अब ब्रिटेन में सख्ती से कसे जाएं खालिस्तानी


ब्रिटेन में खालिस्तानी फंडिंग नेटवर्क की कमर तोड़ने के लिए बनाई गई स्पेशल टास्क फोर्स ने खालिस्तान समर्थकों के 300 से ज्यादा बैंक खाते जब्त कर 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम जब्त की है। भारत- ब्रिटेन संबंधों में बेहतरी तब ही कायदे से आएगी, जब वहां खालिस्तानी समर्थक कसे जाएंगे।


आरके सिन्हा
मत-विमत Updated On :

ब्रिटेन के हालिया चुनावों में लेबर पार्टी की महत्वपूर्ण जीत से साबित हो गया कि ब्रिटेन की राजनीति में भारतीय प्रवासी समाज की भूमिका बेहद खास हैं। ब्रिटेन के चुनाव परिणाम यह बताते हैं कि वहां की राजनीति में भारतीय प्रवासियों की ताकत बढ़ती ही जा रही है। निवर्तमान प्रधानमंत्री ऋषि सुनक सहित 26 भारतीय मूल के नेता नई संसद के लिए चुने गये हैं।

सुनक ने उत्तरी इंग्लैंड में रिचमंड एवं नॉर्थलेरटन सीट पर 23,059 वोट के अंतर के साथ दोबारा जीत हासिल की। सुनक की पार्टी की शिवानी राजा ने लीसेस्टर ईस्ट की सीट जीत ली है। लीसेस्टर ईस्ट में लड़ाई में कई दिग्गज शामिल थे, जिनमें पूर्व सांसद क्लाउड वेबे और कीथ वाज शामिल थे, जिन्होंने निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा था। कीथ वाज भी भारतीय मूल के ही हैं। वे पहले भी संसद के सदस्य रहे हैं। शिवानी राजा शिक्षा की दुनिया से जुड़ी हुई हैं। वो लंबे समय से कंजरवेटिव पार्टी की एक्टिविस्ट हैं।

भारत में जन्में कनिष्क नारायण पूर्व वेल्श की सीट से जीत गए हैं। वे भी कंजरवेटिव पार्टी के उम्मीदवार थे। बिहार के मुजफ्फरपुर के मूल निवासी कनिष्क नारायण 12 साल की उम्र में ब्रिटेन आ गए थे। उन्होंने ऑक्सफोर्ड और फिर स्टैनफोर्ड में पढ़ाई की। भारतीय मूल की सुएला ब्रेवरमैन ने फेयरहैम और वाटरलूविल सीट जीती है। उनके पिता गोवा के और मां तमिल मूल की हैं। पंजाबी हिन्दू परिवार से संबंध रखने वाले गगन मोहिन्दर फिर से साउथ-वेस्ट हर्टफोर्डशायर सीट से चुनाव जीत गए हैं। निवर्तमान संसद के सदस्य नवेंदु मिश्र लेबर पार्टी की टिकट पर स्टॉकपोर्ट सीट से कामयाब रहे हैं। वो मूल रूप से कानपुर से हैं। ब्रिटेन की निवर्तमान संसद में भी 15 भारतीय मूल के सांसद थे। ब्रिटेन के आम चुनाव 2024 में, कुल 107 ब्रिटिश-भारतीय उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे थे।

भारत-ब्रिटेन संबंधों के देखा जाए तो इसके प्रमुख रूप से पांच आयाम हैं। ब्रिटेन भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है। जबकि भारत भी ब्रिटेन में नई परियोजनाएं शुरू करने के मामले में तीसरा सबसे बड़ा देश है। भारत के लिए ब्रिटेन एक महत्वपूर्ण आयातक देश है। हालांकि यह भारत को बहुत बड़ी मात्रा में निर्यात भी करता रहा है। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में भारत की कंपनियों की भी बड़ी अहम भूमिका है।

भारतीयों की स्वामित्व वाली 700 से ज़्यादा कंपनियों ने ब्रिटेन में 1 लाख से ज़्यादा लोगों को रोज़गार भी दिया हुआ है। टाटा ग्रुप की ही कंपनियों ने ब्रिटेन में हज़ारों लोगों को रोज़गार दिया हुआ है। वहां हिन्दुजा, लक्ष्मी मित्तल, स्वराज पॉल जैसे बहुत सारे बड़े उद्योगपति रहते स्थायी रूप से रहकर ही देश-विदेश में अपना काम कर रहे हैं। इसके अलावा, भारत के हज़ारों छात्र ब्रिटेन में पढ़ाई करने भी हर साल जाते हैं। हां,भारत के युवाओं में अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी में पढ़ाई, नौकरी या निवेश करने का चलन भी बढ़ रहा है।

भारत और ब्रिटेन के बीच 200 साल से भी अधिक का पुराना संबंध है। दोनों ही देश सांस्कृतिक संस्थानों और अंग्रेज़ी से माध्यम से जुड़े हैं। दोनों देशों के आपसी संबंधों को मज़बूत रखने में ब्रिटेन में रहने वाले करीब 15 लाख प्रवासी भारतीयों की अहम भूमिका है। ये प्रवासी भारतीय न केवल ब्रिटेन और भारत के बीच एक मजबूत पुल का काम कर रहे हैं, बल्कि, इन्होंने भारत की संस्कृति से ब्रिटेन को संपन्न भी किया है। प्रवासी भारतीय ब्रिटेन में हर क्षेत्र में प्रभावशाली रूप से मौजूद है। अब चाहे वो व्यापार, राजनीति, खेल का क्षेत्र हो या कोई और, इन्होंने सभी क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण मुक़ाम हासिल किया है।

भारत को ब्रिटेन की नई सरकार से यह भी यही उम्मीद रहेगी कि पिछले साल भारतीय उच्चायोग पर हुए हमले के लिए जिम्मेदार तत्वों पर अब कठोर एक्शन लिया जाये। श्रषि सुनक सरकार ने भी खालिस्तान समर्थक संगठनों पर चाबुक चलानी शुरू कर दी थी। ये संगठन ब्रिटेन में बैठकर भारत के खिलाफ आतंकवाद या नफरत की आग फैलाने की साजिश में लगे हुए हैं। इन संगठनों में इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन, खालसा टेलीविजन लिमिटेड, खालिस्तानी टेलीविजन चैनल वगैरह शामिल हैं।

ब्रिटेन में खालिस्तानी फंडिंग नेटवर्क की कमर तोड़ने के लिए बनाई गई स्पेशल टास्क फोर्स ने खालिस्तान समर्थकों के 300 से ज्यादा बैंक खाते जब्त कर 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम जब्त की है। भारत- ब्रिटेन संबंधों में बेहतरी तब ही कायदे से आएगी, जब वहां खालिस्तानी समर्थक कसे जाएंगे।

अब भारत-ब्रिटेन का यह लक्ष्य रहेगा कि दोनों देश व्यापार, प्रौद्योगिकी और सुरक्षा में सहयोग बढ़ाएं। पिछली 4 जुलाई को ब्रिटेन में हुए संसदीय चुनावों के परिणाम व्यापक रूप से अपेक्षित थे। किएर स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी को 34 फीसद वोटों के साथ हाउस ऑफ कॉमन्स में 650 सीटों में से 410 सीटों पर जीत मिली। वे अब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन गए हैं। उनकी भी भारतीय सनातनी परम्पराओं में गहरी आस्था है और वे नियमित रूप से हिन्दू मंदिरों में जाते रहे हैं।

हालिया चुनाव परिणाम भारत- ब्रिटेन संबंधों के लिए चुनौतियां और अवसर दोनों ही प्रस्तुत करते हैं, जो पिछले दो दशकों में लगातार मजबूत होते रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर से बात की और उन्हें पीएम चुने जाने पर बधाई दी। प्रधानमंत्री मोदी ने विगत शनिवार को ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री से बात करते हुए उन्हें लेबर पार्टी की उल्लेखनीय जीत पर बधाई दी। बातचीत में दोनों नेताओं ने भारत-ब्रिटेन की व्यापक रणनीतिक साझेदारी को बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री को मोदी जी ने भारत आने का निमंत्रण भी दिया। दोनों नेताओं ने भारत-ब्रिटेन के बीच एफटीए यानी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को जल्द फाइनल करने की दिशा में काम करने पर भी सहमति जताई। भारत और ब्रिटेन के बीच आपसी संबंध मजबूत करने के लिहाज से एफटीए का काफी महत्व है। इस मुद्दे पर आगे बढ़ने के लिए दोनों ही देश कोशिशें कर रहे हैं। इस बाबत वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल गंभीरता से प्रयास करते रहे हैं। प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते में कुल 26 अध्याय हैं, जिनमें से अधिकतर पर आपसी सहमति बन गई है।

अगर एफटीए समझौता हो जाता है, तो इससे दोनों देशों में आर्थिक विकास और रोजगार के मौके को बढ़ावा मिलेगा। अभी ब्रिटेन के साथ भारत का जो द्विपक्षीय व्यापार है, वो भारत के पक्ष में ही थोड़ा झुका है। यानी भारत आयात के मुकाबले ब्रिटेन को निर्यात ज्यादा करता है। हालांकि, आयात-निर्यात के बीच का यह अंतर बहुत ज्यादा नहीं है।

भविष्य में भारत-ब्रिटेन के साथ संबंधों में लगातार बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है। भारत चाहेगा कि नई सरकार ब्रिटेन में भारत विरोधी तत्वों की बढ़ती गतिविधियों पर रोक लगाए और पाकिस्तान से उत्पन्न आतंकवाद का मुकाबला करने में सहयोग करें। वैसे ब्रिटेन के नये प्रधानमंत्री का कश्मीर पर रूख जग-जाहिर है। वे कश्मीर विवाद को पूर्णत: भारत का अंदरूनी मामला मानते हैं और कश्मीर में किसी भी तरह की पाकिस्तानी हस्तक्षेप के सख्त खिलाफ हैं।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं)