
आज के दौर में पंजाबी भाषा देश को बचा सकती है, लेकिन तभी अगर वो ख़ुद अपनी आत्मा को बचाए। अगर पंजाबी अपनी जड़ों से जुड़ती है तो वह राष्ट्र और धर्म के नाम पर चल रही संकीर्ण राजनीति का जवाब बन सकती है, पूरे देश को राह दिखा सकती है। लेकिन अपनी जड़ों से कटी पंजाबी या तो हल्के फुलके मखौल की भाषा बन जाएगी या फिर उसका आग्रह सांप्रदायिकता और अलगाव की तरफ़ ले जा सकता है।
यह बात मैंने पंजाबी साहित्यकारों और विद्वानों की एक बैठक में कही। वे सब पंजाब में अमृतसर के नजदीक प्रीतनगर में सातवें “आनंद जोड़ी स्मृति पुरस्कार, 2025” के समारोह में भाग लेने आये थे। इस वर्ष पत्रकारिता में सराहनीय योगदान के लिए ‘जगजीत सिंह आनंद पुरस्कार’ पंजाबी के युवा पत्रकार हरमनदीप सिंह को दिया गया। वर्ष की श्रेष्ठ पंजाबी कहानी का ‘उर्मिला आनंद पुरस्कार’ पाकिस्तान की लेखिका अम्बर हुसैनी को दिया गया। यह अवसर प्रीतनगर की उस ऐतिहासिक धरोहर से जुड़ने का भी था जहाँ आधुनिक पंजाबी साहित्य को पाला पोसा गया।
पंजाबी के मूर्धन्य लेखक गुरबख्श सिंह ने 1933 में पंजाबी पत्रिका ‘प्रीतलड़ी’ की शुरुआत की और छह वर्ष बाद अमृतसर और लाहौर के बीच स्थित ज़मीन पर ‘प्रीतनगर’ बसाया जिसके पीछे शांतिनिकेतन जैसा एक सांस्कृतिक और शैक्षणिक केंद्र बनाने का सपना था। देश के विभाजन के चलते उनकी पूरी योजना तो फलीभूत ना हो सकी, लेकिन विभाजन से पहले और उसके बाद भी प्रीतनगर पंजाबी साहित्य की नर्सरी बना रहा। हर साल इस विरासत को ज़िंदा रखने के लिए पंजाबी लेखक और बुद्धिजीवी वहाँ जुड़ते हैं। इस मौके का फ़ायदा उठाकर मैंने वो बात कही जो पंजाबी भाषा और समाज के नज़दीक रहने के कारण काफ़ी समय से मेरे मन में रही है।
पंजाबी दुनिया की उन चंद भाषाओं में है जिनका दायरा देश और मजहब दोनों की सरहदों को तोड़ता है। यह भारत और पाकिस्तान दोनों के पंजाब की भाषा होने के साथ साथ अब इंग्लैंड, अमरीका और कनाडा में फैल चुकी है। यह सिख, हिंदू और मुसलमान की भाषा रही है, पंजाब के छोटे से ईसाई समुदाय की भी। आज यह भाषा मुख्यतः गुरुमुखी लिपि में लिखी जाती है, लेकिन एक जमाने में यह देवनागरी और शाहमुखी (यानी अरबी) लिपि में भी लिखी जाती थी। पाकिस्तान के पंजाब में औपचारिक रूप से सिर्फ उर्दू की पढ़ाई के चलते वहाँ पंजाबी सिर्फ़ एक बोली बनकर रह गई है, हालाँकि हाल ही में वहाँ शाहमुखी लिपि में पंजाबी साहित्य की रचना फिर से जोड़ पकड़ रही है।
श्रीगुरुनानक देव, बाबा फरीद और बुल्लेशाह की वारिस यह भाषा शुरू से ही समता और न्याय की आवाज बन कर खड़ी हुई है। पंजाबी भाषा का मिजाज और तेवर सत्ता के विरोध का रहा है। इसी के चलते पंजाबी लेखक गदर आंदोलन से जुड़ कर अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ खड़े हुए, उन्होंने इमरजेंसी का विरोध भी किया, विभाजन के दर्द को उकेरा और पंजाब में आतंकवादियों के ख़िलाफ़ भी अपनी कलम उठाई। इस पंजाबी ने अमृता प्रीतम, शिव कुमार बटालवी और अवतार सिंह पाश की कविता की जन्म दिया। साहिर लुधियानवी और गुलज़ार को दुनिया पंजाबी कवि के रूप में नहीं जानती, लेकिन उन्हें भी इसी पंजाबी भाषा ने सींचा है।
लेकिन आज पंजाबी भाषा की स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं से बेहतर नहीं है। बेशक पंजाबी में आज भी बेहतरीन साहित्य निर्माण हो रहा है। दलित साहित्य उभर रहा है। उसकी एक झलक मुझे इस सम्मेलन में देखने को मिली। इस मायने में पंजाबी साहित्य हिंदी इलाक़े के हरियाणा जैसे किसी एक राज्य से बेहतर है। पंजाबी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए हिंदी इलाक़ों से बेहतर कुछ संस्थान भी हैं। पंजाबी पत्रकारिता में अब भी एक धार बची हुई है। लेकिन यह सब एक बड़े और कड़वे सच से हमारा ध्यान नहीं खींच सकता। अन्य भारतीय भाषाओं की तरह पंजाबी में भी मौलिक ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और समाजशास्त्र का निर्माण नहीं हो रहा।
देश, दुनिया और भविष्य की समझ बनाने का काम अंग्रेज़ी में हो रहा है, पंजाबी में नहीं। राजसत्ता के ख़िलाफ़ खड़े होकर सच बोलने वाले पत्रकारों और पत्र पत्रिकाओं की संख्या घटती जा रही है। दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे बड़े शहरों में रहने वाले पंजाबी माँ-बाप अपने बच्चों से अंग्रेज़ी या हिंदी में बात करते हैं, पंजाबी में नहीं। इंग्लिश मीडियम स्कूल जाने की होड़ लगी है। सरकारी स्कूल में पंजाबी मीडियम में पढ़ाई करने वाले बच्चों में या तो पंजाब के गरीब हैं, या फिर बिहार और उत्तर प्रदेश के आप्रवासी। नई पीढ़ी में विदेश जाने का भूत सवार है, चाहे ‘डंकी’ वाले रास्ते से ही सही। पंजाब में चारों तरफ़ वीसा दिलाने और अंग्रेज़ी की आइलेट्स (IELTS) परीक्षा में पास करवाने के विज्ञापन छाये हुए हैं।
आप कह सकते हैं कि देश और दुनिया में पंजाबियों का बोलबाला है, कि पंजाबी गीतों पर सारी दुनिया नाच रही है। लेकिन मुझे डर लगता है कि इस सफलता की क़ीमत यह है कि पंजाबी समाज अपनी गहरी विरासत से कट रहा है। अमरीका की तरह सफलता, पैसे और शानो-शौकत को सब कुछ मानने का चलन चल निकला है। पंजाबी का जो फिल्मी स्टीरियोटाइप है -गाना, भंगड़ा और चुटकला- ख़ुद पंजाबी समाज उसमे क़ैद हो रहा है। ये पंजाब की विरासत नहीं है। ये वो पंजाबी नहीं है जो देश को रास्ता दिखा सके। पंजाबी देश को बचा सके, उससे पहले जरूरी है कि पंजाबी ख़ुद अपने आप को बचा सके। अपनी विरासत से कटी पंजाबी या तो सिर्फ़ एक सामंती वर्ग की अय्याशी का स्तुति गान करेगी, या फिर पंथिक मुहावरे में फँसकर अंततः अलगाव की राह पकड़ेगी।
यह बात पंजाबी के संदर्भ में कही गई है। लेकिन इसका ज्यादातर हिस्सा तमाम भारतीय भाषाओं पर लागू होता है। जो पंजाबी का संकट है, वो कमोबेश हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं का संकट है जो सब अंग्रेज़ी के सामने झुकी हुई हैं। यह चुनौती सिर्फ़ एक भाषा की नहीं है। इसका मुक़ाबला अकेले नहीं किया जा सकता। इसके लिए पंजाबी और हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं को एक साथ खड़ा होकर सांस्कृतिक स्वराज की लड़ाई लड़ाई लड़नी होगी।
(योगेन्द्र यादव चुनाव विश्लेषक और राजनीतिक चिंतक हैं)