वो जब याद आए..! पीवी नरसिंह राव जन्मशती मनाने को क्यों मजबूर है कांग्रेस


2020 देश के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव का जन्मशती वर्ष है। हैरानी की बात यह है कि पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष की जन्मशती के ये कार्यक्रम न तो सरकार आयोजित कर रही है और न ही वो पार्टी जिसके वो राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। पीवी नरसिंह राव जन्मशती समारोह का आयोजन तेलंगाना राज्य कांग्रेस समिति कर रही है।



कांग्रेस पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को विगत 24 जुलाई को अपने पूर्व अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की तब बहुत याद आई जब तेलंगाना कांग्रेस समिति ने पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष के सम्मान और स्मृति में एक वेबिनार का आयोजन किया। कांग्रेस के दोनों मौजूदा नेताओं ने नरसिंह राव के सम्मान में जो कुछ कहा उससे ऐसा लगा कि शायद आज देश की इस पार्टी को जिसने सबसे ज्यादा समय तक इस देश पर राज किया नरसिंह राव जैसे नेता के न रहने का अहसास हो रहा है। अजीब बात है कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा अध्यक्ष (मां-बेटे सोनिया और राहुल)  का अपनी पार्टी के एक दिवंगत अध्यक्ष नरसिंह राव को याद किया यह एक बड़ी खबर बन गयी, जबकि खबर तो यह बननी चाहिए थी कि अखिल भारतीय कांग्रेस समिति अपने दिवंगत अध्यक्ष के जन्म शती वर्ष में क्या ख़ास कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रही है। 

गौरतलब है कि मौजूदा साल (2020) देश के पूर्व प्रधानमंत्री और देश की सबसे पुरानी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष पीवी नरसिंह राव का जन्मशती वर्ष है। पिछले महीने जून के अंतिम सप्ताह से ही साल भर चलने वाले इस आयोजन की शुरुआत हुई थी। हैरानी की बात यह है कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री और देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष की जन्मशती के ये कार्यक्रम न तो देश की सरकार आयोजित कर रही है और न ही वो पार्टी जिसके वो राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। पीवी नरसिंह राव जन्मशती समारोह का आयोजन तेलंगाना राज्य कांग्रेस समिति कर रही है। 

इसी जन्म शती आयोजन समिति ने विगत 24 जुलाई को जिस वेबिनार का आयोजन किया था उसी में हिस्सा लेते हुए सोनिया और राहुल ने नरसिम्ह राव को याद करते हुए उन्हें महान घोषित किया था। इससे करीब एक महीने पहले जब नरसिंह राव जन्मशती कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी तब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पूर्वाधिकारी को महान घोषित कर चुके थे। ऐसे अवसर पर कांग्रेस नेताओं ने चुप्पी बनाए रखी थी लेकिन जब 24 जुलाई के कार्यक्रम में कांग्रेस के नेताओं ने नरसिंह राव को सम्मान के साथ याद किया तो लगा कि कांग्रेस पार्टी इस वक़्त उन्हें खोना नहीं चाहती है। कांग्रेस के किसी नेता की तारीफ़ जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करते हैं तो कांग्रेस की चिंता स्वाभाविक रूप से बाहर झलकने लगती है।

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस के नेहरु -गांधी परिवार के सदस्यों ने अनेक भाषाओं के विद्वान् , उच्च प्रशासनिक और राजनीतिक प्रबंधन में दक्ष आन्ध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्र में रक्षा, शिक्षा, गृह और विदेश जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की कमान सफलतापूर्वक थाम चुके नरसिंह राव को कांग्रेस अध्यक्ष और प्रधान मंत्री के रूप में वो सम्मान नहीं दिया जो उन्हें दिया जाना चाहिए था। इसे एक विडम्बना ही कहा जाएगा कि जिस व्यक्ति मनमोहन सिंह को नरसिंहराव ने अपनी सरकार में देश का वित्त मंत्री बना कर नव जागरण काल में उदारीकरण के वैश्विक प्रभाव का सामना करते हुए आर्थिक नीति के सुसंचालन की जिम्मेदारी सौंपी थी। उसी व्यक्ति को इस परिवार के सदस्यों ने 2004 के चुनाव में पार्टी की जीत के बाद देश का प्रधानमंत्री तो जरूर बनाया लेकिन जो व्यक्ति मनमोहन सिंह जैसे योग्य व्यक्ति को यहां तक लाने के लिए जिम्मेदार था उसे अंतिम समय में भी इतना सम्मान नहीं दिया गया कि उसके निधन के बाद उसकी अन्त्येष्टि ही ठीक तरीके से कर दी जाती। 

नरसिंह राव कांग्रेस के पहले ऐसे प्रधानमंत्री भी रहे जिनको उनकी मौत के बाद दिल्ली में कोई जगह नहीं दी गई। वो भी तब जब उनकी मौत के समय केंद्र में कांग्रेस पार्टी की ही सरकार रही हो। आजादी के बाद कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने जितने भी प्रधानमंत्री अब तक हुए हैं उनकी समाधि देश की राजधानी दिल्ली में हैं। चाहे वो पंडित जवाहरलाल नेहरु हों या फिर लालबहादुर शात्री, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ही क्यों न रहे हों। यहां तक कि प्रधानमंत्री बनने से काफी पहले कांग्रेस पार्टी छोड़ चुके भारतीय लोकदल के नेता चौधरी चरण सिंह की भी दिल्ली में समाधि है लेकिन नरसिंह राव इकलौते कांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं जिन्हें मरने के बाद यह सुख नसीब नहीं हो सका।

1996 में प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद भी जितने साल नरसिंह राव जीवित रहे उस पूरी अवधि में कांग्रेस के कुछ नेताओं को छोड़ कर कोई भी उनसे मिलने नहीं जाता था। उनसे मिलने वालों में मनमोहन सिंह जरूर थे लेकिन गांधी परिवार के किसी व्यक्ति को पूर्व प्रधानमंत्री और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष से मिलना रास नहीं आता था। यह बात अलग है कि विपक्ष में रहते हुए जब भी पार्टी को किसी तरह की कोई दिक्कत आती थे तब नरसिंह राव ही संकटमोचक बन कर सामने आते थे। 1998 में जब सोनिया गांधी विधिवत कांग्रेस अध्यक्ष बनी तब पार्टी के कई अधिवेशनों में पार्टी का राजनीतिक प्रस्ताव तैयार करने की जिम्मेदारी भी नरसिंह राव को ही दी गई। लेकिन इन कामों के अलावा जो सम्मान उनको दिया जाना चाहिए था वो उन्हें नहीं दिया गया।

1989 में जब राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को लोकसभा के चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा था, उसके दो साल बाद 1991 के मध्यावधि चुनाव के बीच की अवधि और फिर 1996 में एक बार फिर लोक सभा के चुनाव हारने और पार्टी में संगठनात्मक स्तर पर हुए बदलावों के चलते इन दो अवसरों पर देश के पूर्व प्रधानमंत्री को पार्टी पूरी तरह भूल ही गई थी। 1989 से 1991 के बीच का समय तो इतना खराब चल रहा था कि कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राजीव गांधी के पास उनसे मिलने का समय ही नहीं होता था। देश का पूर्व केन्द्रीय मंत्री और एक राज्य का पूर्व मुख्यमंत्री जब अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से मिलने के इन्तजार में आठ-आठ घंटे बैठ कर वापस आ जाए तो ऐसे इंसान का सम्मान और अपमान आसानी से समझा जा सकता है। 

1991 के चुनाव में तो उन्हें पार्टी ने लोकसभा का टिकट ही नहीं दिया था। राजीव गांधी की हत्या के बाद जब उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया, वो उनकी किस्मत का ही खेल था। टिकट न मिलने से निराश होकर नरसिंह राव ने तो तब दिल्ली छोड़ने का ही मन बना लिया था। राजीव गांधी के आकस्मिक निधन के बाद चूंकि सोनिया गांधी ने उत्तराधिकार की किसी भी तरह की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया था। और अनेक गुटों में बंटी कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद के दावेदारों की संख्या भी एक दर्जन से कुछ ज्यादा ही हो गई थी। 

इसलिए सभी गुटीय नेताओं ने एक स्वर से नरसिंह राव के नाम पर इसलिये भी सहमति दे दी थी क्योंकि सभी को लगता था जब कभी उनके नाम का अवसर आया तो नरसिंह राव खेमा उनका ही समर्थन करेगा। कुल मिला कर नरसिंह राव ने पूरे पांच साल कांग्रेस अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री के रूप में जो शानदार पारी खेली उसी वजह से आज कांग्रेस पार्टी जिन्दा भी है वरना राजीव गांधी के निधन के बाद पार्टी में अफरा-तफरी का जो माहौल बन गया था उसमें पार्टी वहीँ तक सीमित होकर रह जाती। यही हालत आर्थिक रूप से देश की भी हो गई थी।