गोंडा एनकाउंटर की पटकथा से मिलती है बिकरु की कहानी, वहां भी गई थी सीओ की जान

विकास मुठभेड़ कांड की सच्चाई छुपी नहीं है,देश में संविधान-कानून को मानते हुए पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। कानपुर कांड जिसमें पुलिसकर्मियों की जाने गईं न सिर्फ वो सवालों के घेरे में है बल्कि ऐसे अपरिपक्व आपरेशन के लिए जिम्मेदार कौन है?

विकास मुठभेड़ कांड की सच्चाई छुपी नहीं है, देश में संविधान-कानून को मानते हुए पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। कानपुर कांड जिसमें पुलिसकर्मियों की जाने गईं न सिर्फ वो सवालों के घेरे में है बल्कि ऐसे अपरिपक्व आपरेशन के लिए जिम्मेदार कौन है ? वहीं पुलिस के मनोबल के नाम पर हत्याओं का जो सिलसिला चल रहा उसे तत्काल रोका जाना जरूरी है क्योंकि इससे आम जनता में दहशत पैदा हो रही है। जो न जनता के हित में है न पुलिस के। 

हमें माधवपुर, गोंडा 1982 की फर्जी मुठभेड़ कांड को नहीं भूलना चाहिए जिसमें डीएसपी केपी सिंह की हत्या के आरोप में पुलिस वालों को फांसी और उम्र कैद की सजा हुई। कानपुर मुठभेड़ या अन्य मुठभेड़ों की जांच हो जाए तो इस स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता। यहां गौर करने की बात है कि पूरी कहानी में सिर्फ विकास को ही मुख्य किरदार बनाया गया। क्या 1982 माधवपुर, गोंडा एनकाउंटर की तरह बिकरू, कानपुर एनकाउंटर नहीं हो सकता। 

वहां भी सीओ की जान गई और यहां भी। वहां भी थानेदार और सीओ में विवाद था और यहां भी। वहां भी सीओ ने एसपी से थानेदार की शिकायत की थी और यहां भी जिसको देवेंद्र मिश्रा की बेटी ने एसपी, थानेदार और उनके पिता के बीच की काल रिकार्डिंग को जारी कर बताया। ठीक जिस तरह गोंडा में सीओ अपराधी को पकड़ने गए और वहां उनके ही थानेदार को उनकी ही हत्या का दोषी पाते हुए सीबीआई ने सजा सुनाई। क्या वो घटना बिकरु से मिलती-जुलती नहीं है।

थानेदार-सीओ के बीच की लड़ाई अमूमन या कहें कि किसी भी विभाग में कर्मचारियों के बीच इस तरह के झगड़े रहते हैं। बिकरु में भी कहा जा रहा कि जिन पुलिस वालों ने मुखबिरी की वो पीछे-पीछे चल रहे थे। वहीं देवेंद्र मिश्रा और अन्य पुलिस वालों की हत्या में पुलिस वालों से ही हथियार छीन कर हत्या की बात कही जा रही है। इतने महत्वपूर्ण ऑपरेशन में इतनी बड़ी चूक आसान नहीं दिखती। और तब जब पुलिस ही पुलिस के खिलाफ मुखबिरी कर रही हो और वो घटनास्थल के बेहद करीब हो तो क्या वो गोंडा की तरह अपने सीओ की हत्या में लिप्त न हो ऐसा न मानने का भी कोई ठोस कारण नहीं है।

विकास से देवेंद्र मिश्रा के तनाव की बात भी आई और वो उनके थानेदार से अधिक नहीं थी। जिसमें ये कहा जा रहा कि उन्होंने बोला था कि विकास का एक पैर खराब है दूसरा भी सही कर दूंगा। यहां महत्वपूर्ण सवाल है कि विकास के घर से करोड़ों रुपए के लेन-देन के कागजात की कहानी आई है। 35 हजार से 15 लाख की लेन-देन वाले 65 लोगों के नाम हैं। 12 को शादी-व्याह अथवा बीमारी में उसने मदद की थी। 35 लोगों से उसे रुपए लेने थे। करीब 10 जगह से उसे 3 करोड़ रुपए आने थे। 

विकास या फिर कोई कुख्यात माफिया ही क्यों न हो लेकिन जिस तरह से उसके एनकाउंटर में मारे जाने की बात कही जा रही है उसे स्वीकारा नहीं जा सकता। कानून की हुकमरानी में किसी को भी इस तरह से मार डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जिस तरह से कहा जा रहा है कि मुखबिरी नहीं होती तो विकास मारा जाता तो यह भी सवाल है कि एनकाउंटर के नाम पर हत्या की इजाजत क्या कानून देता है। और अगर ये परंपरा बन गई तो हर जगह पुलिस की दबिस को एनकाउंटर मानकर गोली चलने लगेगी जो कानून व्यवस्था को तार-तार कर देगी।

उज्जैन से कानपुर लाते हुए गाड़ी के जिस तरह से पलटने की तस्वीरों की कहानी आई है उससे साफ होता है कि गाड़ी का केवल एक तरफ का ही दरवाज़ा ऊपर खुल सकता था। उसमें से निकलने का प्रयास करने वाले किसी भी व्यक्ति को आसानी से काबू किया जा सकता था। जो वीडियो आया है उसमें ड्राइवर की तरफ का शीशा खुला है और सब दरवाजे बंद हैं। इसके अलावा यूपी एसटीएफ की अन्य गाड़ियां भी मौजूद थीं ऐसे में भागने का प्रयास करना मौत को दावत देने जैसा हो सकता था, यह बात कोई भी समझ सकता है। वहीं एसटीएफ का यह कहना कि पशुओं की आवाजाही से गाड़ी अनियंत्रित होकर पलट गई और पुलिसकर्मी क्षणिक रुप से अर्धचेतनावस्था में चले गए जिसका लाभ उठाकर विकास पिस्टल छीनकर भाग गया। 

यहां सवाल है कि यह क्षणिक रुप से अर्धचेतनावस्था कितनी देर की थी। दूसरा की इससे विकास पर कोई असर नहीं हुआ इसे भी माना जा सकता है पर अगर गाड़ी में उसे बैठाकर ले जा रहे होंगे तो सुरक्षा कारणों से किनारे तो नहीं बैठाया गया होगा। टोल प्लाजा से गुजरती हुई टाटा सफारी में वो बीच में बैठा हुआ दिखता है। सवाल यह भी की जो अन्य गाड़ियां थी वो क्यों पीछे रह गईं। उनकी उस वक़्त तो ड्यूटी विकास को लाने की ही थी।

और अगर ये हुआ तो क्या पुलिस वाले पीछे से आ रहे अपने साथियों का इंतजार करेंगे कि भागने वाले का पीछा करेंगे। जैसा कि कहा जा रहा कि जब पीछे से गाड़ी आई तो वे फिर विकास का पीछा किए। विकास दुबे की पुलिस और राजनीतिक दायरे में गहरी पैठ थी तो सवाल है कि कैसे इतने बड़े पैमाने पर पुलिस उसके घर गई। दूसरा कि जिन पुलिस वालों से उसके संबंध सामने आ रहे हैं उन संबंधों का आधार क्या था। अमूमन यह आधार जातीय और आर्थिक ही यूपी के परिदृश्य में देखने को मिलता है। 

इस केस को हल करने के लिए पुलिस वालों की हत्या की पूरी कहानी विकास की जुबानी आनी थी। क्योंकि मीडिया माध्यमों में आया कि पुलिस की गोली से कई पुलिस वालों की मौत हुई। जो सामान्य स्थिति में नहीं होती। क्योंकि कहा जा रहा है कि विकास के लोगों ने गोलियां चलाई। दूसरा की विकास के लोगों ने पुलिस के हथियार लूट लिए। इतने दुस्साहसी और आपराधिक मानसिकता वालों में से दो को उसी सुबह पुलिस ने मारने का दावा करते हुए पुलिस से छीने हथियारों की बरामदगी बताई। इसके बाद लगातार विकास के लोगों को मुठभेड़ में मारने के दावों के बीच आया कि वह जिले और प्रदेश की सीमाओं को धता बताते हुए फरीदाबाद पहुंच गया। और फिर वहां से उज्जैन महाकाल। 

मीडियाकर्मी लिख रहे हैं कि उज्जैन से उसे बिना ट्रांजिट रिमांड के टाटा सफारी से लाया जा रहा था। एसटीएफ के काफिले में चल रही मीडिया की गाड़ियों को कानपुर के सचेंडी के पास बैरिकेटिंग करके रोक दिया गया। बाद में जहां से कुछ दूर पर एनकाउंटर की खबर आई। यहां महत्वपूर्ण है कि जब मीडिया की गाड़ियां रोकी गई तो विकास टाटा सफारी में था और जो गाड़ी पलटी दिखाई गई वो महिंद्रा टीयूवी और जिस गाड़ी में उसे अस्पताल ले जाया गया वो टाटा सफारी।

निहत्थे महाकाल मंदिर के गार्ड द्वारा गिरफ्तार या कहें चिल्ला-चिल्लाकर कर सरेंडर करने वाला शख्स 24 घंटे में ही पुलिस हिरासत से क्यों भागेगा। विकास के लंगड़ कर चलने और उसके पैर में रॉड होने की बात भी आ रही है कि वह कैसे भाग सकता था। वह भी इतनी अफरा-तफरी में क्या उसका मास्क उसके चेहरे पर लगा रह सकता है। ऐसे में जब उसके सभी करीबी मारे जा रहे हैं और पत्नी-बच्चे को भी गिरफ्तार किया जा चुका हो तो यह संभव नहीं। वहीं विकास के भतीजे की मुठभेड़ में मारे जाने के बाद उसकी नवविवाहिता को हिरासत में लेने की भी बात आई है। अगर पुलिस को था कि उसने उनके साथियों की हत्या की तो उसके इस जुर्म की सजा न्यायालय देता। पूरी कहानी की सच्चाई सड़क के किनारे पड़ी गाड़ी बयान कर रही है जिसके सभी दरवाजे बंद हैं और गाड़ी सड़क की सीध में पलटी हुई है।

यहां सवाल साफ है कि मुठभेड़ के वक़्त भी पुलिस दो गुटों में बटी थी। एक एनकाउंटर करने दूसरा बचाने लिए। गैंगेस्टर-गैंगेस्टर कहकर विकास की हत्या को जायज ठहराने से पहले क्या शासन-प्रशासन के पूरी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रदेश के मुखिया की ठोक दो नीति के तहत हज़ारों एनकाउंटर के बाद भी अगर प्रदेश की कानून व्यवस्था की हालत खराब है तो इसके लिए सिर्फ माफिया ही नही पुलिस पर भी बात होनी चाहिए। पुलिस का मनोबल हत्या से नहीं विश्वास से बनता है। विकास दुबे के मारे जाने से उसके संबधों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यूपी की राजनीति में ऐसे सैकड़ों विकास हैं जो ज्यादा विकास कर माननीय बन गए हैं। 
(राजीव यादव राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।)

First Published on: July 12, 2020 9:36 AM
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