अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा आरएसएस-भाजपा सरकार का आत्मसमर्पण है

सीपीआई (एमएल)-न्यू डेमोक्रेसी संयुक्त राज्य अमेरिका-भारत संयुक्त वक्तव्य की कड़ी निंदा करती है, जिसमें अमेरिका–भारत व्यापार पर अंतरिम समझौते के ढांचे की घोषणा की गई है और इसमें शामिल किए जाने वाले प्रमुख शर्तों को बताया गया है। यह वक्तव्य 6 फरवरी 2026 को व्हाइट हाउस द्वारा जारी किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अंतरिम समझौते के ढांचे का स्वागत किया है।

यह ढाँचा भारतीय उद्योग, कृषि और डेयरी क्षेत्रों-वास्तव में पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था-के लिए गंभीर और अशुभ संकेतों से भरा है। यह आरएसएस-बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा अमेरिकी कॉरपोरेट हितों के सामने आत्मसमर्पण की ओर इशारा करता है। भारतीय जनता के साथ इस विश्वासघात से ध्यान भटकाने के लिए सरकार-समर्थक मीडिया उस भारत के नक्शे को उछाल रहा है, जिसे इस घोषणा के लिए अमेरिका ने इस्तेमाल किया है और जिसमें पीओके तथा अक्साई चिन को उसी नक्शे का हिस्सा दिखाया गया है। ट्रम्प द्वारा किए जाने वाले दिखावटी प्रदर्शन को देखते हुए इसका खास अर्थ नहीं है, लेकिन अमेरिका-भारत अंतरिम समझौते का हिस्सा बनने पर जिन प्रमुख शर्तों पर सहमति बनी है, उनके देश की जनता पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे।

यह आत्मसमर्पण कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। इस वर्ष 1 फरवरी को प्रस्तुत केंद्रीय बजट ने भारतीय अर्थव्यवस्था की एक निराशाजनक तस्वीर पेश की-घटती विकास दर, बढ़ता सरकारी कर्ज़, कृषि विकास और रोज़गार सृजन में गिरावट, तथा सामाजिक व्यय में हर स्तर पर कटौती। अपनी आर्थिक उपलब्धियों की पीठ थपथपाने के बावजूद, आरएसएस-बीजेपी सरकार भारतीय अर्थव्यवस्था की बदहाली को छिपा नहीं सकी, जहाँ असंगठित औद्योगिक क्षेत्र और कृषि-जो श्रम के सबसे बड़े नियोक्ता हैं-को सबसे बड़ा झटका लगा है।

आरएसएस-बीजेपी सरकार ने अपने 11 वर्षों से अधिक के शासन में भारतीय अर्थव्यवस्था को जिस दयनीय स्थिति में धकेल दिया है, उसे देखते हुए यह आत्मसमर्पण कोई आश्चर्य नहीं है। वास्तव में, भारतीय सरकार ने अमेरिकी प्रशासन की कई मांगों के आगे घुटने टेक दिए हैं, ठीक वैसे ही जैसे उसने पिछले वर्ष के बजट में किया था। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बार फिर 1991 जैसा क्षण है, और भारतीय शासक वर्ग आर्थिक क्षेत्र में एक बार फिर पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियों के आगे आत्मसमर्पण का रास्ता अपना रहा है, जिसके राजनीतिक निहितार्थ भी होंगे।

इस बार दांव और भी ऊँचे हो सकते हैं, क्योंकि शिकारी वित्तीय पूँजी भारतीय जनता विशेषकर किसानों को निगलने के लिए अपने पंजे तेज कर रही है। आरएसएस-बीजेपी सरकार पहले ही चार श्रम संहिताओं और वीबी-ग्रैमजी (VB-GRAMG) के रूप में शहरी मजदूरों और ग्रामीण मज़दूरों के खिलाफ पूर्ण पैमाने पर हमला शुरू कर चुकी है, जो साम्राज्यवादी देशों के कॉरपोरेट घरानों और उनके दलालों-भारतीय कॉरपोरेट की सेवा में हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प ने 2 फरवरी को भारत से होने वाले आयात पर शुल्क (टैरिफ) की दर घटाकर 18 प्रतिशत किए जाने की घोषणा की थी और इसके पीछे भारतीय सरकार की कई मुद्दों पर कथित प्रतिबद्धताओं का दावा किया था। हालांकि भारतीय सरकार ने शुरुआत में इस टैरिफ कटौती की घोषणा पर केवल ट्रम्प को धन्यवाद देने तक ही खुद को सीमित रखा, लेकिन यह ढांचा उस घोषणा के बाद जनता की सबसे बुरी आशंकाओं की पुष्टि करता है। जहाँ कुछ स्थानों पर जानबूझकर भ्रम पैदा करने की कोशिश की गई है, वहीं इस ढांचे में की गई प्रतिबद्धताएँ परतें हटाकर वास्तविक तस्वीर को साफ़ कर देती हैं।

हालाँकि रूस से तेल ख़रीद रोकने का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन यह प्रतिबद्धता ज़रूर जताई गई है कि “भारत अगले पाँच वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर के ऊर्जा उत्पाद, विमान और विमान के पुर्ज़े, कीमती धातुएँ, प्रौद्योगिकी उत्पाद तथा कोकिंग कोयला ख़रीदने का इरादा रखता है।” पिछले कई महीनों में रूस से तेल ख़रीद में आई गिरावट को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि भारत अमेरिका से अधिक महंगे ऊर्जा उत्पाद ख़रीदने के आगे झुक चुका है। यह प्रक्रिया अचानक नहीं भी हो सकती और चरणबद्ध रूप से आगे बढ़ाई जा सकती है, लेकिन इसकी दिशा पूरी तरह साफ़ कर दी गई है।

इन प्रतिबद्धताओं में सबसे ख़तरनाक प्रतिबद्धता पहली ही है: “भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं तथा अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों की एक व्यापक श्रृंखला पर टैरिफ समाप्त करेगा या कम करेगा, जिनमें सूखे डिस्टिलर्स ग्रेन्स (DDGs), पशु आहार के लिए रेड सोरघम, ट्री नट्स, ताज़े और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स तथा अन्य अतिरिक्त उत्पाद शामिल हैं।”

विशेष रूप से “खाद्य और कृषि उत्पादों की व्यापक श्रृंखला … अतिरिक्त उत्पाद” का उल्लेख बेहद गंभीर है। इस प्रतिबद्धता के आलोक में मोदी और अन्य मंत्रियों द्वारा किसानों के हितों की रक्षा करने या करने का दावा पूरी तरह खोखला साबित होता है। यह याद रखना चाहिए कि तीन काले कृषि क़ानूनों के समय भी मोदी और उनके मंत्रियों ने यही दावा किया था कि वे किसानों के हित में लाए गए हैं।

आरएसएस-बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार भारतीय बाज़ार में भारी सब्सिडी वाले कृषि और डेयरी उत्पाद थोपने की योजना बना रही है, जो नकारात्मक सब्सिडी से जूझ रही संकटग्रस्त भारतीय कृषि को तबाह किए बिना नहीं रह सकता। इसका सीधा असर 17.2 करोड़ कृषि परिवारों पर पड़ेगा, जिनमें से 86 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसान हैं। उद्योग के क्षेत्र में यह अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं के लिए खुली छूट (कार्ते ब्लांश) देने जैसा है, जिससे भारतीय उद्योग का भविष्य गंभीर ख़तरे में पड़ जाएगा।

यह सहमत ढांचा भारतीय जनता के लिए तबाही का संकेत है। यह बात इस समझौते पर राजदूत ग्रीयर द्वारा किए गए दावे से भी साफ़ हो जाती है: “राष्ट्रपति ट्रम्प की सौदेबाज़ी अमेरिका के मज़दूरों और उत्पादकों के लिए दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक को खोल रही है, जिससे सभी अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और कृषि उत्पादों की एक व्यापक श्रृंखला पर टैरिफ घटाए जा रहे हैं।” यह “सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक” वही देश है जिसकी आबादी दुनिया में सबसे अधिक है, जो मानव विकास के कई सूचकों में सबसे निचले पायदान पर है, और जहाँ बेहद ग़रीब, बेसहारा तथा बुनियादी मानवीय जीवन से वंचित लोगों की संख्या दुनिया में सबसे ज़्यादा है।

भारत ने ब्रिटेन के साथ एक द्विपक्षीय व्यापार समझौता किया है, यूरोपीय संघ के साथ तथाकथित “मदर ऑफ़ ऑल डील्स” किया है, और अब यह अंतरिम समझौते का यह ढांचा-जो आगे चलकर “फादर ऑफ़ ऑल डील्स” की ओर ले जाता है-यह साफ़ दिखाता है कि भारत साम्राज्यवादियों के लिए एक खुला शिकारगाह बन चुका है।

भारत पर शासन कर रही सरकार न तो भारत के हितों की रक्षा कर रही है और न ही वह अपने मेहनतकश लोगों के हितों की रक्षा करने में सक्षम है। यह एक निर्लज्ज विश्वासघात है, जिसे खुलकर बेनकाब किया जाना चाहिए। इसकी बातचीत और सौदेबाज़ी के लिए ज़िम्मेदार लोग-यानी मोदी सरकार, जिसमें वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल भी शामिल हैं-को जनता के सामने जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

यह ढांचा भारत, उसकी ज़मीन और प्राकृतिक संसाधनों तथा उसकी सस्ती मज़दूरी से पैदा होने वाले उत्पादों की पूरी तरह से बिक्री (सेल-आउट) की ओर ले जाएगा। आरएसएस ने जानबूझकर औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ भारतीय जनता के संघर्ष से खुद को अलग रखा था-उस संघर्ष से जिसमें लाखों लोगों ने अपने प्राण न्योछावर किए, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में, और उससे पहले तथा बाद के विद्रोहों में; एक ऐसे संघर्ष में जिसमें हज़ारों लोगों को फाँसी दी गई और दसियों हज़ारों को जेलों में बंद किया गया। आरएसएस के लिए औपनिवेशिक शासन का अंत कोई मायने नहीं रखता था। साम्राज्यवाद का विरोध आरएसएस की शब्दावली में है ही नहीं। वे भारत को मिली जो भी आज़ादी है, उसे नष्ट करने पर आमादा हैं।

इस ढांचे की सामग्री और आरएसएस-बीजेपी सरकार द्वारा जिन शर्तों पर सहमति दी गई है, उनके निहितार्थ जनता के सामने लाए जाने चाहिए। भारत के मज़दूर और किसान 12 फरवरी को देशव्यापी हड़ताल और विरोध प्रदर्शनों का आयोजन कर रहे हैं। इस समझौते के ख़तरे को इस हड़ताली संघर्ष के प्रचार का एक अहम हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

सीपीआई (एमएल)–न्यू डेमोक्रेसी इस ढांचा समझौते के प्रावधानों की जन-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी बताते हुए कड़ी निंदा करती है और सभी विपक्षी दलों, विशेषकर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठनों, से आह्वान करती है कि वे मज़बूत प्रतिरोध खड़ा करें ताकि इस ढांचे को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया जाए।

अब कार्रवाई की ज़रूरत बहुत देर से महसूस की जा रही है। कार्रवाई का समय अब है।

(सीपीआई (एम-एल) न्यू डेमोक्रेसी की विज्ञप्ति)

First Published on: February 8, 2026 10:17 AM
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