अंबेडकर जयंती पर संयुक्त किसान मोर्चा गाजीपुर बॉर्डर की अपील : खेती पर कारपोरेट कब्जेदारी का करें विरोध    

ठेका खेती कानून जमीन वाले किसानों को कम्पनियों के साथ ठेका में बांध देगा, वे कम्पनियों से मंहगी लागत व मशीनें खरीदने के लिए मजबूर होंगे और वे अपनी जमीन गिरवी रख कर कर्ज लेंगे। फसल की बिक्री के लिए वे कम्पनी से बंधे होंगे। वे स्वेच्छा से अपनी जरूरत की खेती नहीं कर पायेंगे। नील की खेती की तरह उन्हें कम्पनियों की इच्छानुसार फसल पैदा करनी होगी। घाटा होने पर उनकी जमीनें छिन जाएगी।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर देश के शोषित, उत्पीड़ित लोगों की आजादी के सपनो के नायक थे। हम उन्हें संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं, जिस संविधान में आजादी के दिये गये कई मौलिक अधिकारों पर आज आरएसएस-भाजपा की मोदी सरकार तीखे व क्रूर हमले कर रही है। अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा पिछड़ी जातियों के आरक्षण के संवैधानिक अधिकार पर राजनीतिक हमला किया जा रहा है और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दर्ज कर, प्रश्न उठाये जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट पर इन प्रावधानों को सख्ती के साथ अमल कराने की जिम्मेदारी है, पर वह इन आरक्षण विरोधी दलीलों को सुन रही है। आज, जब बेरोजगारी बेइंतहा तेजी से बढ़ रही है और खेती में घाटा व कर्जदारी बढ़ रही है, तब इसके चलते कई बिरादरियां शिक्षा व सरकारी नौकरियों में अपने लिये अलग से आरक्षण की मांग कर रही हैं, जैसे – मराठा, जाट, कप्पू, मीणा, निषाद, आदि। पर मनुवादी चिन्तन से ग्रसित और देशी-विदेशी कारपोरेट के हित पूरे करने के लिए समर्पित आरएसएस-भाजपा सरकार, ऐसे में भी गरीबों की तमाम सुविधाओं पर हमले कर रही है।

खेती के लिए बनाए गये ये तीन कानून और बिजली बिल 2020 इसका सबसे ताजा उदाहरण हैं। ठेका खेती कानून जमीन वाले किसानों को कम्पनियों के साथ ठेका में बांध देगा, वे कम्पनियों से मंहगी लागत व मशीनें खरीदने के लिए मजबूर होंगे और वे अपनी जमीन गिरवी रख कर कर्ज लेंगे। फसल की बिक्री के लिए वे कम्पनी से बंधे होंगे। वे स्वेच्छा से अपनी जरूरत की खेती नहीं कर पायेंगे। नील की खेती की तरह उन्हें कम्पनियों की इच्छानुसार फसल पैदा करनी होगी। घाटा होने पर उनकी जमीनें छिन जाएगी।

जो जातियां जमीन व जीविका के साधनों से वंचति रहीं, उन्हें कमजोरी और दरिद्रता की श्रेणी में ढकेला गया, दलित बनाया गया और छुआछूत का शिकार बनाया गया। आज ये कानून जमीन वाले किसानों के लिए खतरा बन गए हैं। खेती का यह नया प्ररूप बटाईदार किसानों के लिए और भी घातक है क्योंकि खेती को लाभकारी बनाने के लिए कम्पनियां बड़े पैमाने पर इसमें मशीनों का प्रयोग कराएंगी और बटाईदारों का काम पूरा छिन जाएगा। बटाईदारों की बड़ी संख्या बहुजन समाज से आती है। देश के मेहतनकशों के लिए एक उत्साह की बात है कि जमीन वाले किसान और इनके संगठन, इन कानूनों को रद्द कराने के लिए लड़ रहे हैं।

नया मंडी कानून निजी मंडियों को स्थापित होने, उन्हें ऑनलाइन द्वारा फसल के रेट तय करने और सबसे सस्ते रेट पर फसल खरीदने का अधिकार देते हैं। मंडी में व्यापार के नियम भी वही तय करेंगे और किसान को विलम्ब से भुगतान करने का नियम भी। विवादों का निपटारा उन्हीं के नियमों से होगा। जाहिर है, गन्ने व अन्य फसलों की खेती करने वाले किसान और इस खेती में मजदूरी करने वाले, दोनों तबके इससे तबाह हो जाएंगे।

आवश्यक वस्तु संशोधन कानून कम्पनियों व बड़े व्यापारियों को जमाखोरी व कालाबाजारी करने की छूट देता है, अनाज के दाम हर साल डेढ़गुना बढ़ाने की छूट देता है। विश्व व्यापार संगठन की शर्तों का पालन करते हुए सरकार न तो 81.35 करोड़ राशन लाभार्थियों को राशन देगी और न ही किसानों की फसल खरीदेगी।

हम न्यूनतम समर्थन मूल्य और फसलों की सरकारी खरीद की गारंटी के लिए लड़ रहे हैं। राशन वितरण को सुचारू व प्रभावी बनाने की लड़ाई भी इससे जुड़ी हुई है। इसके लिए मजदूरों, भूमिहीनों, बटाईदारों व छोटे तथा बड़े किसानों को मिलकर लड़ना होगा।

कोरोना महामारी में सरकार द्वारा थोपे गए लॉकडाउन में सबसे गम्भीर परेशानियां प्रवासी मजदूरों ने झेलीं, जिनका बड़ा हिस्सा पिछड़ी जातियों व बहुजन समाज का था। शहरों में फंसे मजदूरों व निम्न मध्य वर्ग पर बिना रोजगार व बिना पैसे, भूखे मरने या पुलिस यातनाओं को झेलते हुए पैदल घर लौटने की आफत लाद दी गयी। सरकार ने बीमारी रोकेने के नाम पर लोगों से भारी जुर्माना वसूला और किसानों-मजदूरों पर कई केस दर्ज कर उन्हें जेल भेजा। सीएए नागरिकता पर लगाया गया प्रश्न, मुसलमानों के साथ-साथ सभी गरीबों पर भी हमला था। यह सरकार के अहंकारी, गरीब विरोधी और मनुवादी दर्शन का हिस्सा है।

इस निरंकुश पुलिस दमन के दौर में उपरोक्त तीन कानून लागू किये गये। साथ में बिजली बिल भी लाया गया, जो खेती में व गरीबों के लिए तमाम रियायती बिजली दरों को समाप्त कर देता है और मनमाने ढंग से थोपे गये बिजली बिलों की वसूली के लिए पुलिस बल के साथ गरीबों के घरों पर हमला करने की इजाजत देता है।

जो शानदार आन्दोलन पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उप्र के किसानों ने शुरु किया है, उसने इन तमाम फासीवादी हमलों पर सेंध लगा दी और खेती में विदेशी व घरेलू कारपोरेट की लूट पर प्रश्न खड़े कर लोगों को जागृत कर दिया है। लोग बढ़ती भूख, बेरोजगारी, मंहगाई, बढ़ते सरकारी भ्रष्टाचार, वसूली, शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी सुविधाओं पर निजीकरण की मार, महिलाओं के साथ बढ़ते उत्पीड़न व यौन उत्पीड़न की घटनाओं, बहुजन समाज के साथ बढ़ते अत्याचार, बोलने की स्वतंत्रता पर हमले तथा पुलिस अराजकता व निंकुशता से भयभीत थे। अमन चैन के अभिलाषी, देश के सभी नागरिकों व मेहनत करने वाले लोगों के लिए यह आन्दोलन एक रोशनी का चिराग बन कर खड़ा है।

डॉ. अम्बेडकर ने एक जनपक्षीय, जाति शोषणविहीन, महिलाओं की बराबरी और गरीबों के विकास वाले भारत का सपना देखा था। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में संसद से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने भूमिहीनों को जीविका के साधन दिलाने पर अपना ध्यान केंद्रित करने की बात कही थी। आरएसएस-भाजपा की सरकार डॉ. अम्बेडकर का नाम भुनाने में कोई संकोच नहीं करती, पर वह उनके उसूलों को पैरों तले रौंदने में जुटी हुई है।

आइये, इस संघर्ष में कंधे से कंधा मिलाएं और डॉ. अम्बेडकर के सपनों को साकार करें।

First Published on: April 14, 2021 12:06 PM
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