लड़ाइयों से मंद पड़ रही है पर्यावरण सुधरने की उम्मीद


यूक्रेन और फिलस्तीन में शुरू हुई लड़ाइयां खिंचती ही जा रही हैं। इससे सिर्फ इतना पता चल रहा है कि लड़ाई की स्थितियां न बनने देने या चलती लड़ाई को समय से ठंडा कर देने में अंतरराष्ट्रीय मंचों की अब कोई भूमिका नहीं रह गई है।


चंद्रभूषण
मत-विमत Updated On :

दुनिया के नीतिगत दायरों में पर्यावरण को लेकर महीन बातें करने वालों की बहुतायत नजर आने लगी है, लेकिन अभी यह मामला कमोबेश ‘विश्व शांति’ जैसा ही हो चला है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सबको पता होता है कि अगला झूठ बोल रहा है, फिर भी हर कोई गंभीरता से हर किसी को सुन लेता है। सचाई यह है कि दुनिया की प्राथमिकताओं में पर्यावरण और शांति के अलावा सार्वभौम शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दे भी कोरोना के बाद से पीछे ही गए हैं। आने वाले दिनों में इनके वापस ग्लोबल एजेंडा पर आने के कोई आसार नहीं हैं।

यूक्रेन और फिलस्तीन में शुरू हुई लड़ाइयां खिंचती ही जा रही हैं। इससे सिर्फ इतना पता चल रहा है कि लड़ाई की स्थितियां न बनने देने या चलती लड़ाई को समय से ठंडा कर देने में अंतरराष्ट्रीय मंचों की अब कोई भूमिका नहीं रह गई है। ऐसे में अपनी क्षमता भर लड़ाई के लिए तैयार रहना ही सबकी पहली जरूरत बन गया है। सबसे बड़ी बात यह कि यह तैयारी टेक्नॉलजी के स्तर पर बहुत बड़े बदलाव की मांग कर रही है, जिससे खर्चे की दिशा बदल गई है।

ऐसे में तमाम राष्ट्राध्यक्ष यह याद भी नहीं करना चाहते कि 2015 के ऐतिहासिक पैरिस पर्यावरण समझौते में उन्होंने उस समय की तुलना में सन 2030 तक दुनिया का कार्बन उत्सर्जन आधे पर ला देने के प्रस्ताव पर दस्तखत किए थे।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से दुनिया में शक्ति और सुरक्षा का एक ढांचा बना हुआ था।

सबसे ऊपर पांच परमाणु शक्ति संपन्न देश थे, जिनमें सर्वनाश (म्यूचुअली अश्योर्ड डिस्ट्रक्शन) के डर से आपस की लड़ाई का खतरा बहुत कम था। उनके नीचे उभरती महत्वाकांक्षा वाले देश पारंपरिक हथियारों- खासकर ऊपर के पांच देशों से खरीदे गए युद्धक विमानों और टैंकों के बल पर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करते थे और वक्त-जरूरत अगल-बगल थोड़ा दबदबा भी जमा लेते थे। सीढ़ी के सबसे निचले पायदान पर मौजूद देशों को किसी न किसी की क्षत्रछाया में रहना पड़ता था और इसमें कोई चूक होने पर पड़ोस की लड़ाइयों से लेकर गृहयुद्धों तक का शिकार होना उनकी नियति बन जाती थी।

इस स्थिति में इधर तीखा बदलाव आया है। वीटो पावर वाले मुल्कों में लगभग बराबर शक्ति वाले तीन और दो के खेमे लगातार एक-दूसरे से युद्ध की मुद्रा में दिख रहे हैं और म्यूचुअली अश्योर्ड डिस्ट्रक्शन (मैड) को अब कोरी धमकी समझा जाने लगा है। यूक्रेन में रूस के खिलाफ अमेरिका और यूरोप के लगभग सारे ही गैर-परमाणु हथियार मोर्चे पर लगे हैं और उनके इस्तेमाल पर लगाई गई रोकें भी धीरे-धीरे करके हटा ली गई हैं। और तो और, रूस का एक छोटा सा हिस्सा बाकायदा यूक्रेन के कब्जे में है, जिसकी हाल तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

माहौल कुछ ऐसा बन गया है जैसे सर्वनाश के पहले एक महाविनाश के लिए भी पर्याप्त गुंजाइश है, जिसके जरिये उच्चताक्रम का फैसला हो सकता है। इस चढ़ाचढ़ी में ही रूस ने हाल में ध्वनि की दस गुनी रफ्तार वाली ओरेश्निक नाम की एक अचूक और अभेद्य मल्टी-टारगेट मिसाइल यूक्रेन पर दागने का दावा किया है और बड़े पैमाने पर इसका प्रॉडक्शन शुरू करने की बात भी कही है। यूक्रेन की लड़ाई में दूसरी अहम बात यह हुई है कि बैटलटैंक और लड़ाकू युद्धपोत एक झटके में बीते जमाने की चीज बन गए हैं।

इस लड़ाई में सबसे बड़ी भूमिका तरह-तरह के ड्रोन्स की नजर आ रही है, जिनसे जुड़ी रिसर्च को लेकर दुनिया में एक लहर सी आई हुई है। तीसरी बड़ी बात सैटेलाइट कम्युनिकेशन से जुड़ी है, जिसने रूस-यूक्रेन युद्ध में निर्णायक भूमिका बीच में स्पेस-एक्स के मालिक, अमेरिकी उद्यमी इलॉन मस्क के हाथों में सौंप दी थी।

जाहिर है, तथाकथित ‘विश्व व्यवस्था’ का शीराजा बिखर चुका है। एटमी हथियारों का हौआ खत्म हो चुका है। हर देश को अपनी सुरक्षा का इंतजाम खुद ही करना है और सुरक्षा की तैयारी भी रणभूमि की नई धारणा के मुताबिक सैटेलाइटों, ड्रोनों और नॉन-कंप्रोमाइजेबल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को हिसाब में लेते हुए करनी है।

विश्वयुद्ध के डर को थोड़ी देर के लिए किनारे रख दें तो भी इस बदलाव के चलते कम से कम अगले दस सालों में दुनिया का सुरक्षा खर्चा तेजी से बढ़ने वाला है। गरीब मुल्कों को इस काम के लिए अपने स्वास्थ्य और शिक्षा बजट में कटौती करनी होगी और पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर जो भी थोड़ा-बहुत वे अभी कर पा रहे थे, उसमें भी कतरब्योंत के बहुत सारे रास्ते खोजने होंगे। इस सब से ऊपर, अगले कम से कम चार साल दुनिया को अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप की प्रेसिडेंसी झेलनी है, जिनके लिए पर्यावरण कभी कोई चिंता का विषय ही नहीं रहा।

इस साल नवंबर में अजरबैजान की राजधानी बाकू में हुआ ग्लोबल पर्यावरण सम्मेलन कॉप-29 दो बड़े फैसलों के साथ संपन्न हुआ। एक यह कि सन 2035 तक दुनिया के विकसित देश कमजोर और विकासशील देशों के लिए पर्यावरण संरक्षण के मद में 300 अरब डॉलर की वार्षिक सहायता की व्यवस्था करेंगे। दूसरी यह कि सख्त वैज्ञानिक मानकों के साथ एक ग्लोबल कार्बन क्रेडिट बाजार खड़ा किया जाएगा।

यानी किसी कंपनी को अगर ज्यादा कार्बन उत्सर्जित करना पड़ा तो धरती के लिए इसकी भरपाई वह खुद या किसी और तरीके से कार्बन अवशोषण के जरिये कर सकेगी। इसी हिसाब से तय होने वाली उसकी क्रेडिट रेटिंग बाजार में कई तरीकों से उसके काम आएगी।

लेकिन यह सारा इंतजाम तो तब होगा जब ग्लोबल वॉर्मिंग और जैव विविधता तथा पर्यावरण से जुड़े बाकी खतरों को लेकर दुनिया में गंभीरता का स्तर आगे भी ऐसा ही बना रहेगा। डॉनल्ड ट्रंप ने अपनी पिछली प्रेसिडेंसी में अमेरिका को एकतरफा तौर पर पेरिस पर्यावरण समझौते से बाहर निकाल लिया था। इस बार तो उनके पास इससे भी आगे जाने के कुछ ठोस तर्क मौजूद हैं। अभी हालत यह है कि अमेरिका के सरकारी कर्जे कई बार बढ़ाई गई कर्ज सीमा को पार कर रहे हैं।

20 जनवरी 2025 को ट्रंप के पदभार ग्रहण करने से पहले ही वहां के सरकारी कर्मचारियों की पगार रुक जाने का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में ग्लोबल पर्यावरण समझौतों को लागू करने के लिए पूंजी की व्यवस्था करना या अमेरिकी कंपनियों पर छोटी-मोटी रोक लगाना कभी भी ट्रंप का फ्यूज उड़ा देने के लिए काफी है।

इस संकट को एक तरफ रखकर ग्लोबल वॉर्मिंग के हालात पर नजर डालें तो जुलाई 2024 के ठीक पहले गुजरे 14 महीने दुनिया के ज्ञात टेंपरेचर रिकॉर्ड्स के पैमाने पर अभी तक के सबसे गर्म महीने रहे। 2023 ज्ञात इतिहास का सबसे गर्म साल था और 2024 उसका भी रिकॉर्ड तोड़ सकता है। धरती के वातावरण में कार्बन डायॉक्साइड और मीथेन के हिस्सों का बिल्कुल सटीक पता लगाने का जुगाड़ नासा के पास मौजूद है। इसी से पता चला कि ग्राफ में इनको दर्शाने वाली रेखा कोरोना महामारी के दो वर्षों में भी रत्ती भर नीचे नहीं आई।

2019 के अंत में वातावरण के प्रति दस लाख कणों में कार्बन डायॉक्साइड के 414 कण मौजूद थे। 2022 की शुरुआत में यह अनुपात 417 कणों का पाया गया, जबकि 2024 में इसे 422 से थोड़ा ज्यादा ही दर्ज किया गया है। चीजों की सड़न से बनने वाली मीथेन गैस ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए कार्बन डायॉक्साइड की तुलना में 28 गुना खतरनाक है। वातावरण में इस गैस का अनुपात प्रति अरब कणों में नापा जाता है, और इसका ग्राफ भी लगातार चढ़ रहा है।

यह कितनी निकल सकती है, इसका भी कोई अंदाजा नहीं है क्योंकि दुनिया के पर्माफ्रॉस्ट इलाके- ध्रुवीय और हमेशा जमे रहने वाले पहाड़ों-पठारों में युगों से बर्फ के नीचे दबे क्षेत्र- अगर बर्फ गलने के साथ एकदम नंगे हो गए तो वे बहुत सारी मीथेन उगल देंगे। रूस और अन्य देशों के आर्कटिक-टुंड्रा क्षेत्र का काफी हिस्सा पहले ही नंगा हो चुका है और वहां गर्मियों में ऐसे इलाके अपने आप सुलग जा रहे हैं।

थोड़ी कमी साल दर साल पर्यावरण में डाली जा रही नई कार्बन डायॉक्साइड की मात्रा में जरूर आई है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। 2019 में इंसानी गतिविधियों से 43.1 अरब टन कार्बन डायॉक्साइड वातावरण में छोड़ी गई थी। 2024 में यह मात्रा सन 2023 से ज्यादा है, फिर भी इसके 41.6 अरब टन ही होने का अनुमान है। फिर भी, जैसा ऊपर कहा जा चुका है, वायुमंडल में प्रति दस लाख कार्बन डायोक्साइडी अणुओं की संख्या अभी बढ़ती ही जा रही है। यानी यह कमी धरती की बीमारी के इलाज की जरूरत को देखते हुए काफी कम है।

(चंद्रभूषण वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)