जीने के लिए पढ़ना

कुछ गिने-चुने लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके पास पढ़ने-गुनने को कोई अनसुलझा सवाल होता है।

कोई सूचना के लिए पढ़ता है, कोई ज्ञान-विज्ञान या मनोरंजन के लिए। कुछ गिने-चुने लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके पास पढ़ने-गुनने को कोई अनसुलझा सवाल होता है। लेकिन क्या पढ़ना चाहिए क्या नहीं, यह तय करने की सुविधा सबको कहां हासिल होती है? अपनी मर्जी का तो आप तब पढ़ेंगे जब पढ़ने को बहुत सारी चीजें आपके पास हों। मेरे गांव में ऐसा कुछ नहीं था। और तो और, सूचना को लेकर कोई बेचैनी भी नहीं थी। जिन घरों में रेडियो था वहां खबरें फिल्मी गानों के फिलर की तरह सुनी जाती थीं। अखबार विलासिता की चीज समझे जाते थे। बस में वक्त काटने के लिए किसी ने खरीद लिया तो नोबेल प्राइज की तरह दिखाता घूमता था।

ऐसे में पढ़ाई का मकसद इम्तहान पास करना ही हो सकता था। फिर भी कुछ लोग थे जो पता नहीं कैसे अपराध कथाएं और उपन्यास पढ़ते थे और पूरे गांव में बर्बाद समझे जाते थे। यही लोग मेरे आदर्श पुरुष थे। इनकी चापलूसी से भी मुझे गुरेज न था। एक लड़का आठ-नौ साल की उम्र से ही लुगदी साहित्य के पीछे क्यों भागता था, इस उलझन को मैं आज भी पूरी तरह सुलझा नहीं पाया हूं। शायद इसलिए कि उनकी रफ्तार मुझे खींचती थी। इसलिए भी कि मेरा मन गांव में टिकता नहीं था। परिवार के साथ शहर से मेरी वापसी कुल पांच साल की उम्र में हो गई थी। इतनी छोटी सी उम्र भी इस एहसास के लिए काफी होती है कि रोशनी वाली अपनी जगह से उखाड़ कर आप अंधेरे में फेंके जा चुके हैं।

पल्प फिक्शन, उसमें भी जासूसी उपन्यास इस बेबसी से आपको आजाद करते हैं। जरा देर के लिए आपको स्थितियों का स्वामी बनाते हैं, मन के स्तर पर थोड़ी ताकत बख्शते हैं। अभी कोई तीन-चार साल पहले मैंने भैया से पूछा कि क्या किसी ने मुझे पढ़ना सिखाया था। लिखना सीखने का तो ध्यान है। वह मां ने सिखाया था जो खुद कभी स्कूल नहीं गई। एक जंगल में एक हिरन रहता था, यह वाक्य भी याद है। किसी को पहली बार लिखना सिखाने के लिए बिल्कुल बेकार वाक्य। लेकिन पढ़ने को लेकर हाल-हाल तक मुझे यकीन था कि इसे मैंने खुद ही सीखा था। इसकी प्रक्रिया भी मन पर छपी हुई है। धमकी और धमाके को मैं अलग-अलग पहचान लेता था- ध, म, क जैसे अक्षर और मात्राएं जानने से पहले ही।

शहर वाले घर में भाई-बहनों का बाल पत्रिकाएं और कॉमिक्स चाटना मेरी शुरुआती स्कूलिंग बना। मुझे लगता था, पढ़ना मैंने उन्हीं को देखकर सीखा होगा। लेकिन भैया ने बताया कि अक्षरों और मात्राओं की पहचान मुझको उन्होंने कराई थी। अलबत्ता शब्द पहचानना मैं जल्दी सीख गया था। इस मोर्चे पर मेरे लिए अलग से कोई मेहनत भैया को नहीं करनी पड़ी थी। खैर, जैसे भी सीखा हो, पढ़ना सीख लेना हर लिहाज से बहुत काम की चीज साबित हुआ। साइकिल चलाने और तैरने के बारे में कहा जाता है कि एक बार आपने सीख लिया तो फिर कभी भूल नहीं सकते। पढ़ना इन दोनों से एक कदम आगे की चीज है। यह आपको कभी कुछ भी भूलने नहीं देता।

First Published on: October 15, 2021 4:34 PM
Exit mobile version