ताव दिया गया था, जो अमल में आया। बताइए आज हम विचारों के इस स्तर पर आ गए हैं, जहां दुखों को कुरेदने के लिए वार्षिक आयोजन किए जाएंगे। वोट की राजनीति के लिए हम किस हद तक गिर सकते हैं, ये घोषणाएं उसका प्रमाण हैं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति का दम भरने वाले क्या बताएंगे कि भारतीय संस्कृति में दुर्घटनाओं को याद कर, उनका उत्सवीकरण करने की इस तरह की संस्कृति पूर्व में कब रही? दुख यह है कि इस तरह की शक्तियां अपनी ताकत जनतंत्र से हासिल कर रहीं हैं। उन्माद वोट की शक्ल अख्तियार कर रहा है, यह चिंता की बात है।

वैसे तो ऐसे लोग हर दौर में पाए जाते हैं, पर इनकी संख्या कम होती है। लेकिन अब भारत बदल रहा है। भारत के संदर्भ में एक खास वैचारिक संगठन के द्वारा इसे नीति के रूप में अपना लिया गया है, जोकि दुर्भाग्यपूर्ण है। कई बार तो गलतबयानी करके मुद्दे को संगीन बनाया जाता है, तो कई बार आधे अधूरे तथ्यों से चरित्र हनन किया जाता है। वे बस मौका तलाशते हैं। भारत विभाजन उनके लिए अवसर बन गया है। मौका-बेमौका गांधी नेहरू को विभाजन का असली गुनहगार बताया जाता है। गांधी, नेहरू और भारत की विराट सामूहिक चेतना के विरुद्ध खुद विभाजन की पैरवी करने वाले संगठन का हिस्सा होने के बाद कोई कैसे इतनी बेशर्मी से झूठ बोल सकता है कि गांधी ने बंटवारा हो कैसे जाने दिया?

हिंदूवादी संगठनों की द्विराष्ट्रवाद नीति को जब भारत के एक बड़े जनसमुदाय द्वारा स्वीकृति नहीं मिली, उल्टे वे तत्कालीन राजनीति की मुख्यधारा और राजनीतिक- सामाजिक परिदृश्य बाहर धकेल दिए गए, तो उन्होंने शातिराना तरीके से से बंटवारे का सारा दोष गांधी पर मढ़ दिया। वे बंटवारे के लिए गांधी को इस आधार पर दोषी ठहराते हैं कि उन्होंने जब यह कहा था कि बंटवारा मेरी लाश पर होगा, तो जिंदा रहते उन्होंने बंटवारा स्वीकार क्यों कर लिया! कुलमिलाकर कहने का मतलब यह कि गांधी जिंदा क्यों रह गए? इल्जाम ऐसे लगा रहे जैसे खुद इनके संगठन बंटवारा रोकने के लिए कोई सत्याग्रह या आंदोलन कर रहे थे। अरे भाई आप तो खुद ही धर्म के आधार पर बंटवारा मांग रहे थे, फिर यह सब ड्रामा क्यों?

मुस्लिम लीग और हिंदूमहासभा दोनों ही धर्म के आधार पर बंटवारे की समर्थक थीं। हिंदू महासभा ने 1937 में ही अहमदाबाद के अधिवेशन में सावरकर के नेतृव में द्विराष्ट्रवाद का संकल्प पारित कर चुकी थी। कहने की जरूरत नहीं, बंटवारा तो ये खुद ही चाहते थे, बस उन्हें तो गांधी के जिंदा रहने से दिक्कत थी। जो लोग मृत्यु की कामना में जीते हैं, उन्हें किसी के जिंदा रहने की खुशी क्यों कर होने लगी? ऐसे विचार रखने वालों का कोई सिद्धांत नहीं होता। ये सत्ता पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। फर्जी नरेटिव गढ़ सकते हैं, गलत आक्षेप लगाकर किसी को भी बदनाम कर सकते हैं। सत्ता के लिए मुस्लिम लीग के साथ गलबहियां करने में भी इन्हें कोई गुरेज नहीं।

स्वतंत्रता पूर्व बंगाल और सिंध में मुस्लिम लीग के साथ खुलकर सत्ता के मजे लूटे। सिंध की सरकार में इनके शामिल रहते “पाकिस्तान प्रस्ताव” पास हुआ, पर बात ऐसे करेंगे कि जैसे राष्ट्र की एकता के लिए कोई बड़ा आंदोलन किए हों। ये लोग नेहरू की जेलों को ऐशगाह बताते हैं, लेकिन नेहरू के साथ ही जेल काट रहे पटेल के जेल-जीवन पर कुछ न बोलेंगे। ये विवेकानंद की फोटो तो लगाएंगे, लेकिन उनके हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के विचार को भूले से भी जिक्र नहीं करते। घोर सांप्रदायिक होते हुए भी फोटो भगतसिंह की लगाएंगे। भगतसिंह की फोटो सिर्फ इसलिए ताकि उन्हें नेहरू के समानांतर खड़ा कर उन्हें खारिज कर सकें।

यह अलग बात है कि भगतसिंह कीर्ति में लिखे आने लेख में युवाओं को नेहरू के पीछे खड़े होने को कहते हैं। इस धारा के अनुयायी वर्ग को पढ़ने लिखने से हमेशा बैर रहा है इसलिए, उसे सिर्फ निर्देशों के अनुपालन की भाषा ही आती है। वह वही करता है जो उसे ऊपर से निर्देश मिलता है। आजकल उसे ऊपर के संदेशों को फॉरवर्ड करने का काम मिला है, सो उसे ही तल्लीनता से करता है। उसे सिर्फ अपने मठ को आगे बढ़ाना है, उसका प्रचार-प्रसार करना है, उसे तथ्यों से क्या लेना-देना।

इसे अपने दल को आगे बढ़ाना है, लेकिन अपने दम पर नहीं, बल्कि दूसरे का चरित्रहनन करके क्योंकि यह आसान रास्ता है। उदाहरण के तौर पर यह विचार संप्रदाय गांधी को मुस्लिमों का हितैषी, लेकिन हिंदुओं के दुश्मन के रूप में चित्रित करता है। जबकि गांधी तो इंसानियत के पुजारी थे। वे हर पीड़ित के साथ खड़े होते थे, फिर चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान। बंगाल के नोआखली में तो वह हिंदुओं को ही बचाने निकले थे। इसी तरह ये वर्ग गांधी को बदनाम करने के लिए यह भी कहता है कि गांधी ने पाकिस्तान को जिद करके 55 करोड़ रुपए दिलवा दिए।

यह बात संघ और भाजपा के लोग ऐसे कहते हैं, जैसे वह पैसा भारत का हो और गांधी ने उसे दिलवाकर भारत को आर्थिक रुप से कमजोर कर दिया हो, जबकि वास्तविकता यह थी कि यह राशि बंटवारे के तहत पाकिस्तान को मिलनी तय हुई थी। यह पाकिस्तान का ही पैसा था। गोडसे द्वारा खुद को हिंदुओं की संरक्षा के लिए भावुक हिंदूवादी के रूप में खड़ा करने के तर्क दिए गए जो कि पूरी तरह झूठ है। अगर यही बात होती तो गांधी को मारने का पहला प्रयास 1932 के आसपास न हुआ होता। तब तो ये सब कारण भी नहीं थे।

कहने का मतलब भारत की राजनीति में लंबे समय से झूठ को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्थापित करने की कोशिश की जाती रही है। तदर्थवादी प्रवृत्ति और इतिहास को न पढ़ने के चलते समय रहते झूठों का प्रतिवाद न किया गया, जिसकी वजह से बहुतों ने झूठ को सच मान लिया गया। गांधी और नेहरू का चरित्र हनन इसी सुचिंतित नीति का परिणाम है।

खुद द्विराष्ट्रवाद की संकल्पना के तहत अलग राष्ट्र का प्रस्ताव पास करेंगे, लेकिन दोषी फिर भी गांधी और नेहरू। यह अलग बात है कि तत्कालीन त्रासद परिस्थतियों से हिंदुस्तान को बचाने के लिए विभाजन को सबसे पहले स्वीकार करने वाले कांग्रेसी सरदार पटेल पर भाजपाई कुछ नहीं कहते। कहें भी कैसे उनको तो उन्हें नेहरू के सामने प्रतिद्वंदी के रूप में खड़ा जो करना है। गांधी हत्या के बाद पटेल द्वारा संघ पर लगाए गए प्रतिबंध का वे भूले से भी जिक्र नहीं करते। करें भी कैसे किसी को तो अपने पाले में रखना है। भगतसिंह की फोटो तो इनके यहां खूब मिलेगी, लेकिन उनके विचार नहीं। ये कौन नहीं जानता कि धर्म को लेकर भगतसिंह की विचारधारा नेहरू से कहीं अधिक क्रांतिकारी थी। यह विशुद्ध अवसरवाद है, जो सिद्धांतों को चित्रों के पीछे छुपा देता है।

आज इस तरह के दिवसों यथा संविधान हत्या दिवस को मनाने के पीछे यही अवसरवाद है। जिस आपातकाल पर स्वयं इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, राहुल और अन्य कांग्रेसी नेता खेद प्रकट कर चुके हों और जिसे लगे लगभग 49 साल हो गए हों, उसे याद दिलाने का औचित्य समझा जा सकता है। निश्चित तौर पर आपातकाल के रूप में लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या हुई थी। कोई इसे सही नहीं ठहराता, सभी इसकी भर्त्सना करते हैं। आपातकाल की सजा इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल किए जाने के रूप में चुकानी भी पड़ी।

इस तरह आपातकाल के चलते अगर जनता ने इंदिरा को बाहर का रास्ता दिखाया, तो उनकी माफी को पश्चाताप समझ, जनता ने उनको गले भी लगाया। अगर अतीत को इस तरह याद करने की परंपरा डाली जाएगी तो क्या भाजपा उन नेताओं को अपना आदर्श मानने के लिए देश से माफी मांगेगी, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान नहीं दिया? क्या भाजपा स्वतंत्रता पूर्व हिंदू महासभा द्वारा मुस्लिम लीग के साथ किए गए गठबंधन को “अपवित्र गठबंधन दिवस” के रूप में मनाएगी? क्या सिंध की मुस्लिम लीग सरकार द्वारा, जिसमें कि हिंदू महासभा भी शामिल थी, पास किए गए “पाकिस्तान प्रस्ताव” के संदर्भ में तत्कालीन नेताओं को विभाजन का जिम्मेदार मानते हुए उनकी भर्त्सना की जाएगी?

क्या 1975 के आपातकाल के दौरान तत्कालीन संघ प्रमुख देवरस द्वारा आपातकाल के विरुद्ध हो रहे किसी भी आंदोलन से अपने संगठन के पृथक रहने के उनके निर्णय को संविधान की रक्षा से विचलन के रूप में देखा जाएगा ? चलिए उन सबको छोड़िए अभी गत वर्ष विपक्ष के 146 सांसदों के निलंबन को किस हत्या दिवस के रूप में मनाया जाएगा, कोई बताएगा ? अगर आपातकाल को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाया जाएगा तो ये सवाल भी जेरे बहस जरूर रहेंगे। आप इनसे बच नहीं सकेंगे।

(संजीव शुक्ल लेखक एवं टिप्पणीकार हैं)