IGNCA के सदस्य-सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी को पद से हटाने की मांग, सांसद और विधायक ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र

नई दिल्ली। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के सदस्य-सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी को पद से हटाने की मांग को लेकर बिहार के बक्सर से लोकसभा सांसद सुधाकर सिंह और उत्तर प्रदेश के गाजीपुर की जमानियां विधानसभा सीट से विधायक एवं पूर्व मंत्री ओमप्रकाश सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। वहीं, ‘जनतंत्र समाज’ (सिटिजन्स फॉर डेमोक्रेसी) की ओर से भी डॉ. जोशी को भारतीय विरासत संस्थान के कुलपति का अतिरिक्त कार्यभार सौंपे जाने का विरोध किया गया है।

सुधाकर सिंह ने अपने पत्र में डॉ. जोशी के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति रहने के दौरान हुई शिक्षक नियुक्तियों का मुद्दा उठाया है। पत्र में आरोप लगाया गया है कि कुछ ऐसे अभ्यर्थियों को भी साक्षात्कार के लिए बुलाया गया, जिन्हें विश्वविद्यालय की स्क्रूटिनी कमेटी ने अयोग्य पाया था। साथ ही नियुक्ति प्रक्रिया में निर्धारित 80 प्रतिशत अकादमिक एवं अनुभव तथा 20 प्रतिशत साक्षात्कार के मानदंड के पालन पर भी सवाल उठाए गए हैं।

पत्र में कुछ अभ्यर्थियों को निर्धारित मानदंड से अधिक अंक दिए जाने और कुछ उम्मीदवारों को कम अंक दिए जाने का भी उल्लेख है। उच्च शिक्षा विभाग की तथ्यात्मक टिप्पणी में आशुतोष मंडावी और शैलेन्द्र खंडेलवाल के अंकों से संबंधित आपत्तियों का जिक्र किया गया है। विभागीय रिपोर्ट के अनुसार, पंकज नयन पाण्डेय को साक्षात्कार में बुलाकर चयन किया गया था, जबकि विभाष झा को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था, लेकिन उनका चयन नहीं हुआ।

पत्र में तत्कालीन सामान्य प्रशासन विभाग की सचिव निधि छिब्बर की जांच का भी हवाला दिया गया है। इसमें डॉ. जोशी के कार्यकाल में भर्ती संबंधी यूजीसी के नियमों और विनियमों के पालन पर सवाल उठाए जाने की बात कही गई है।

लोकायुक्त की अनुशंसा का हवाला

सुधाकर सिंह के पत्र में छत्तीसगढ़ लोक आयोग (लोकायुक्त) की जांच और उसकी अनुशंसा का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि नियुक्ति प्रक्रिया में चयन मानदंडों की अनदेखी, अयोग्य अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में शामिल किए जाने और अंकों के निर्धारण में अनियमितताओं पर आपत्तियां सामने आई थीं। लोक आयोग ने तत्कालीन कुलपति एवं चयन समिति के अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानंद जोशी के विरुद्ध प्रथम दृष्टया तथ्य प्रमाणित पाए जाने पर छत्तीसगढ़ लोक आयोग अधिनियम, 2002 की धारा 11(1) के तहत विधि अनुसार कार्रवाई की अनुशंसा की थी।

सांसद ने सवाल उठाया है कि ऐसी अनुशंसा के बावजूद डॉ. जोशी को आईजीएनसीए का सदस्य-सचिव और भारतीय विरासत संस्थान, नोएडा का कुलपति का दायित्व कैसे दिया गया। उन्होंने डॉ. जोशी के कार्यकाल में आईजीएनसीए में हुई नियुक्तियों, संविदा नियुक्तियों, आरक्षण रोस्टर, खरीद, निविदाओं, निर्माण, वित्तीय स्वीकृतियों और अन्य प्रशासनिक एवं वित्तीय मामलों की जांच की मांग की है।

सुधाकर सिंह ने प्रधानमंत्री से डॉ. जोशी को आईजीएनसीए के सदस्य-सचिव तथा भारतीय विरासत संस्थान के कुलपति पद से तत्काल मुक्त करने, उनके कार्यकाल से संबंधित अभिलेख सुरक्षित कराने और उनके महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं वित्तीय निर्णयों की समीक्षा करने की मांग की है।

ओमप्रकाश सिंह ने लगाए 14 आरोप

जमानियां के विधायक एवं पूर्व मंत्री ओमप्रकाश सिंह ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर डॉ. जोशी को पद से हटाने की मांग की है। पत्र में उन्होंने आईजीएनसीए के वाराणसी क्षेत्रीय केंद्र में नियुक्तियों, आरक्षण रोस्टर और वाराणसी स्थित गांधी विद्या संस्थान से जुड़े मामलों की जांच की मांग की है। उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ संस्कृति मंत्रालय, गृह मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार तथा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोगों को भी पत्र भेजकर कार्रवाई की मांग की है।

ओमप्रकाश सिंह ने आरोप लगाया है कि वाराणसी केंद्र में वर्ष 2024-25 की भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण रोस्टर की अनदेखी की गई और कुछ अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ दिया गया। उन्होंने इस भर्ती प्रक्रिया को निरस्त कर जांच कराने की मांग की है। हालांकि, ये सभी आरोप विधायक द्वारा प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र में लगाए गए हैं।

पत्र में आईजीएनसीए के अन्य क्षेत्रीय केंद्रों में नियुक्तियों, पदोन्नति, वित्तीय मामलों और संविदा नियुक्तियों को लेकर भी जांच की मांग की गई है। साथ ही डॉ. जोशी के रायपुर स्थित विश्वविद्यालय के कार्यकाल से जुड़े पुराने मामलों का भी उल्लेख किया गया है।

दो संस्थानों का अतिरिक्त प्रभार देने पर सवाल

‘जनतंत्र समाज’ (सिटिज़न्स फॉर डेमोक्रेसी) की ओर से प्रो. आनंद कुमार ने भी डॉ. जोशी को भारतीय विरासत संस्थान के कुलपति का अतिरिक्त कार्यभार सौंपे जाने का विरोध किया है। संगठन के अनुसार, डॉ. जोशी पहले कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के कुलपति रहे हैं और वहां शिक्षक नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर छत्तीसगढ़ लोकायुक्त की आपत्तियों का हवाला दिया गया है।

संगठन ने यह भी सवाल उठाया है कि आईजीएनसीए और भारतीय विरासत संस्थान जैसे दोनों महत्वपूर्ण संस्थानों की जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति को क्यों दी गई है। उसने सरकार से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है।

सिटिज़न्स फॉर डेमोक्रेसी का ज्ञापन

जनतंत्र समाज (सिटिज़न्स फॉर डेमोक्रेसी) ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी को भारतीय विरासत संस्थान के कुलपति का अतिरिक्त कार्यभार सौंपे जाने का कड़ा विरोध करता है। अब डॉ. जोशी दोनों पद पर बने रहेंगे। विगत मार्च 2026 में सरकार ने यह निर्णय लिया।

यह बताना जरूरी है कि 2016 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सदस्य सचिव का कार्यभार संभालने से पहले डॉ. जोशी रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति थे और विश्वविद्यालय में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया के लिए बनाई गई चयन समिति के अध्यक्ष थे। उन्होंने अभ्यर्थियों की निर्धारित पात्रता, अकादमिक उपलब्धियों और अनुभव की अनदेखी कर के कुछ ऐसे व्यक्तियों को साक्षात्कार में बुलाया जिन्हें विश्वविद्यालय की स्क्रूटिनी समिति ने अयोग्य ठहराया था। उनकी मनमानी के कारण अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्ति की गई।

छत्तीसगढ़ लोकायुक्त आयोग ने इस मामले की जांच कर के डॉ. जोशी की निगरानी में की गई नियुक्तियों पर आपत्ति जताई थी और अयोग्य पाए गए पूर्व चयनित उम्मीदवारों के खिलाफ विधि अनुसार कार्रवाई करने की सिफारिश की थी। डॉ. सच्चिदानंद जोशी के ख़िलाफ़ यह भी आक्षेप है कि वाराणसी में कला केन्द्र के लिए संविदा पर नियुक्ति करने में उन्होंने आरक्षण रॉस्टर को नज़रअंदाज़ किया था।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र और भारतीय विरासत संस्थान, दोनों महत्वपूर्ण संस्थान हैं और पूरा समय माँगते हैं। यह विचारणीय है कि दोनों संस्थानों को एक ही व्यक्ति के हवाले क्यों कर दिया गया है।

दरअस्ल, होना तो यह चाहिए था कि छत्तीसगढ़ लोकायुक्त की कड़ी आपत्ति के बाद डॉ. जोशी को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में सदस्य सचिव के पद पर लाना ही नहीं चाहिए था और उनके ख़िलाफ़ उचित कार्यवाही करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा लग रहा है कि सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने उनके ख़िलाफ़ सिद्ध हो चुके आरोपों को न सिर्फ़ ठुकरा दिया, बल्कि उनकी योग्यता का आधार माना। मानो, इतना काफी न हो, डॉ. जोशी को भारतीय विरासत संस्थान के कुलपति भी बना दिया गया है जिसकी निंदा होनी चाहिए। हम सरकार से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने का अनुरोध करते हैं।

First Published on: August 25, 2026 8:57 AM
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