ट्रंप ने सीजफायर पर ईरान को उलझाया, उधर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में भेज दिए बारूदी सुरंग हटाने वाले जहाज

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विदेश Updated On :

अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में हुई शांति वार्ता पहले ही दिन बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। दूसरे दिन बातचीत की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस पूरी बातचीत ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शांति वार्ता के नाम पर ईरान को फिर धोखा मिला है? क्योंकि बातचीत के बीच ही अमेरिका ने माइंस हटाने के लिए अपने दो सैन्य जहाजों को होर्मुज के पार ईरान के पास भेज दिया है।

करीब 21 घंटे तक चली मैराथन बातचीत के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को खाली हाथ लौटना पड़ा। वेंस ने साफ कहा कि अमेरिका ने अपनी ‘रेड लाइन’ बता दी थी, लेकिन ईरान ने उन्हें मानने से इनकार कर दिया। दूसरी तरफ ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने जरूरत से ज्यादा शर्तें थोप दीं और बातचीत को संतुलित नहीं रखा।

हालांकि असली विवाद सिर्फ बातचीत के फेल होने तक सीमित नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अमेरिका ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अपनी सैन्य गतिविधियां तेज कर दीं। अमेरिकी सेंटकॉम ने दावा किया कि उसके दो डेस्ट्रॉयर USS फ्रैंक ई पीटरसन और USS माइकल मर्फी होर्मुज जलडमरूमध्य को पार कर चुके हैं। यह जहाज यहां लगी बारूदी सुरंगों को साफ करने के मिशन में जुटे हैं। इसे वैश्विक व्यापार के लिए जरूरी कदम बताया गया। लेकिन ईरान ने इस दावे को तुरंत खारिज कर दिया। तेहरान का कहना है कि होर्मुज पर पूरा नियंत्रण उसी का है और बिना उसकी अनुमति कोई भी सैन्य जहाज वहां नहीं चल सकता।

यही नहीं, इस दौरान पाकिस्तान के कदम ने भी पूरे समीकरण को और जटिल बना दिया है। जहां पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था, वहीं उसने गुपचुप तरीके से युद्ध में उतरने वाली चाल चल दी। पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपने फाइटर जेट तैनात कर दिए। यह तैनाती दोनों देशों के रक्षा समझौते के तहत की गई, लेकिन इसे ईरान के लिए एक सख्त संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। यह अमेरिका की दोहरी रणनीति थी ताकि एक तरफ बातचीत के जरिए समाधान का दिखावा किया जाए, दूसरी तरफ सैन्य दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाई जाएं।

इस पूरे घटनाक्रम की तुलना 28 फरवरी की उस घटना से भी की जा रही है, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया था। यह हमला ऐसे समय में किया गया था जब दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही थी। जब किसी को हमले की उम्मीद नहीं थी तब ईरान पर अटैक हुआ, जिसमें सुप्रीम लीडर अली खामेनेई मारे गए। इस बात का खतरा पहले से था कि कहीं अमेरिका बातचीत के बीच धोखा न दे दे।