नई दिल्ली। साहित्य अकादेमी सभागार में 24 जनवरी, 2026 को केरल के हिन्दी साहित्यकार ए अरविंदाक्षन अरुणाचल प्रदेश की युवा कवयित्री जमुना बीनी को ‘तथागत साहित्य सम्मान’ प्रदान किया गया। समारोह’ का आरंभ महाकवि निराला रचित सरस्वती वंदना ‘वर दे वीणावादिनी वर दे…’ पर केंद्रित कथक प्रस्तुति से हुई। यह प्रस्तुति कथक नृत्यांगना गौरी दिवाकर की तीन शिष्याओं गान्या, कृति और तनुजा ने दी।
तथागत ट्रस्ट के संरक्षक डॉ. एन. पी. सिंह (पूर्व आई.ए.एस.) ने केरल से आए साहित्यकार ए अरविंदाक्षन और सूदूर पूर्वोत्तर से आईं जमुना बीनी सहित सभी गणमान्य अतिथियों का अभिनन्दन किया और ट्रस्ट की परिकल्पना और गतिविधियों के बारे में बतलाया। उन्होंने कहा कि तथागत ट्रस्ट शिक्षा, कौशल विकास और समावेशी प्रगति के लिए समर्पित एक संस्था है जो पिछड़े और वंचित समुदायों के सामाजिक और शैक्षणिक उत्थान के लिए, शिक्षा के माध्यम से उनके जीवन में बदलाव के लिए और भारत की मुख्य धारा से उन्हें जोड़ने के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रहा है। इसने छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों तथा राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बावरिया समुदाय के लोगों के लिए शिक्षा, सामाजिक न्याय और बदलाव के लिए काम किया है।
ट्रस्ट की विभिन्न संस्थाओं से जुड़े अनेक लोग उच्च शिक्षा, सिविल सेवा, बैंकिंग, राजनीति आदि क्षेत्रों में लगातार रोजगार और पहचान प्राप्त कर रहे हैं। डॉ. सिंह ने बताया कि गौतम बुद्ध के जीवन से मानवीय सद्भाव, वंचितों के कल्याण और उत्थान की सीख लेते हुए ही संस्था का नाम ‘तथागत’ रखा गया है। अपने अनेक अनुभवों और योजनाओं का उलेख करते हुए उन्होंने कहा कि ट्रस्ट का एक बड़ा लक्ष्य है भाषा और संस्कृति की दृष्टि से उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ना। अभी जैसे हिन्दीतर क्षेत्र के हिन्दी लेखकों को दिल्ली में सम्मानित किया जा रहा है, उसी तरह निकट भविष्य में हिन्दी क्षेत्र के उन लेखकों को दक्षिण भारत में सम्मानित किया जाएगा जो दूसरी भाषाओं में लिखते हैं।
भारतीय शिक्षा बोर्ड की हिन्दी पाठ्यपुस्तकों की समिति के अध्यक्ष रहे और हाल ही में दिवंगत हुए प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार रामदरश मिश्र की स्मृति में यह सम्मान आयोजित हो रहा है। इस बोर्ड का लक्ष्य भारतीय जीवन-मूल्यों से हमारी नई पीढ़ी को परिचित करवाने के साथ-साथ अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति द्वारा तैयार की गई औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति दिलाना भी है।
विख्यात साहित्यकार सुश्री अनामिका ने कहा कि तथागत ट्रस्ट ने सुदूर केरल में स्थित साहित्यकार ए अरविंदाक्षन को सम्मान के लिए चुना, जिससे लगता है कि स्वयं बुद्ध ने संवाद और सम्मान के लिए शंकराचार्य को अपने पास बुला लिया हो। उन्होंने ‘कमायनी’ की पंक्ति के माध्यम से स्मृति शेष साहित्यकार रामदरश मिश्र को याद करते हुए कहा कि आज पूरी हिंदी पट्टी के समस्त विवादों को कोई भीगे नयनों से ही देख सकता है, जबकि मिश्र जी आजीवन विवादों से दूर रहे। हिंदी के लिए बाकी सभी भारतीय भाषाएँ मातामही भाषाएँ हैं। यदि इस बात को ध्यान में रखा जाय तो भाषाओं के बीच विवाद ही न रहे।
हिंदी आधुनिकता के गर्भ से जन्मी हुई भाषा है, हिंदी और हिंदुस्तानी दोनों स्वाधीनता संग्राम की भाषा बनी। भारतीय भाषाओं की रचनाओं का सबसे अधिक अनुवाद हिंदी में ही होता है। इसके विपरीत वाली बात सही नहीं है। फिर भी हिंदी को कोई शिकायत नहीं है। पुरस्कारों के बारे में उन्होंने कहा कि ये पुरस्कार अक्सर घर-परिवार या समाज में लेखकों के प्रति होने वाले अपेक्षा या तिरस्कार भाव का प्रतिउत्तर भी हो सकते हैं।
दोनों सम्मानित रचनाकारों ने हिंदी के खोयछें में अपनी अपनी भाषिक संस्कृति और उसकी नजाकत का दान दिया है जैसे सैमुअल बैकेट ने अंग्रेजी वालों को फ्रेंच की नजाकत दी है। दो भाषिक संस्कृतियाँ जब आँखें मिलाती हैं तो अपनी अपनी पहचान को छोड़कर एक दूसरे के रंग में मिल जाती हैं, जैसा कि अमीर खुसरो कहते हैं ‘छाप तिलक सब छीनी रे, तोसे नैना मिलाके ए अरविंदाक्षन और जमुना बीनी दोनों में यह भाषाई आदान-प्रदान दिखलाई पड़ता है।
‘रामदरश मिश्र स्मृति तथागत साहित्य सम्मान’ से सम्मानित कवि ए अरविंदाक्षन की साहित्यिक उपलब्धियों पर बोलते हुए ओम निश्छल ने कहा कि मलयालम भाषा की विस्तृत सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने के बाद भी अपने लगभग दो दर्जन कविता-संग्रहों में उन्होंने संवेदना की दृष्टि से भाषाई सरहदों को तोड़ा है। प्रेम, धर्म, दुःख, जीवन आदि से संबंधित कविताओं में दुःख की सन्निधि है। उनके यहाँ साहित्य और संवेदना की चिंता के साथ-साथ भारतीय समाज और संस्कृति की भी चिंता है, जैसे उनके यहाँ मणिपुर की गहरी चिंता मिलती है।
उनकी कविता कहीं और कभी समझौता नहीं करतीं। दक्षिण भारत में रहते हुए भी वे हिंदी प्रदेश और साहित्यकारों का काम कर रहे हैं जो कि प्रशंसनीय है। वैसे तो यह सम्मान उनकी कृति ‘धड़कनों के भीतर जाकर’ के लिए मिला है लेकिन उनके 22 संग्रहों में कविता के व्यापक और विविध मुहावरों का प्रयोग हुआ है।
इसके बाद संचालक डॉ. सोनी पाण्डेय द्वारा सम्मानित साहित्यकार ए अरविंदाक्षन का परिचय दिया गया और उपस्थित अतिथियों द्वारा शॉल, प्रशस्ति पत्र, स्मृति-चिह्न एवं 1,01,000/- की पुरस्कार राशि द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया। ए अरविंदाक्षन जी ने अपने स्वीकृति वक्तव्य में सबका आभार व्यक्त करते हुए युवा लेखिका जमुना बीनी को ‘सहोदरी’ कहा, जो ‘बहन’ शब्द का मलयालम पर्याय है। उन्होंने कहा कि ‘तथागत’ नाम से मैं काफी अभिभूत हूँ। “केरल में बुद्ध का काफी प्रभाव है और मैं भी उससे अछूता नहीं हूँ। मैं अशोक वाजपेयी को ‘संपूर्ण कवि’ मानता हूँ क्योंकि ‘कविता’ के भीतर अन्य कलाएँ भी समाहित हैं और वे इनका सम्यक निर्वाह करते हैं। इतने विशिष्ट और गणमान्य साहित्यकारों के बीच सम्मानित किए जाने पर उन्होंने सबका आभार व्याक्त किया।
इसके बाद युवा पूर्वोत्तर भारत की कवयित्री जमुना बीनी के हिंदी कविता-संग्रह ‘जब आदिवासी गाता है’ के संदर्भ में बोलते हुए युवा अध्येता और संस्कृतिकर्मी विशाल पांडेय ने कहा कि जमुना स्मृतियों से उतर कर विस्मृत होते हुए अनुभवों को अपनी कविताओं में उतारती हैं। उन्होंने प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य को चित्रित किया है लेकिन यह सौंदर्य स्मृति में है। उन्होंने व्यक्त अतीत और वर्तमान को उलाहना का स्वर देती हुई कविताएँ लिखी हैं।
उन्हें पढ़ते हुए राजेश जोशी की कविताएँ याद आती हैं क्योंकि उनमें यथार्थ से पलायन न होकर, नग्न यथार्थ से मुठभेड़ है। अपनी मिट्टी से आत्मीयता नाता है जो उन्हें बार-बार पुकारता है। आदिवासी कविता की भाषा का सरल होना बताता है कि आदिवासियों का जीवन भी सरल होता है। भाषा का सवाल अस्मिता का सवाल है। जमुना बीनी युवा अरुणाचली कविताओं में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाली प्रमुख स्वर हैं। उनकी कविताएँ अतीत की पगडंडियों से चलकर कंक्रीट की दुनिया तक का सफर तय करती है।
‘तथागत युवा साहित्य सम्मान’ से सम्मानित अरुणाचल प्रदेश की युवा कवयित्री जमुना बीनी ने ‘नमस्ते’ और ‘जोहार’ के साथ स्वीकृति वक्तव्य शुरू किया और कहा कि तथागत ट्रस्ट का काम देखते हुए मुझे वेरियर एलविन जी का काम याद आता है जिन्होंने अरुणाचल प्रदेश के आदिवासियों के लिए भी वैसा ही काम किया है। उनकी राख आज भी अरुणाचल की धरती में प्रवाहित है। उन्होंने उपस्थित सभी साहित्यकारों के साथ अपनी पहली मुलाकात को याद किया। अपने कॉलेज दिनों के हिंदी प्रेम का जिक्र करते हुए अरुणाचल और अन्य पूर्वांचल प्रदेशों में हिंदी को लेकर लोगों की सोच के बारे में भी बताया।
निशि समुदाय के लोग जब हिंदी बोलते हैं तो मन में अनुवाद चलता रहता है। बोलने में जेंडर का अंतर नहीं है। ‘जेंडर न्यूट्रल’ की स्थिति है। आदिवासी समुदाय में ‘मैं’ की जगह ‘हम’ का प्रयोग होता है। वहाँ लोग कहते हैं ‘बारिश आने का कोशिश कर रहा है।’ हमारे लिए प्रकृति केवल जड़ नहीं है। चेतना की तरह है। उन्होंने एक लोककथा के हवाले से बताया कि ज्ञान की मौखिक या वाचिक परंपरा आज भी वहाँ समृद्ध हैं। हालाँकि अब वाचिक से लिखित में संक्रमण हो रहा है और अपनी लिपि भी विकसित हो रही है।
वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि आप और मैं दोनों ही धैर्यधन हैं। आप सबको भी इतनी देर उपस्थित रहने के लिए सम्मानित किया जाना चाहिए। ट्रस्ट के संरक्षक डॉ. एन.पी.सिंह और अपनी तुलना करते हुए कहा कि हम दोनों में एक समानता है। आपको अपनी चाची से विरासत मिली थी और मुझे सैयद हैदर रज़ा की संपत्ति विरासत में मिली है और दोनों उसका उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने सिविल सेवा के अपने अनुभवों को याद करते हुए कहा कि इस सेवा में रहते हुए या उसके बाद ऐसे काम करने वाले अधिकारी बहुत कम हैं।
पुरस्कार के बारे में कहा पुरस्कार लेना अच्छा है, पुरस्कार लेकर जल्दी भूल जाना और अच्छा है। हिंदी में पुरस्कार मिलने पर पाठक बढ़े या न बढ़े, शत्रु जरूर बढ़ जाते हैं। उन्होंने मीडिया की भूमिका पर भी टिप्पणी की और कहा कि आज हमारी बेचैनी टुच्ची चीजों को लेकर हो गई है। एक दौर था जब लोग प्रधानमंत्री की आलोचना कर सकते थे। अब तो पूरा भारत ही मुदित होकर देखता है। साहित्य का काम आपके इस अमन-चैन में कुछ अड़ंगा लगाता है, अड़चन डालता है। ऐसी बेचैनी पैदा करने का काम इन दोनों लेखकों ने अपने अपने ढंग से ये किया है। इसीलिए यह उचित सम्मान और वैध सम्मान है।
सार्वजनिक जीवन के अलावा जो बचा हुआ जीवन है, उसपर भी हमें नजर रखनी चाहिए, क्योंकि असली जीवनी या संजीवनी वहीं से आती है। हिन्दी में शब्दों की फिजूलखर्ची की प्रवृत्ति के प्रति उन्होंने चेताया और कहा कि हमें शब्द के मूल स्रोतों तक जाना चाहिए और कोश का उपयोग करना चाहिए। आज हिंदी भाषा राजनैतिक और मीडिया के मंचों से झूठ, नफरत, षड्यंत्र आदि का सबसे बड़ा माध्यम बन गई है। हमें अपने भाषा के इस विद्रूप के प्रति सजग होना है, हमारा काम भाषा की मानवीयता को बचाना है, मानवीय ऊष्णता को बचाना है। आज इसकी सबसे बड़ी जरूरत है।
हिंदी की वरिष्ठ साहित्यकार सुश्री चंद्रकांता ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में रामदरश जी की स्मृति को याद किया और तथागत ट्रस्ट के संरक्षक डॉ. एन. पी. सिंह जी को उनके प्रयासों के लिए साधुवाद दिया। दोनों सम्मानित रचनाकारों को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि अनुवाद और उसकी संस्कृति परस्पर होनी चाहिए, दोनों ओर से होनी चाहिए। यदि तमिल से हिंदी में अनुवाद हो रहा है तो हिंदी से भी तमिल में अनुवाद होना चाहिए।
अपने संक्षिप्त वक्तव्य में उन्होंने मलयालम, बांग्ला, कश्मीरी और राजस्थानी भाषा में दो-दो पंक्तियाँ सुनाते हुए यह बतलाया कि किसी भी भाषा के प्रति सजग चेतना और संवेदनशीलता होना बहुत जरूरी है, तभी हम उसके साथ अपनापन महसूस कर सकते हैं। हमलोग रेत या बालू को कोई महत्त्व नहीं देते हैं, लेकिन राजस्थान में उसे ‘गोरी गोरी रेत’ कहते हैं। जमुना बीनी को कई वर्ष पहले देखी थी, तब भी उसमें एक आग दिखी थी। अशोक वाजपेयी जी की बातों से सहमति जतलाते हुए कहा कि मानवीयता को बचाने का प्रयास अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ‘तथागत ट्रस्ट’ इसी भूली हुई मानवता को जगाने का काम कर रहा है। रामदरश मिश्र को याद करते हुए कहा कि उन्होंने बिना किसी विवाद में पड़े हुए जीवन भर काम किया।
सबसे अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रो. स्मिता मिश्र ने अपने पिता और साहित्यकार रामदरश मिश्र की एक कविता का अंश सुनाते हुए कहा कि यह समारोह हिंदी साहित्य और समूचे भारतीय साहित्य के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है। भारत के दो छोरों में हिंदी की अलख जगाए रखने वाले दो रचनाकारों का यहाँ आना अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना है। रामदरश मिश्र जैसे लेखक केवल हिंदी ही नहीं, बल्कि समूची भारतीय साहित्य की एक परंपरा हैं। उनकी स्मृति में दिया गया यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं बढ़ाती, बल्कि पूरे समाज को एक संदेश देती है कि वह साहित्य की संवेदनशीलता को बचाए रखे और उसे बचाने वालों का भी सम्मान करता रहे। इसका माध्यम बनने के लिए उन्होंने तथागत ट्रस्ट को धन्यवाद दिया। इस आयोजन का संचालन प्रतिष्ठित हिन्दी लेखिका डॉ. सोनी पाण्डेय ने किया, जिन्हें हाल ही में ‘वैली ऑफ़ वर्ड्स’ सम्मान मिल चुका है।
