अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी के लिए साल 2020 परेशानी भरा ही रहा। पार्टी अभी सोनिया गाँधी के अत्यंत करीबी समझे जाने वाले पार्टी के नेता अहमद पटेल के निधन से उबर भी नहीं पाई थी कि पार्टी के दूसरे बड़े और सुलझे हुए नेता 93 वर्षीय मोतीलाल बोरा के निधन ने पार्टी के नेताओं को एक गहरा सदमा और झटका दे दिया।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और पूर्व पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी के साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री और पार्टी के अध्यक्ष रह चुके स्वर्गीय पीवी नरसिंह राव के विश्वासपात्र रहे पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष, उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्र के पूर्व मंत्री मोतीलाल बोरा ने 21 दिसंबर, 2020 को दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में आखिरी सांस ली। अजीब संयोग है कि एक दिन पहले ही, यानी 20 दिसंबर को उनका जन्म दिन था।
कांग्रेस के लिए वैसे तो साल 2014 से समय खराब चल रहा है लेकिन 2019 और 2020 के इन दो साल में उसे कुछ ज्यादा ही दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। लोकसभा और राज्य विधान सभाओं के चुनाव में एक के बाद एक मिलती रही हार के साथ ही पार्टी के अनेक अच्छे और बड़े नेताओं के निधन से भी उसकी परेशानियों में इजाफा हुआ है।
हाल ही के महीनों में पाहले अहमद पटेल के निधन से और अब मोतीलाल बोरा के निधन से हुए नुक्सान की भरपाई होना वास्तव में एक मुस्किल भरा काम है। दो बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे मोतीलाल बोरा 2000 से 2018 तक (18 साल) पार्टी के कोषाध्यक्ष भी रहे थे। इसके अलावा बोरा एक बार लम्बे समय के लिए देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और केंद्र की सरकार में काबीना मंत्री भी रहे थे।
2018 में उम्र के दबाब के चलते उनको पार्टी के कोषाध्यक्ष पद से मुक्त कर दिया गया था। मोतीलाल बोरा देश के एक ऐसे राज्यपाल भी रहे जिनको लम्बे अरसे तक राष्ट्रपति शासन की आवधि में यह जिम्मेदारी संभालनी पडी थी। मतलब यह कि कि लंबे अरसे तक वो देश के उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण समझे जाने वाले सूबे के सर्वे-सर्वा रहे थे। उनके बारे में यह कहा जाता है कि एक राज्यपाल के रूप में उन्होंने राज्य के अभिभावक की हैसियत से काम किया था।
मोतीलाल बोरा का राजनीतिक कैरियर नगरपालिका सदस्य से शुरू होकर राज्य के मंत्री, मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, राज्यपाल और पार्टी के कोषाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पद तक पहुंचा था। उनके राजनेतिक करियर की शुरुआत सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में 1968 में अविभाजित मध्य प्रदेश की दुर्ग नगर पालिका के सदस्य का चुनाव जीतने के रूप में हुई थी।
इसके दो साल बाद 1970 में कांग्रेस में शामिल हुए। 1972 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने। इसके बाद 1977 और 1980 में भी विधायक चुने गए। अर्जुन सिंह की कैबिनेट में पहले उच्च शिक्षा विभाग में राज्य मंत्री रहे। 1983 में कैबिनेट मंत्री बनाए गए। 1981-84 के दौरान वे मध्यप्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के चेयरमैन भी रहे।
13 फरवरी 1985 में वोरा को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। 13 फरवरी 1988 को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर 14 फरवरी 1988 में केंद्र के स्वास्थ्य-परिवार कल्याण और नागरिक उड्डयन मंत्रालय का कार्यभार संभाला। अप्रैल 1988 में वोरा मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए। 26 मई 1993 से 3 मई 1996 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी रहे।
मोती लाल बोरा ने राजनीति तो मध्य प्रदेश से शुरू की थी लेकिन उनका जन्म 20 दिसम्बर 1929 को राजस्थान के नागौर (तत्कालीन जोधपुर रियासत) में हुआ था। उनके पिता का नाम मोहनलाल वोरा और मां का नाम अंबा बाई था। उनका विवाह शांति देवी वोरा से हुआ था। उनके चार बेटियां और दो बेटे हैं। बेटा अरुण वोरा दुर्ग से विधायक हैं।
उनके मुख्यमंत्री बनाने की कहानी भी बहुत दिलचस्प है। मोतीलाल बोरा अर्जुन सिंह की कैबिनेट में मंत्री तो पहले ही बन चुके थे और 1985 के विधान सभा चुनाव के बाद अर्जुन सिंह दोबारा मुख्यमंत्री बनाए गए तो उनकी कैबिनेट के एक मंत्री मोतीलाल बोरा ही थे।
अर्जुन सिंह ने तब मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली थी लेकिन तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री राजीव गाँधी उनको एक विशेष मुहीम के तहत पंजाब का राज्यपाल बना कर भेजना चाहते थे और यह भी चाहते थे कि अर्जुन सिंह ही अपनी पसंद का मुख्यमंत्री और प्रदेश पार्टी अध्यक्ष भी खोज लें।
अर्जुन सिंह ने तब बहुत सोच विचार के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए मोतीलाल बोरा का नाम सुझाया था। इस तरह बोरा अर्जुन सिंह की पसंद के रूप में मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री बन गए। अर्जुन सिंह की पसंद और उनकी सिफारिश पर मुख्यमंत्री बनने का एक नुक्सान बोरा को इस रूप में भी उठाना पड़ा कि वो अपने पूरे कार्यकाल में अपनी पसंद के किसी व्यक्ति को मंत्री नहीं बना सके।
कहना गलत नहीं होगा कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में मोती लाल बोरा ने पूरे पांच साल अर्जुन सिंह की खडाऊं सरकार चलाते रहे। इस सम्बन्ध में एक सच्ची कहानी राजनीतिक हलकों में काफी चर्चित भी रही।
गौरतलब है कि 9 मार्च, 1985 को अर्जुन सिंह ने अपने नेतृत्व में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद 10 मार्च को दोबारा मुख्यमंत्री-पद की शपथ ली थी। अर्जुन मंत्रिमंडल की सूची कांग्रेस हाईकमान से मंजूर करवाने के लिए दिल्ली गए।
पर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें पंजाब का गवर्नर बनने का आदेश दिया। जाते-जाते ये जरूर कहा -अपनी पसंद के मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष का नाम बता दो। फिर 14 मार्च को पंजाब पहुंच जाओ। अर्जुन सिंह कमरे से बाहर निकले और जिस जहाज से आए थे, उसको तुरंत भोपाल वापस भेजा। बेटे अजय सिंह को फोन किया। तुरंत वोरा को दिल्ली लाने के आदेश दिए।
मोतीलाल बोरा की पढ़ाई रायपुर और कोलकाता में हुई। फिर वोरा बन गए साइकिल वाले एक ऐसे पत्रकार जो नवभारत टाइम्स समेत कई अखबारों के लिए रायपुर से खबरें भेजने का काम करने लगे। इसी दौर में प्रजा समाजवादी पार्टी का झंडा उठाया और 1968 में दुर्ग से पार्षदी का चुनाव लड़ा और जीत भी गए बन गए पार्षद गए।
फिर किस्मत ने पलटी मारी और पार्टी की वफादारी बदली कांग्रेस में आ गए विधायकी का चुनाव लड़ा और जीत कर विधायक बन गए। तत्कालीन मुख्य मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ ने द्वारका प्रसाद मिश्र की शागिर्दी में दुर्ग के कांग्रेस विधायक की हैसियत से अपनी एक अलग राजनीतिक पहचान बनाने के बाद उन्होंने फिर कभी पीछे मुद कर नहीं देखा।
1972 के चुनाव के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गाँधी के निर्देश पर पीसी सेठी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वोरा जल्द उनके करीब आ गए। इसका इनाम मिला। सेठी ने वोरा को राज्य परिवहन निगम का उपाध्यक्ष नियुक्त किया। बोरा के मध्य प्रदेश परिवहन निगम का उपाध्यक्ष बनने के साथ ही एक संयोग यह भी बना कि उस साल पहली बार, मध्य प्रदेश के परिवहन ने मुनाफ़ा कमाया। इससे बोरा की राजनीतिक साख भी बढ़ी।
इसके बाद दूसरा सुखद संयोग यह हुआ कि जब आपात काल के बाद 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तब भी कांग्रेस विरोधी लहर में मोतीलाल बोरा चुनाव जीतने में कामयाब हो गए जबकि उस चुनाव में राज्य कांग्रेस के श्यामाचरण शुक्ल सरीखे कद्दावर पार्टी नेता और तत्कालीन मुख्यमंत्री चुनाव हार गए थे।
1981 में अर्जुन सिंह ने उनको शिक्षा राज्य मंत्री बना कर उचक शिक्षा का प्रभारी बनाया वह राज्यमंत्री बने। वोरा ने तत्परता दिखाते हुए कई कॉलेज खोले, कई निजी कॉलेजों का अधिग्रहण किया। सरकार की वाहवाही हुई तो अर्जुन ने भी शाबाशी दी।1983 में उनका प्रमोशन कर काबीना मंत्री बना दिया गया।। वोरा की अध्यक्षी में दो चुनाव हुए। प्रतिष्ठा अर्जुन सिंह की दांव पर थी। वह खरे उतरे।
84 के लोकसभा में कांग्रेस ने 40 की 40 सीटें जीतीं। इसी चुनाव में ग्वालियर से अटल बिहारी कांग्रेस के माधव राव सिंधिया से हारे थे। विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने 250 सीटें जीतीं। और इसी के बाद वोरा सीएम बने। मध्य प्रदेश की राजनीति में अर्जुन सिंह और मोतीलाल बोरा एक दूसरे के विकल्प के रूप में बारी-बारी से मुख्य मंत्री बनाए जाते रहे हैं। अर्जुन सिंह जब पंजाब का राज्यपाल बनाए गए थे तब मोतीलाल बोरा मुख्य मंत्री बने थे।
इसी तरह करीब एक दशक के बाद जब अर्जुन सिंह की प्रदेश की राजनीति में वापसी हुई तब मोतीलाल बोरा को राज्य सभा का सांसद बना कर दिल्ली की राजनीति में सक्रिय किया गया और केंद्र में मंत्री बनाया गया था। मगर यह सिलसिला भी कुल 11 महीने ही रहा। अर्जुन सिंह चुरहट लॉटरी कांड में फंस गए और हाईकमान ने उनका इस्तीफा मांग लिया। फिर मुख्यमंत्री खोज शुरू।
अर्जुन सिंह ने इस बार अपने खास और पार्टी प्रदेश अध्यक्ष दिग्विजय सिंह का नाम बढ़ाया। दूसरी तरफ से माधवराव सिंधिया का नाम बढ़ाया गया। फिर बनी टकराव की स्थिति। टकराव की इस स्थिति में एक बार फिर बाजी मोतीलाल बोरा के हाथ लगी और वो मुख्य मंत्री बन गए ।
इस तरह सिंधिया जी को खुश रखने की आलाकमान की समझाइश के साथ मोतीलाल बोरा ने 25 जनवरी 1989 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। और उसके बाद माधवराव सिंधिया के साथ प्रदेश के तूफानी दौरे शुरू किए। ये लोकसभा चुनाव के पहले माहौल बनाने की कोशिश थी।
प्रेस ने इस जोड़ी को नाम दिया मोतीलाल-सिंधिया एक्सप्रेस। मोतीलाल वोरा और माधवराव सिंधिया ने मिलकर प्रदेश का चुनावी दौरा किया, लेकिन मोती – माधव की यह जोड़ी 1989 के चुनाव में वो कांग्रेस को जिता नहीं पाई और मध्य प्रदेश में कांग्रेस के आठ लोकसभा उम्मीदवार ही चुनाव जीत सके थे, जबकि भाजपा ने 27 सीटें जीती थीं।
1989 के चुनाव के बाद पार्टी अध्यक्ष राजीव गाँधी ने एक बार फिर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों में फेरबदल किया और मोतीलाल बोरा को भी मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा गया था। उनकी जगह राज्य की कमान 11 साल का वनवास काट कर पार्टी में लौटे श्यामाचरण शुक्ल को दी गई और अर्जुन सिंह को मध्य प्रदेश कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बना कर राजनीतिक समीकरण संतुलित करने की कोशिश की गई थी।
1991 में राजीव गाँधी के आकस्मिक निधन के बाद जब पीवी नरसिम्ह राव कांग्रेस अध्यक्ष और बाद में प्रधान मंत्री बने तब उनकी पूछ बढ़ गई और राव ने मोतीलाल बोरा को 26 मई 1993 को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण यूपी का राज्यपाल बना कर भेज दिया।
उनका यह कार्यकाल इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि उनके तीन साल के कार्यकाल में लंबा समय राष्ट्रपति शासन का रहा।1996 में राज्यपाल से हटे तो फिर एमपी की सियासत में लौटे। 1999 के चुनाव में आज के छत्तीसगढ़ की राजनंदगांव सीट जीते।
दिल्ली पहुंचे तो पाया कि राव-केसरी युग बीत चुका है। अब सोनिया बॉस हैं। सोनिया को भी ऐसे ओल्ड गार्ड की जरूरत थी, जिसकी जरूरत से ज्यादा राजनीतिक महात्वाकांक्षा न हों। वोरा वैसे ही व्यक्ति थे। वैसे भी 1999 के लोकसभा चुनाव में रमन सिंह के हाथों हारने के बाद उन्हें पुनर्वास की जरूरत थी।
सोनिया ने 2002 में उन्हें राज्यसभा भेज दिया। इस तरह अपने जीवन के अंतिम दो दशक के दौरान मोतीलाल बोरा पार्टी संगठन की केन्द्रीय केंद्र की राजनीति में ही सक्रिय रहे।









