नई दिल्ली। कुछ किताबों के बारे में ऐसी राय बन जाती है कि संबंधित विषय पर इससे आगे लिखा ही नहीं जा सकता। नाजी जर्मनी के इतिहास को लेकर लिखी गई लगभग डेढ़ हजार पृष्ठों वाली विलियम एल. शीरर की किताब ‘राइज एंड फॉल ऑफ द थर्ड राइख’ ने पढ़ते वक्त मेरे छक्के छुड़ा दिए थे, लेकिन कम से कम इस खास मामले में इस किताब ने मेरी अंतिम राय भी बना दी थी। इसको पढ़ने के कुछ ही समय बाद इसी राय के तहत एक सौम्य जर्मन राजनयिक के प्रति बरती गई अपनी उद्दंडता की याद करके मैं आज भी बुरी तरह झेंप जाता हूं।
विलियम एल. शीरर की किताब में शुरू से ही एक थीसिस खड़ी की गई है कि एक किस्म की वैचारिक तानाशाही, किसी एक खास विचार के जरिये दुनिया की हर चीज की व्याख्या गढ़ने की सोच जर्मनी की बुनियाद में ही निहित है। इसके लिए लेखक ने हीगल, कांट, मार्क्स और नीत्शे तक का हवाला दिया था और इसे खींचकर हिटलर तक लेते आए थे। जर्मन दूतावास के लेबर अटैची से बातचीत में मैंने शीरर के मार्फत अपने अंदर आई इसी धारणा के तहत नाजी जर्मनी और हिंदुत्व की तरफ दौड़ लगाते भारत की एकरूपता पर बात की थी, जिसका तब यानी 1990 में कोई औचित्य नहीं था।
बेचारा डिप्लोमैट बार-बार भारत और जर्मनी, दोनों ही देशों में मौजूद लोकतांत्रिक परंपराओं पर बात कर रहा था, पर मैं उसे खदेड़-खदेड़ कर दोनों ही जगह जनविरोधी विचारों के प्रति मौजूद सहज झुकाव की तरफ लेता जा रहा था। इस घटना को तीन दशक से भी ज्यादा वक्त गुजर चुका है, लेकिन आज भी मैं खुद को इसके लिए माफ नहीं कर पाता। यह एक कठोर सचाई है कि किसी समाज को आप एक या दो-चार-दस किताबें पढ़कर कभी नहीं जान सकते। इंसानों की कोई भी आबादी ऐसी नहीं, जहां एक साथ कई परंपराएं न मौजूद हों और वक्त बदलने के साथ इनमें अदला-बदली न होती हो।
बहरहाल, मुझे यह जानकर खुशी हुई कि हाल में ‘राइज एंड फॉल आफ द थर्ड राइख’ के ही कद की लेकिन नाजी जर्मनी को लेकर उससे पतली, सस्ती और बाद में उद्घाटित महत्वपूर्ण तथ्यों को आधार बनाकर लिखी हुई एक और किताब बाजार में आई है, जिसमें हिटलर के उभार के दौर में जर्मनी की अन्य वैचारिक-राजनीतिक धाराओं, आंदोलनों और घटनाओं को अलग परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश की गई है।
टॉमस चाइल्डर्स ने अपनी किताब ‘द थर्ड राइख : अ हिस्ट्री ऑफ नाजी जर्मनी’ में शीरर की इस धारणा का भी खंडन किया है कि हिटलर अपने उभार से लेकर अंत तक जर्मन जनता में खूब लोकप्रिय था और वहां उसके विरोध की जैसी-तैसी शुरुआत उसका अंत निकट जानकर ही हो पाई थी। ज्यादा ब्यौरे में जाने की जगह यहां नहीं है लेकिन चाइल्डर्स ने उन स्थितियों पर पूरा प्रकाश डाला है, जिन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी की उदार राजनीतिक धाराओं को देखते-देखते अप्रासंगिक बना दिया था।
हिटलर की पिद्दी सी पार्टी ने शुरू में वहां सत्ता पर कब्जा करने की गैर-संसदीय कोशिश की थी, लेकिन इसमें बुरी तरह मुंह की खाने के बाद उसने अतिवादी बयानों और यहूदियों पर छिटपुट हमलों के जरिये अपना एक बड़ा चुनावी ढांचा तैयार किया। 1932 के आम चुनाव में भी उसे बहुमत नहीं मिला लेकिन जर्मन संसद की सबसे बड़ी पार्टी वह जरूर बन गई।
इस मोड़ पर आकर नाजी पार्टी में नरमी और टूट-फूट के लक्षण दिखे, जिसे आधार बनाते हुए राष्ट्रपति हिंडेनबर्ग और अन्य दक्षिणपंथी नेताओं को लगा कि यही मौका है, जब हिटलर को सत्ता में लाकर उसे अपने दड़बे की मुर्गी बनाया जा सकता है। यह गलती उनके लिए बहुत भारी पड़ी। जनवरी 1933 से जुलाई 1933 के बीच के छह महीनों में हिटलर ने कानून बदलकर देश की सभी उदारवादी राजनीतिक धाराओं के ज्यादातर नेताओं और कार्यकर्ताओं को ‘राष्ट्रद्रोही’ की श्रेणी में ला दिया और उन्हें खुली जेलों में बंद करके इतनी यातनाएं दीं कि वे नाजी विरोध का जिक्र भी करना भूल जाएं।
जाहिर है, संसदीय विपक्ष की तरफ से संभावित ऊपरी प्रतिरोध समाप्त होते ही इस खौफ का संचरण राजनीति से निकलकर बड़ी तेजी से पूरे समाज में हुआ और जुलाई 1933 के बाद से जर्मनी उसी तरह का समाज बनता गया, जिसे विश्व इतिहास में नाजी जर्मनी के तौर पर जाना जाता है। प्रतिरोध इसके बाद भी होता रहा। कुछेक ने तो इसमें जान की बाजी लगा दी, लेकिन लोग इसे साजिश या सनक भर मानने लगे।
आज जब भारत समेत पूरी दुनिया में जाति, धर्म और नस्ल जैसी पहचानों पर आधारित दक्षिणपंथी, प्रतिक्रियावादी विचारधाराओं का प्रभाव बढ़ रहा है और इन्हें मानने वाले राजनेता सत्ता संभालने के अलावा अपने समाज की वैचारिक केमिस्ट्री बदलने में भी जी-जान से जुटे हुए हैं, तब नाजी जर्मनी के उदय, विकास और अंत का, खासकर बदलाव के दौर में उसके संसदीय विपक्ष के व्यवहार का नई नजर से अध्ययन दुनिया को कुछ बड़े खतरों से बचा सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)









