BAP ने बुलंद की भील प्रदेश की मांग, 108 साल पुरानी मांग से तीन राज्यों की राजनीति पर असर

भील प्रदेश की मांग करने वालों का कहना है कि मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में भीलों की जितनी आबादी है, वो कई राज्यों से अधिक है। ऐसे में उसे नया राज्य मिलना चाहिए, जिससे वहां के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ भील आदिवासियों को मिल सके।

लोकसभा चुनाव 2024 से पहले गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भील प्रदेश की मांग तेज हो गई है। 108 साल पुरानी इस मांग को भारतीय आदिवासी पार्टी (बीएपी) ने नए सिरे से उठाया है। विधानसभा चुनाव में बीएपी की परफॉर्मेंस ने इस मांग को मजबूती भी दी है।

राजस्थान में बीएपी को 3 और मध्य प्रदेश में 1 सीट पर जीत मिली है। बीएपी राजस्थान विधानसभा की 4 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही। बांसवाड़ा-डूंगरपुर इलाके में पार्टी का वोट प्रतिशत 27 के आसपास रहा।

कहा जा रहा है कि आने वाले वक्त में भील प्रदेश की मांग बीजेपी की परेशानी बढ़ा सकती है। इसकी 2 वजहें भी हैं। पहला, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बीजेपी की ही सरकार है। इन तीनों राज्यों में आदिवासियों की संख्या लगभग 4.4 करोड़ है। दूसरा, तीनों ही राज्यों में आदिवासियों के लिए 13 सीटें रिजर्व है। 2019 में इन 13 सीटों पर बीजेपी को एकतरफा जीत मिली थी।

भील प्रदेश की मांग क्या है?

भील द्रविड़ का वील शब्द से बना हुआ है, जिसका मतलब होता है- धनुष। भारत में भील सबसे पुरानी जनजाति है, जिसकी आबादी करीब 1 करोड़ के आसपास है। भील जनजाति के लोग अपने लिए लंबे वक्त से अलग प्रदेश की मांग कर रहे हैं।

साल 1913 में पहली बार मानगढ़ में समाजिक कार्यकर्ता और खानाबदोश बंजारा जनजाति के गोविंदगिरी ने अपने 1500 समर्थकों के साथ अलग प्रदेश की मांग रखी थी। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था।

रिहा होने के बाद गोविंदगिरी के नेतृत्व में उनके समर्थकों ने मानगढ़ के पास बड़ा आंदोलन किया। आंदोलन को खत्म करने के लिए स्थानीय प्रशासन ने अंग्रेजों से सहायता मांगी। इसके बाद की पुलिसिया कार्रवाई में कई भील आदिवासी मारे गए थे।

घटना के बाद गोविंदगिरी और पुंजा धीरजी को गिरफ्तार कर अंडमान जेल भेज दिया गया। आजादी के वक्त भी भील प्रदेश की मांग को लेकर सुगबुगाबहट हुई, लेकिन शुरू में इस मांग को ज्यादा तरजीह नहीं दी गई।

इसके बाद वक्त-वक्त पर भील प्रदेश की मांग को लेकर आंदोलन होता रहता है।

भील प्रदेश की मांग क्यों, 3 वजहें

दास ग्रामीण विकास केंद्र ने 2008 में एक सर्वे किया था। इसके मुताबिक भील जनजातियों के 80 प्रतिशत परिवार पलायन से त्रस्त हैं। परिवार के अधिकांश सदस्यों को पैसा कमाने के लिए बाहर जाना पड़ता है।

आदिवासी नेताओं का कहना है कि तमिल के लिए तमिलनाडु, मराठाओं के लिए महाराष्ट्र का गठन हो सकता है, तो भीलों के लिए भील प्रदेश का गठन क्यों नहीं हो सकता है?

भील प्रदेश की मांग करने वालों का कहना है कि मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में भीलों की जितनी आबादी है, वो कई राज्यों से अधिक है। ऐसे में उसे नया राज्य मिलना चाहिए, जिससे वहां के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ भील आदिवासियों को मिल सके।

किन-किन जगहों को शामिल करने की मांग हो रही है?

भील प्रदेश में गुजरात उत्तर पूर्व, राजस्थान के दक्षिण और मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग को शामिल करने की मांग की जा ही है। जिलों के हिसाब से देखा जाए, तो इसमें करीब 20 जिलों का पूर्ण हिस्सा और 19 जिलों का आंशिक हिस्सा शामिल किए जाने की मांग की जा रही है।

राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, प्रतापगढ़, सिरोही, राजसमंद और चित्तौड़गढ़, जालोर-बाड़मेर-पाली इलाके में भील प्रदेश की मांग समय-समय पर उठती रही है। इसी तरह मध्य प्रदेश के अलीराजपुर, झाबुआ जैसे जिले में इसकी अलग प्रदेश बनाने की मांग खूब होती है।

मांग के हिसाब से देखा जाए तो भील प्रदेश में लोकसभा की 11 और विधानसभा की 90 सीटें की आ सकती हैं। यानी इसका स्वरूप छत्तीसगढ़ से मिलता-जुलता है।

भील प्रदेश की मांग में तेजी क्यों?

मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में आदिवासियों की आबादी काफी ज्यादा है, लेकिन इन राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आदिवासी काफी पिछड़ा हुआ है। रिजर्व सीट से बाहर आदिवासी उम्मीदवार जीत नहीं पाते हैं।

इन राज्यों के बड़े पदों पर भी आदिवासियों का प्रतिनिधित्व काफी कम है। लंबे वक्त से इन राज्यों में मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी आदिवासी नेता को नहीं मिली है। भील प्रदेश की मांग में तेजी की यह भी एक मुख्य वजह है।

भारत में कैसे होता है राज्यों का गठन?

भारत के संविधान में राज्य के पुनर्गठन या गठन का अधिकार केंद्र को दिया गया है। केंद्र सरकार संसद में प्रस्ताव लाकर राज्यों का गठन कर सकती है। संविधान के अनुच्छेद-3 में केंद्र को इसका अधिकार दिया गया है।

केंद्र सरकार राज्य पुनर्गठन आयोग 1955 की सिफारिश के आधार पर राज्यों का गठन करती है।भारत में आखिरी बार लद्दाख का पुनर्गठन हुआ था। 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था।

भारत के संविधान में राज्य गठन की वजह का साफ-साफ जिक्र नहीं किया गया है। आमतौर पर 4 आधार पर अब तक राज्यों का गठन किया गया है।

1. गांवों का तत्व के आधार पर-किसी भी सीमा का बंटवारा गांवों के तत्व के आधार पर भी किया जाता है। इसमें गांव के भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक संरचनाएं देखी जाती है। अंतिम फैसला केंद्र का ही होता है।

2. भौगोलिक निकटता-किसी भी राज्यों के बीच सीमा का बंटवारा भौगोलिक निकटता के आधार पर किया जाता है। केंद्र तय करता है कि दोनों राज्यों के बीच की भौगोलिक निकटता कैसी है?

उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड, मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ और बिहार-झारखंड के बीच भौगोलिक निकटता के आधार पर सीमा का बंटवारा किया गया है।

3. भाषाई आधार पर-साल 1953 में पी श्रीरामुलु ने तेलुगू की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू कर दिया। यह अनशन 56 दिनों तक चली थी जिसके बाद श्रीरामुलु की मौत हो गई थी।

श्रीरामुलु की मौत के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने आंध्र को अलग राज्य बनाने की घोषणा कर दी। मद्रास प्रेसिडेंसी से अलग होकर आंध्र नया राज्य बना।

भाषाई के आधार पर आंध्र प्रदेश के बाद महाराष्ट्र-गुजरात और हरियाणा-पंजाब का बंटवारा किया गया।

4. लोगों की इच्छा के आधार पर-लोगों की इच्छा किसी भी राज्यों के बीच सीमा बंटवारे का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। कुछ हाल ही में लद्दाख और तेलंगाना का बंटवारा इसी आधार पर किया गया है। लोगों की मांग को देखते हुए केंद्र सरकार किसी भी राज्य की सीमा का बंटवारा कर सकती है। तेलंगाना का बंटवारा लोगों की इच्छा के आधार पर ही किया गया था।

 

First Published on: December 15, 2023 11:15 AM
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