मायावती ने जन्मदिन पर जारी किया ‘मेरे संघर्षमय जीवन और बीएसपी मूवमेंट का सफरनामा’

बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम को उत्तर भारत में दलित चेतना के विकास और दलितों को राजनीतिक रूप से गोलबंद करने का श्रेय जाता है। उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रहने वाली मायावती बसपा के मिशन और आंदोलन को आगे बढ़ाने की कौन कहे बचाने तक में असफल रहीं।

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा अध्यक्ष मायावती का आज 65वां जन्मदिन है। मायावती ने अपने जन्मदिन को कार्यकर्ताओं से सादगी और जनकल्याणकारी दिवस के रूप में मनाने की अपील की है। ऐसा नहीं है कि मायावती सादगी पसंद करती हैं इसलिए ऐसी अपील की हैं। मुख्यमंत्री रहते समय महारानियों की तरह रहने वाली मायावती के सादगी से जन्मदिन मनाने की अपील करने का तात्कालिक कारण कोरोना महामारी है। लेकिन इस सादगी के पीछे की वजह राजनीतिक है।

फिलहाल, बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने जन्मदिन के अवसर पर ‘मेरे संघर्षमय जीवन और बीएसपी मूवमेंट का सफरनामा, भाग-16’ और इसका अंग्रेजी संस्करण ‘ए ट्रैवलॉग ऑफ माइ स्ट्रगल रिडन लाइफ एंड बीएसपी मूवमेंट, वॉल्यूम 16’ जारी किया।

राजनीतिक व्यक्तियों के बारे में यह आम धारणा है कि वे अपने जीवन,राजनीति और संघर्षों को अपने अंतिम समय में लिखते-लिखवाते हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या मायावती अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम दौर में प्रवेश कर चुकी हैं?

इस सवाल का जवाब पाने के लिए हमें जन्मदिन के मौके पर मायावती ने प्रेस कांफ्रेन्स के दौरान कहे गए शब्दों पर गौर करना होगा। मायावती ने प्रेस कांफ्रेन्स में कहा कि पार्टी के लोग कोरोना वायरस महामारी के चलते पूरी सादगी से और कोविड-19 संबंधी नियमों का पालन करते हुए मेरा जन्मदिन मनाएं। इस दौरान उन्होंने कोरोना वैक्सीनेशन, किसान आंदोलन, यूपी और उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा चुनाव जैसे तमाम मुद्दों पर अपनी राय रखी।

किसान आंदोलन को लेकर मायावती ने कहा कि सरकार को किसानों की बात मान लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को गरीबों को कोरोना वैक्सीन मुफ्त में देनी चाहिए। इतना ही नहीं मायावती ने सबसे बड़ा एलान करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में होने वाले विधानसभा चुनाव में बीएसपी किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेगी। उन्होंमने ये भी कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव में बसपा की जीत तय है।

लेकिन क्या यह सही है? क्या उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में बसपा की जीत पक्की है? मायावती की राजनीतिक स्थिति और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए इसमें कितनी सच्चाई है। लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है। मायावती देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रही हैं। यह अजीब बात है कि उत्तर प्रदेश का कोई भी मुख्यमंत्री अपने को देश के प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानता रहा है।

मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए मायवाती भी अपने को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करती रही हैं। इसके लिए वह स्वयं और उनकी पार्टी बहुजन समाज पार्टी दलित कार्ड भी खेलती रही है। दलित अस्मिता के बल पर मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती और बसपा ने राजनीति में “बहुजन बनाम मनुवाद” का नैरेटिव बुलंद किया।

बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम को उत्तर भारत में दलित चेतना के विकास और दलितों को राजनीतिक रूप से गोलबंद करने का श्रेय जाता है। कांशीराम का मिशन दलितों को वोट देने वालों के बदले सरकार चलाने वाला बनाने की थी। दूसरे राज्यों में तो नहीं लेकिन उत्तर प्रदेश में वह कामयाब रहे। मायावती कांशीराम और बसपा की उत्तराधिकारी बनी। चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहने वाली मायावती ने पहले बसपा के मिशन और आंदोलन को आगे बढ़ाने की कौन कहे बचाने तक में सफल नहीं हो सकीं।

मायावती अपने जन्मदिन के अवसर पर सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रही हैं। देश भर के नेता उन्हें शुभकामना संदेश दे रहे हैं। शुभकामना संदेश देने वालों में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव शामिल हैं।

मायावती का जन्म 15 जनवरी, 1956 को हुआ था। उनके पिता प्रभु दास डाकघर कर्मचारी थे। मायावती के 6 भाई एवं 2 बहनें हैं। उन्होंने 1975 में दिल्ली विश्वविद्यालय के कालिंदी कालेज से कला में स्नातक की। 1976 में उन्होंने मेरठ विश्वविद्यालय से बी.एड और 1983 में दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई की।

राजनीति में प्रवेश से पहले वह दिल्ली के एक स्कूल में शिक्षण कार्य करती थी। इसके अलावा वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के परीक्षाओं की तैयारी भी करती थी। लेकिन वह डीएसफोर के आंदोलन से जुड़ी थीं। सन् 1977 में स्कूल से दूर स्थानांतरण हो जाने के बाद वह कांशीराम से स्थानांतरण रूकवाने के सिलसिले में मिलीं। लेकिन कांशीराम ने इस संदर्भ में कोई सहायता करने में अपने को असमर्थ बताते हुए मायावती को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया।

कांशीराम के सम्पर्क में आने और डीएसफोर के मिशन को जानने के बाद मायावती ने एक पूर्ण कालिक राजनीतिज्ञ बनने का निर्णय ले लिया। सन् 1984 में बसपा की स्थापना के समय से ही मायावती कांशीराम के कोर टीम का हिस्सा रहीं।

मायावती पहली बार 1989 में बिजनौर लोकसभा (सु) उत्तर प्रदेश से संसद सदस्य निर्वाचित हुईं। 1994 में उत्तर प्रदेश से राज्य सभा के लिए निर्वाचित हुईं और उसके एक साल बाद ही 3 जून, 1995 में वह भाजपा के समर्थन से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के पद की शपथ ली। इस तरह वह भारत में प्रथम दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं।

First Published on: January 15, 2021 4:44 PM
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