नोएडा श्रमिक आंदोलन आधुनिक गुलामी के विरुद्ध प्रतिवाद


कुछ ही दिनों में पूरे देश में मजदूर मई दिवस मनाने जा रहा है। इसके जन्मदाता 1886 में हे-मार्केट, शिकागो अमेरिका के मजदूर आंदोलन के नेता शहीद अल्बर्ट पारसंस की पत्नी लुई पारसंस ने अदालत में बयान देते हुए कहा था कि “जज आल्टगिल्ट क्या इस बात से इनकार करेंगे कि आपके जेलखाने गरीबों के बच्चों से भरे हुए हैं अमीरों के बच्चों से नहीं? क्या आप इनकार करेंगे कि आदमी इसलिए चोरी करता है क्योंकि उसका पेट खाली रहता है? क्या आपमें यह कहने का साहस है कि भूली भटकी बहनें जिनकी आप बात करते हैं, एक रात में दस से बीस व्यक्तियों के साथ सोने में प्रसन्नता महसूस करती हैं, अपनी अंतड़ियों को दगवाकर बहुत खुश होती है।” ऐतिहासिक मई दिवस के संदर्भ में आज भी यह सवाल पूंजीवादी बर्बादी, लूट व दमन और मजदूरों के शोषण को व्यक्त करते हैं।

आज के दौर में मेहनतकशों को विशेषकर मजदूर वर्ग को आधुनिक प्रकार की बंधुआ प्रथा की तरफ धकेल दिया गया है। चंद पूंजी घरानों की सरकार द्वारा मदद के कारण सरकारी, सार्वजनिक उद्योग या तो बंद कर दिए गए या बेच दिए गए। इन उद्योगों में व सरकारी विभागों में स्थाई नौकरियां समाप्त कर ठेका संविदा प्रथा में बेहद कम मजदूरी पर पूरी जिंदगी मजदूरों से काम कराया जाने लगा।

प्रधान नियोक्ता सरकार की नीति की देखा देखी करते हुए निजी क्षेत्र भी इसी दिशा में बढ़ चले। स्थिति की गंभीरता को एक उदाहरण से समझा जा सकता है, गौतम अडानी के 16 लाख करोड़ की संपत्ति के कारोबार में मात्र 32 हजार स्थाई कर्मचारी हैं बाकी सब ठेका मजदूर। यह भी गौर करने लायक है कि भारत सरकार की ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत लगभग 32 करोड़ श्रमिकों में 92 प्रतिशत श्रमिक 10 हजार रूपए मासिक वेतन से कम प्राप्त करते हैं।

यही नहीं मजदूर की कार्य स्थिति खराब होती गई। लंबे संघर्षों से हासिल अधिकार उनसे छीन लिए गए। मोदी सरकार ने तो कोरोना काल में लेबर कोड बनाकर और अमेरिका व यूरोप डील के दबाव में 24 नवंबर 2025 से इन्हें लागू कर आधुनिक गुलामी को कानूनी जामा पहनाने का काम किया। मजदूरों के काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 कर दिए गए। फ्लोर लेवल वेज लाकर न्यूनतम मजदूरी के अधिकार को कमजोर कर दिया गया। फिक्स टर्म इम्पलाइमेंट के जरिए ठेका प्रथा तक में जो कुछ सामाजिक सुरक्षा के अधिकार हासिल भी थे वह भी छीन लिए गए।

आज हालात यह है कि सालों से राज्य सरकारों ने व केंद्र सरकार ने न्यूनतम वेतन का वेज रिवीजन नहीं किया। खुद उत्तर प्रदेश में 2014 से मिनिमम वेज रिवीजन नहीं हुआ है। इस सच को उत्तर प्रदेश सरकार को स्वीकार करना पड़ा और अपनी गलती को सुधारते हुए 21 प्रतिशत वेतन वृद्धि की अधिसूचना जारी करनी पड़ी। केंद्र सरकार ने भी न्यूनतम वेतन का वेज रिवीजन 2022 से नहीं किया है। जबकि न्यूनतम मजदूरी कानून 1948 के अनुसार हर 5 साल में न्यूनतम मजदूरी का वेज रिवीजन होना चाहिए। इस हिसाब से प्रदेश में मजदूरी दर 26000 रुपए प्रतिमाह और केंद्र में 32000 रुपए प्रतिमाह होनी चाहिए थी।

हालत इतनी बुरी है कि मजदूरों को साप्ताहिक अवकाश मिलना और ओवर टाइम का डबल भुगतान, बोनस ग्रेच्युटी आदि बंद हो गया है। यहां तक कि कार्य के दौरान पेशाब करने तक की छुट्टी देने से मालिक इंकार कर रहे हैं। श्रम कानूनों की खुलेआम धज्जी उड़ रही है। खुद उपश्रमायुक्त नोएडा में स्वीकार किया कि सैकड़ो ठेकेदारों ने मजदूरों के श्रम अधिकारों का हनन किया है और उनके ईएसआई व ईपीएफ तक को लूट लिया है।

हाल ही में अमेरिका- इजराइल द्वारा ईरान पर किए हमले ने हालात को और गंभीर बना दिया है। गैस की बढ़ी कीमतें, छोटे मझोले उद्योगों की बंदी के कारण मौजूदा रोजगार का छीनना, कमर तोड़ महंगाई और भीषण बेरोजगारी ने मजदूरों को पूरे देश में उद्वेलित कर दिया। इसी पृष्ठभूमि में नोएडा व एनसीआर का श्रमिक भी गुलामी के हालातों के खिलाफ प्रतिवाद में उतरा।

इस आंदोलन से उभरे सवालों का लोकतांत्रिक समाधान करने की जगह योगी सरकार अपने फासीवादी, तानाशाही चरित्र के अनुरूप बर्बर दमन पर उतर आई है। ‘पाकिस्तानी कनेक्शन’, ‘अर्बन नक्सल’ के नाम पर समाज की महत्वपूर्ण मेधा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

सुप्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा के पुत्र व यूएनआई जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के वरिष्ठ पत्रकार रहे सत्यम वर्मा को नोएडा पुलिस ने दो दिन तक अगवा कर जेल भेज दिया। सैकड़ो मजदूर जिसमें महिलाएं और नाबालिग बच्चे भी हैं गंभीर धाराओं में जेल में बंद है। विपक्षी नेताओं, मानवाधिकार संगठनों यहां तक की वकीलों को भी मजदूरों से मिलने से रोका जा रहा है।

सरकार द्वारा कथित मास्टरमाइंड बताए जा रहे ‘मजदूर बिगुल’ और दिशा संगठन के लोगों पर आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप बनाए और प्रेस रजिस्टार जनरल ऑफ इंडिया में पंजीकृत मजदूर बिगुल अखबार में मजदूरों के पक्ष में लेख लिखें। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अधिकार हासिल है और यह कतई गैर कानूनी नहीं है।

कौन नहीं जानता कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के लाखों टूल किट्स, व्हाट्सएप ग्रुप, सोशल मीडिया हैंडल्स के जरिए पूरे देश में रोज जहर बोने का काम करते हैं। खुद प्रधानमंत्री जी की सारी इमेज इसी टीम टूल किट्स के ऊपर निर्भर करती है। अखबार तो गैर पंजीकृत आरएसएस भी पांचजन्य और ऑर्गेनाइजर निकलती है। जिसमें अमेरिका और बड़ी पूंजी घरानों का स्तुतिगान होता है।

ऐसे में मजदूर नेताओं, श्रमिकों और उनके समर्थक बुद्धिजीवियों पर लगाए गए आरोप पूर्णतया बेबुनियाद और उनकी छवि को धूमिल करने का प्रयास है। जिसे समाज स्वीकार नहीं करेगा। 24 अप्रैल को दिल्ली के राजेंद्र भवन में रोजगार- सामाजिक अधिकार अभियान के द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर की लोकतांत्रिक शक्तियों ने इस बात का प्रस्ताव लिया कि नोएडा आंदोलन के पक्ष में पूरे देश के लोकतांत्रिक समाज को खड़ा किया जाएगा और दमन के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी प्रतिवाद संगठित होगा।

(दिनकर कपूर, प्रदेश महासचिव, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट)



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