भारत से बाहर करीब साढ़े तीन करोड़ हिंदुस्तानी रहते हैं और अपने मूल देश के साथ इन सबका जुड़ाव एक-सा नहीं है। कोई भारत में ही जन्मा है तो किसी के सात-आठ पीढ़ी पुराने पूर्वज यहां से गए थे। यह जरूर है कि ये सारे लोग किसी न किसी रूप में भारत से अपना रिश्ता महसूस करते हैं और इसके साथ अपनी पहचान जोड़ते हैं। प्रवासियों की यह संख्या निश्चित रूप से बहुत बड़ी है। इस मामले में भारत का मुकाबला सिर्फ चीन कर सकता है, जहां से निकले पांच करोड़ लोग पूरी दुनिया में फैले हुए हैं।
प्रवासी भारतीय आबादी के आकार का अंदाजा इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि वे अगर एक स्वतंत्र देश के रूप में संगठित होते तो जनसंख्या के आधार पर बनाई गई दुनिया भर के देशों की सूची में इस भारतीय प्रवासी देश की जगह 45वीं होती। इक्कीसवीं सदी की सबसे अच्छी बातों में एक यह है कि इसने बाहर रह रहे भारतीयों को एक चेहरा दिया है। उस चेहरे से हमारा परिचय कभी बढ़ता है तो कभी घट भी जाता है लेकिन जो मुश्किलें अभी इस चेहरे के साथ जुड़ी हैं उन्हें जानने, उन पर बात करने की हमें कभी जरूरत ही महसूस होती।
भारतीय और चीनी प्रवासियों के बीच तुलना करें तो चीनी अगर मुख्य भूमि से नहीं, ताइवान, सिंगापुर या थाईलैंड से जाकर भी पेरू या ब्राजील में रह रहे हों तो वे खुद को चीनी मूल का ही बताते हैं और वहां के लोग भी उन्हें चीनी ही मानते हैं। लेकिन आजादी के पहले से पूर्वी अफ्रीकी देशों केन्या या तंजानिया में बसे भारतीयों में हिंदुओं की पहचान भारतीय और मुसलमानों की पाकिस्तानी बताई जाती है। भले ही उनकी जड़ें छत्तीसगढ़ या कर्नाटक से क्यों न जुड़ी हों। इसके कुछ अपवाद भी हैं, मगर कुछ ही।
इसकी वजह साफ है कि भारत को आजादी धार्मिक आधार पर हुए विभाजन के साथ जुड़कर मिली, जिससे बाहर रह रहे लोगों में व्यर्थ का कन्फ्यूजन पैदा हुआ। लेकिन इसकी कुछ ज्यादा जटिल वजहें भी हैं। जैसे यह कि भारत की तुलना में चीन कहीं ज्यादा अमीर है। उसका सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) भारत का पांच गुना है। जाहिर है, कोई भी प्रवासी चीनी अपनी पहचान को चीन से जोड़कर खुद को ताकतवर महसूस करता है और इस ताकत का इस्तेमाल अपने पक्ष में करना चाहता है।
भारत के साथ यह प्रक्रिया अभी शुरू ही हुई है। बीसवीं-इक्कीसवीं सदी की संधि पर घटित कुछ घटनाओं और प्रक्रियाओं ने भारत को दुनिया के बड़े राजनीतिक-आर्थिक खिलाड़ियों में शामिल कराया। जैसे पोखरण में हुए भारत के द्वितीय परमाणु परीक्षण और भारतीय आईटी प्रफेशनल्स की अमेरिका में अचानक सुनाई पड़ी धमक ने। इसके बावजूद दुनिया के कई इलाकों में प्रवासी भारतीयों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है और भारत सरकार की मदद लेने की उनकी कोशिशें कुछ खास प्रभावी नहीं हो पा रहीं।
जैसे, खाड़ी क्षेत्र के देश प्रवासी भारतीयों के सबसे बड़े ठिकानों में गिने जाते हैं। पर इनमें से कई में, खासकर सऊदी अरब में उन्हें अमानवीय स्थितियों में रहना पड़ता है और उनकी मदद के लिए कोई कुछ नहीं कर पाता। चीनी प्रवासियों को कहीं भी इतने बुरे हालात से नहीं गुजरना पड़ता, हालांकि इसका एक पहलू यह भी है कि काम की इतनी बुरी शर्तों के लिए वे राजी ही नहीं होते।
एक समस्या भारतीयता की अंतर्वस्तु से भी जुड़ी है। भूगोल के अलावा इसका मतलब क्या है? चीनियों के लिए इसके कुछ ठोस अर्थ हैं। सबसे बढ़कर चीनी भाषा। वे चाहे चीन में पैदा होकर बाहर गए हों, या दस पीढ़ी पहले चीन से अलग हुए हों, चीनी भाषा की कामचलाऊ जानकारी उनके पास होती ही है। किसी चीनी से मिलने पर वे उसके साथ इसी भाषा में बात करते हैं। इसका कारण यह है कि चीन में एक भाषा की नीति दो हजार साल से जारी है।
इसका अर्थ यह नहीं कि चीन में दूसरी पहचानों का अभाव है। बोलियों और जातीयता के आधार पर उनमें जबर्दस्त गुटबाजी देखी जाती है। हान, तिब्बतन और उइगुर जैसी जातीय पहचानों के अलावा हक्का, कैंटनीज और मैंडरिन जैसी बोलियों के झगड़े भी देखे जाते हैं। लेकिन भाषा की एकता उन्हें हर जगह चीनी बनाए रखती है।
भारतीय प्रवासियों के साथ न तो ऐसा कुछ है, न होने की दूर-दूर तक कोई संभावना है। अमेरिका में भी हर इलाके में आपको तेलुगू और गुजराती ही नहीं, भोजपुरी, कुमाऊंनी और मारवाड़ी संगठन तक फलते-फूलते और जब-तब एक-दूसरे की जड़ें खोदते भी दिख जाते हैं।
उलझन का दूसरा पहलू यह है कि भारतीयों और चीनियों के प्रवासी होने की प्रक्रिया भी अलग-अलग रही है। कई इलाकों पर विदेशी कब्जे के बावजूद केंद्रीय सत्ता के स्तर पर चीन को कभी गुलामी नहीं झेलनी पड़ी। जबकि भारत में सर्वव्यापी केंद्रीय सत्ता जैसा कभी कुछ बना ही नहीं, और जो बना भी वह छीजते-कटते हुए 1857 में अंग्रेजी राज के हवाले हो गया। इस तरह भारतीय और चीनी प्रवास में सबसे बड़ा फर्क मर्जी और बिना मर्जी का है।
ब्रिटिश साम्राज्य में दास प्रथा का खात्मा 1838 में हुआ। तब से लेकर 1917 तक अंग्रेज न सिर्फ खुद नाम मात्र का एक बॉन्ड भराकर भारतीयों को दूर-दूर की जगहों पर दासों की तरह खटाने ले गए, बल्कि हॉलैंड जैसे एक-दो अन्य यूरोपीय देशों को भी ऐसा करने का मौका दिया। पूरा करीबियन इलाका, मॉरिशस और फिजी इसी प्रक्रिया में आधुनिक सभ्यता का अंग बने।
भारतीयों के विदेशों में बसने की तीन बड़ी लहरें मानी जाती हैं। 1870 से 1910 के बीच, फिर द्वितीय विश्वयुद्ध के तुरंत बाद, और अभी भूमण्डलीकरण के प्रभाव में। इस क्रम में प्रवासी भारतीयों के बीच एक नए तरह की जातिप्रथा भी उभरी है। अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के अमीर भारतीय व्यापारी और प्रफेशनल अंग्रेजी और थोड़ी-बहुत पंजाबी-गुजराती बोलते हैं। वेस्ट इंडीज, मॉरिशस और फिजी के ऐली-गैली (भोजपुरी हिंदी) बोलने वालों का उनके लिए जैसे कोई वजूद ही नहीं है।
जिंदगी से जुड़ी मजबूरियां इन गिरमिटिया भारतवंशियों को सौ साल से संजोकर रखी हुई अपनी संस्कृति छोड़ने को बाध्य कर रही हैं। उनके गीत अब भोजपुरी के बजाय अंग्रेजी में आने लगे हैं और सिर्फ एक पीढ़ी के अंदर अपनी स्वाभाविक संगत हारमोनियम – ढोलक – धन्ताल छोड़कर ये डिस्को से होते हुए एकरस पश्चिमी बाजों में ढलने लगे हैं। इक्कीसवीं सदी ने भारतीय डायस्पोरा को एक चेहरा जरूर दिया है, लेकिन भारत की ओर से उनके जीवन की समझ बनाकर मदद का जो हाथ बढ़ना चाहिए, वह लापता है।
