स्वामी सहजानंद सरस्वती – राहुल सांकृत्यायन किसान-मजदूर-नौजवान चेतना पदयात्रा

स्वामी सहजानंद सरस्वती -राहुल सांकृत्यायन के किसान आंदोलन के संघर्षों-अनुभवों से ऊर्जा लेने के लिए स्वामी सहजानंद के गांव देवा (गाजीपुर) से राहुल सांकृत्यायन के गांव कनैला (आजमगढ़) तक 16, 17, 18 जून 2026 को एक पदयात्रा शुरू होने वाली है।

इस यात्रा के दौरान भारत में संगठित किसान आंदोलन के जनक स्वामी सहजानंद सरस्वती और महान घुमक्कड़ किसान नेता राहुल सांकृत्यायन के विचारों के साथ किसानों, मज़दूरों, महिलाओं और नौजवानों से संवाद किया जाए। इस सफर में वीर अब्दुल हमीद, सुभाष रवि, कामरेड तेज बहादुर सिंह समेत जन संघर्षों के पुरखों को भी याद किया जाएगा। राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में कमर बाँध लो भावी घुमक्कड़ो, संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है।

लोक में किसानों के भगवान के रूप में जाने-जाने वाले स्वामी सहजानंद कहते थे- जो अन्न वस्त्र उपजाएगा, अब वह कानून बनाएगा, यह भारत वर्ष उसी का है, अब शासन वही चलाएगा। गुलाम भारत में किया गया उद्घोष आजाद भारत में भी नहीं पूरा हो सका और जहां श्रमिकों के द्वारा शासन चलाना तो दूर अब नए कृषि-श्रम कानूनों के जरिए गुलाम बनाया जा रहा है। अन्न-वस्त्र उपजने वाले द्वारा कानून बनाने की बात इसलिए उन्होंने की कि वे जानते थे कि किसी को गुलाम बनाने उसके हक-अधिकार छीनने हों तो कानून बनाकर आसानी से छीना जा सकता है।

स्वामी सहजानंद कहते हैं कि अधिकार कभी मांगों मत छीनों क्योंकि मांगी गई चीज फिर छीन ली जाएगी। देश में बेरोजगार युवा प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली, पेपर लीक और भर्ती घोटालों से त्रस्त होकर आत्महत्या कर रहे हैं और उनके किसान-मजदूर माता-पिता ग्रामीण स्तर पर मनरेगा जैसी योजनाओं से मिलने वाले रोजगार और अपने ग्रामीण संसाधनों को बचाने की मांग करते हैं तो उनको ही उत्पीड़ित किया जा रहा है।

राहुल सांकृत्यायन दार्शनिक, लेखक और साहित्यकार ही नहीं वे स्वतंत्रता सेनानी और किसान नेता भी थे। उन्होंने 1936 में स्वामी सहजानंद सरस्वती के साथ मिलकर किसान सभा का गठन कर जमींदारों के जुल्म के खिलाफ आन्दोलन का नेतृत्व किया था, जेल भी गये। अमवारी किसान सत्याग्रह के बाद छपरा जेल में ही रहते हुए राहुल ने अपनी प्रसिद्ध किताब तुम्हारी क्षय लिखी थी। जिसमें उन्होंने किसान-मजदूर एकता की बात करते हुए पूँजीपतियों, जमींदारों और महाजनों के साथ रूढ़िवादी समाज और दक़ियानूसी परम्पराओं धर्म के क्षय होने की बात कही।

स्वामी सहजानंद का किसानों से कहना था कि हिसाब करें-हिसाब मांगे, डरना छोड़ दें, लड़ना सीखे और लड़े, वर्ग चेतना प्राप्त करें, नेताओं पर कड़ी नजर रखे, किसान सभा को अपनाएं, किसान सेवक और किसान कोष तैयार करें और राजनीतिक चेतना प्राप्त करें। स्पष्ट था कि वैचारिक रूप से किसान, मजदूर, बुनकर संगठित हों। शोषणकारी नीतियों के चलते बनारसी साड़ियों से दुनिया को गुलज़ार करने वाले इस इलाके के बुनकरों की जिंदगी की चमक फीकी पड़ती जा रही है।

ऐसे में महान यायावर बौद्धिक योद्धा राहुल सांकृत्यायन से प्रेरणा लें जिन्होंने पढ़ा, गढ़ा और लड़ा। वर्ष 1938 में तिब्बत की अपनी चौथी यात्रा से लौटने के बाद राहुल सांकृत्यायन राजनीति में फिर से सक्रिय हुए। उन्होंने लिखा कि ‘मैं पहले भी राजनीति में अपने हृदय की पीड़ा दूर करने आया था। गरीबी और अपमान को मैं भारी अभिशाप समझता था। असहयोग के समय भी मैं जिस स्वराज्य की कल्पना करता था, वह काले सेठों और बाबुओं का राज नहीं था। वह राज था किसानों और मजदूरों का क्योंकि तभी गरीबी और अपमान से जनता मुक्त हो सकती थी.

स्वामी सहजानंद कहते थे कि हम किसी को बादशाह नहीं मानना चाहते, हमारा बादशाह किसान-मजदूर है। जिसकी कमाई से बासमती, गेहूं, दूध, घी, चीनी, शक्कर, कपड़े और हमारे आराम की तमाम चीजें तैयार हों, वहीं तो हमारा बादशाह है। हमारा बादशाह दूसरा कौन? जिस बादशाह की कमाई हम खाते हैं उसी की सरकार हम अपने मुल्क में चाहते हैं। मैं ईश्वर को ढूंढने चला जंगलों और पहाड़ों में ढूंढ़ा, तीर्थ धाम बदरी नाथ, केदार नाथ, मथुरा, वृंदावन, अयोध्या और काशी में भी तलाशा, धार्मिक ग्रंथों में भी पाने का प्रयास किया लेकिन कहीं नहीं पा सका, यदि वह कहीं मिला तो किसानों में।

किसान ही मेरा भगवान है और मैं उन्हीं की पूजा किया करता हूं। मुझे बर्दाश्त नहीं कि कोई मेरे भगवान का अपमान करे। जिस किसान को स्वामी सहजानंद भगवान कहते थे और उसका अपमान उन्हें बर्दाश्त नहीं था आज वह किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है। स्वामी जी का वह भगवान किसान-मजदूर अगर अधिकार की बात करता है तो उसे देश विरोधी कहा जाता है! लाठी-डंडा-जेल दमन आम बात हो गई है।

यही स्थिति अंग्रेजों के दौर में भी थी राहुल सांकृत्यायन ने छपरा में गाँव-गाँव घूमकर किसानों-मजदूरों को संगठित करने का काम किया। उसी समय अमवारी गाँव के किसानों से उनके खेत छीन लिए गए और उनके ऊपर रोज हो रहे अत्याचारों की सुनवाई कहीं नहीं हो रही थी। ये किसान ‘हरी-बेगारी’ प्रथा का विरोध कर रहे थे, जिसके अंतर्गत किसानों को अपने हल-बैल से पहले जमींदारों के खेत को जोतना पड़ता था। राहुल ने गाँव-गाँव घूमकर वस्तुस्थिति का अध्ययन किया। उनके साथ नागार्जुन भी थे।

किसान सत्याग्रह की शुरुआत अमवारी से की गई, अमवारी में धारा 144 लगाए जाने की अफवाह उड़ाए जाने के बावजूद राहुल किसान सत्याग्रहियों के साथ फरवरी 1939 में अमवारी गए। वहाँ के जमींदार ने किसान सत्याग्रहियों से निपटने के लिए पचासों लठैत और दो हाथी जमा कर रखे थे।

राहुल सांकृत्यायन के नेतृत्व में किसानों ने उस खेत से ऊख काटना शुरू किया। जिस पर अमवारी के जमींदार ने अवैध ढंग से कब्जा कर लिया था। लठैतों की परवाह किए बगैर राहुल के नेतृत्व में किसानों ने ऊख काटना शुरू किया। जमींदार ने अपने लठैतों को राहुल और नागार्जुन पर लाठी चलाने के लिए उकसाया, लेकिन उन्होंने भिक्षुवेश धारी राहुल और नागार्जुन पर लाठी चलाने से इंकार कर दिया। आज की तरह उस वक्त भी पुलिस भी जमींदार का ही साथ दे रही थी।

राहुल सांकृत्यायन द्वारा गन्ना काटे जाने पर थानेदार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उसी समय जमींदार के महावत ने राहुल के सर पर लाठी से मारा, जिससे उनका सर फट गया और खून बहने लगा। राहुल और नागार्जुन समेत दो दर्जन किसान सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर सीवान जेल में बंद कर दिया गया। जबकि राहुल पर हमला करने वाले महावत को छोड़ दिया गया। जैसा कि आज नफरत फैलाने वालों को।

गिरफ्तारी ने जनता में आक्रोश भड़काया और जब उन्हें सीवान से छपरा ले जाया जा रहा था, तब सड़क पर सैकड़ों लोग ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’, ‘किसान राज कायम हो’ और ‘जमींदारी प्रथा का नाश हो’ के नारे लगा रहे थे। बाद में राहुल ने छितौली में हुए किसान सत्याग्रह का भी नेतृत्व किया। ऐसे तमाम अनुभव, विचार किताबों और समाज में हैं जिनको साझा करने का यह वक़्त है।

First Published on: June 14, 2026 10:12 AM
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