नई दिल्ली। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति की अंतर्निहित चेतना को उजागर करना है और अगर जो चेतना को उजागर करने में सक्षम नहीं है वह शिक्षा किसी काम की नहीं है। इस आशय की बातें हंसराज कॉलेज में आयोजित भारतीय ज्ञान परंपरा विषयक व्याख्यान में इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. ओम प्रकाश पाण्डेय ने कही।
उन्होंने कहा कि भारत की सही पहचान के लिए हमें गहराई के साथ विचार करना होगा। यह देश ऋषियों-मुनियों की सहस्रों साल की साधना और ज्ञान से निर्मित है। दुनिया की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता भारत सभ्यतागत विकास की केन्द्रीय धूरी रहा है और इसका प्रमाण वेदों से ही मिलने लगता है। उन्होंने आत्मा की अमरता और नश्वरता की बात की। उन्होंने आदर्श आचार्य पर भी अपने मत प्रकट किए और कहा कि आचार्य को अग्नि की तरह होना चाहिए। जैसे अग्नि के संपर्क में जो आता है वह अग्नि हो जाता है वैसा ही आचार्य को होना चाहिए।
इससे पहले कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अंबडेकर विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो. सत्यकेतु सांकृत ने कहा कि गीता, वेद, पुराण महत्वपूर्ण पुस्तके हैं अतः इसे सभी को पढ़ने व समझने की जरूरत है। आज का समस्त ज्ञान भारतीय ज्ञान परंपरा से ही विकसित हुआ ही है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम मेधा सभी काम तेजी से तो कर सकता है पर इसमें संवेदना नहीं है इसलिए यह खतरनाक है।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में हंसराज महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. रमा ने ओम प्रकाश पांडेय जी की पुस्तक ‘भारत वैभव’ का जिक्र करते हुए कहा कि भारत को सही मायने में समझना है तो सभी को एक बार पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि हमारे लोक में गहन जीवन दर्शन है और जीवन को समझने के लिए पहले हमें अपने लोक को समझना अति आवश्यक है। उन्होंने विविध वैदिक संदर्भों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा के वैशिष्ट्य को सामने रखा। कार्यक्रम का संचालन सहायक प्राध्यापक डॉ. विजय कुमार मिश्रा ने किया जबकि डॉ. नृत्य गोपाल ने सभी का धन्यवाद किया।।