बांका जिले की रघुनाथपुर पंचायत इन दिनों बिहार ही नहीं, पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल बन कर उभरी है। इस क्षेत्र में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजना के लिए गतिविधियां तेज़ होने की खबरों के बीच यहाँ के आदिवासी समुदाय और ग्रामीणों ने अपने जंगलों की रक्षा के लिए ढोल-मांदर के साथ मोर्चा संभाला है। जल-जंगल-जमीन की हकदारी और आदिवासी अस्मिता के अस्तित्व से जुड़ा यह स्थानीय विरोध तथाकथित नए भारत में तेजी से लागू किए जा रहे विकास के पूंजीवादी मॉडल पर एक और गहरा लोकतांत्रिक सवाल है।
40 डिग्री से अधिक तापमान वाली भीषण गर्मी और के बावजूद ग्रामीण जंगलों की निगरानी कर रहे हैं। उनका कहना है कि बिना उनकी सहमति के बगैर उनकी ज़मीन, जंगल और भविष्य का फैसला नहीं किया जा सकता। रघुनाथपुर पंचायत का मंजर केवल एक आंदोलन का मंजर नहीं है, यह उस समाज की बेचैनी का प्रतीक है, जिसे लगता है कि उसकी आवाज़ विकास की चमक-दमक में ओझल की जा रही है।
मैं स्वयं इसी क्षेत्र के भितिया का निवासी हूं। यह लेख किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, अपने समाज और अपने भविष्य के पक्ष में लिखा गया एक नागरिक प्रतिवाद है। इस उम्मीद के साथ कि प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा के विरोध में उठी यहाँ के स्थानीय नागरिकों की आवाज पूरे देश के सरोकारधर्मी नागरिकों की आवाज बनेगी; और सरकार इस परियोजना को रद्द करेगी।
रघुनाथपुर पंचायत का भूगोल केवल नक्शे पर खींची गई सीमाओं का नाम नहीं है। यहाँ के जंगल स्थानीय लोगों की अर्थव्यवस्था, सामाजिकता, संस्कृति यानि जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। महुआ, साल, सखुआ और अन्य वन संसाधन केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि आजीविका और सामाजिक जीवन की धुरी हैं। आदिवासी समाज के लिए जंगल हाट-बाज़ार भी है, दवा भी, देव-स्थान भी और इतिहास भी।
यही कारण है कि जब परमाणु ऊर्जा परियोजना की संभावना सामने आती है तो स्थानीय लोगों के मन में अकेले भूमि-अधिग्रहण का सवाल नहीं उठता, बल्कि यह चिंता भी उभरती है कि क्या आने वाले वर्षों में इस पूरे क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना बदल जाएगी? क्या बाहरी आबादी और बड़े औद्योगिक ढांचे आने से यहाँ स्थानीय पहचान पर दबाव बढ़ेगा? इन प्रश्नों का उत्तर केवल आर्थिक आँकड़ों से नहीं दिया जा सकता।
ग्रामीणों का एक महत्वपूर्ण सवाल वन-भूमि को लेकर भी है। मैंने अपनी आंखों से देखा और महसूस किया है कि कैसे वर्षों तक सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए वन-क्षेत्र से अनुमति नहीं मिली। ऐसे में सवाल ये है कि जहां सड़क बनाने के लिए जमीन आवंटित नहीं होती थी, वहां इतनी बड़ी ऊर्जा परियोजना की दिशा में प्रक्रियाएं इतनी तेज़ कैसे दिखाई दे रही हैं? इस प्रश्न का उत्तर सरकार को तथ्यों और पारदर्शिता के साथ देना चाहिए। लोकतंत्र में ऐसे सवाल विकास-विरोधी नहीं, बल्कि संविधान-सम्मत जिम्मेदारी और जवाबदेही की मांग हैं।
रघुनाथपुर पंचायत का आंदोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मुआवज़े की रकम बढ़ाने का आंदोलन नहीं है। यह जल, जंगल और ज़मीन पर हकदारी और स्थानीय पहचान की रक्षा का आंदोलन है।
यहां ढोल – मांदर जैसे सांस्कृतिक प्रतीक लोकतांत्रिक प्रतिरोध की आवाज़ बन गए हैं। अफसोस यह है कि मुख्यधारा मीडिया में इस आंदोलन को वह स्थान नहीं मिला, जिसका वह हकदार था। महानगरों में शेयर बाज़ार की हर हलचल खबर बन जाती है, लेकिन जब आदिवासी समुदाय अपने जंगल और पहचान बचाने के लिए सड़क पर उतरता है, तो उसकी आवाज़ अक्सर राष्ट्रीय विमर्श के किनारे छूट जाती है।
किसी भी परमाणु परियोजना के लिए विशाल भूमि, बड़ी मात्रा में पानी और कड़े सुरक्षा ढांचे की जरूरत होती है। ऐसी परियोजनाएं स्थानीय आबादी की सामाजिक संरचना, आजीविका और पर्यावरण पर दीर्घकालिक असर डालती हैं।
विशेषज्ञों के बीच परमाणु कचरे (रेडियोधर्मी अपशिष्ट) के सुरक्षित निपटान, दुर्घटना का जोखिम, जल स्रोतों पर दबाव और स्थानीय जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर लगातार बहस होती रही है। रघुनाथपुर पंचायत जैसे वन और आदिवासी बहुल क्षेत्र में यह चिंता और गहरी हो जाती है, क्योंकि यहां सवाल केवल एक बिजलीघर का नहीं, बल्कि सदियों से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जी रहे समाज के भविष्य का है।
यदि परियोजना आगे बढ़ती है, तो सरकार की जिम्मेदारी केवल बिजली पैदा करना नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों का विश्वास जीतना, पर्यावरणीय प्रभावों का पारदर्शी आकलन करना और संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा करना भी होगा। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा विरोधाभास पानी के प्रश्न पर दिखाई देता है।
खबरें बताती हैं कि प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध कराने की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है। क्योंकि ऐसे संयंत्रों के संचालन के लिए निरंतर और बड़े जल स्रोत की आवश्यकता होती है। लेकिन रघुनाथपुर पंचायत और आसपास के इलाकों के किसानों का अनुभव बिल्कुल अलग रहा है। आज़ादी के लगभग आठ दशक बाद भी खेत वर्षा पर निर्भर हैं। सिंचाई की स्थायी व्यवस्था का अभाव है और किसान हर मौसम में आसमान की ओर देखकर खेती करने को मजबूर हैं।
यही विडंबना ग्रामीणों के मन में विकास को लेकर प्रश्न पैदा करती है कि जिस राज्य की योजनाएं दशकों में किसानों के खेत तक पर्याप्त सिंचाई का पानी नहीं पहुंचा सकीं, वह अब एक विशाल औद्योगिक परियोजना के लिए पानी की व्यवस्था करने में इतनी सक्रिय कैसे दिखाई दे रही है? यह प्रश्न केवल संसाधनों का नहीं, बल्कि विकास की प्राथमिकताओं का है।
यह पूरा घटनाक्रम हमें झारखंड के गोड्डा की भी याद दिलाता है। वहां स्थापित ताप विद्युत परियोजना को लेकर वर्षों से स्थानीय समुदायों और सामाजिक संगठनों ने भूमि-अधिग्रहण, पर्यावरणीय प्रभाव, स्थानीय रोजगार और विकास के वादों पर प्रश्न उठाए हैं। गोड्डा का अनुभव यह सिखाता है कि किसी भी बड़ी परियोजना की सफलता केवल मेगावाट से नहीं मापी जा सकती, उसे इस आधार पर भी परखा जाना चाहिए कि स्थानीय समाज कितना सम्मान, सुरक्षा और भागीदारी महसूस करता है।
1991 के बाद भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की राह पकड़ी। इस बदलाव के जरिए आर्थिक अवसरों के नए द्वार खोलने का दावा किया गया, लेकिन इसके साथ संसाधनों पर नियंत्रण और विकास की दिशा को लेकर नए सवाल भी पैदा हुए। देश के अनेक हिस्सों में बड़े उद्योगों, खनन परियोजनाओं, बांधों और ऊर्जा संयंत्रों के खिलाफ जन आंदोलन हुए। लेकिन उनकी आवाज़ को वाजिब महत्व नहीं दिया गया। यह इतिहास हमें सिखाता है कि विकास तभी टिकाऊ होता है, जब वह संवाद, सहमति और न्याय पर आधारित हो।
महात्मा गांधी ने कहा था कि किसी भी नीति का मूल्यांकन उस आख़िरी व्यक्ति की दृष्टि से किया जाना चाहिए, जो सबसे कमजोर है। आज प्रश्न यह है कि क्या रघुनाथपुर पंचायत का आदिवासी और किसान उस विकास-यात्रा में बराबर का सहभागी है, या केवल एक आंकड़ा बनकर रह गया है?
इस टिप्पणी के जरिए मेरा विरोध विकास की उस दृष्टि का है, जिसमें स्थानीय समाज की आशंकाओं को सुने बिना भविष्य की इमारत खड़ी करने की जल्दबाज़ी दिखाई देती है। विकास अगर लोगों का विश्वास खोकर आगे बढ़े, तो वह प्रगति कम और सामाजिक तनाव अधिक पैदा करता है।
रघुनाथपुर पंचायत में सुनाई दे रहा प्रतिरोध का सुर आज केवल अपने जंगल की रक्षा नहीं कर रहा है, वह भारतीय लोकतंत्र से ये सवाल पूछ रहा है कि क्या विकास का अर्थ केवल निवेश, उत्पादन और बिजली है, या उसमें मनुष्य, प्रकृति, संस्कृति और संविधान की मूल संकल्पना भी शामिल है?
(राजेश कुमार टीवी पत्रकार हैं)
