विनोद कुमार शुक्ल ने लेखन और जीवन का अन्तर मिटा दिया था : अशोक वाजपेयी

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नई दिल्ली। भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति में गुरुवार शाम सभा का आयोजन किया गया। राजकमल प्रकाशन और रज़ा फ़ाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह सभा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुई। सभा का आरंभ वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी के वक्तव्य से हुआ। इसके बाद ‘रसचक्र’ और ‘चेमेगोइयाँ’ समूहों की ओर से विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं की पाठ-प्रस्तुति दी गई और वन्दना राग ने उनके उपन्यास से अंशपाठ किया।

इसके बाद अपूर्वानंद, पुरुषोत्तम अग्रवाल, संजीव कुमार, भालचन्द्र जोशी, प्रत्यक्षा, विभूति नारायण राय, शिराज़ हुसैन और आशुतोष भारद्वाज ने विनोद कुमार शुक्ल के लेखन, उनके साहित्यिक अवदान और उनकी भाषा की विरल सादगी पर अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल का लेखन हिन्दी साहित्य में एक ऐसी उपस्थिति है, जो बिना शोर किए जीवन, समाज और समय के जटिल प्रश्नों को अत्यंत सहज और संवेदनशील भाषा में व्यक्त करता है। उनकी भाषा देखने में सहज और साधारण लगती है लेकिन उसके भीतर गहरी अर्थवत्ता, संवेदनशीलता और प्रतिरोध की सूक्ष्म चेतना मौजूद है।

विनोद जी ने एक लगभग अप्रत्याशित समरस जीवन जिया

अपने वक्तव्य में अशोक वाजपेयी ने कहा, विनोद कुमार शुक्ल ने लगभग सत्तर वर्षों का साहित्यिक जीवन जिया जिसमें से अधिकांश समय रायपुर में बीता। वे कृषि महाविद्यालय में अध्यापन करते थे। उनका साहित्य उनके घर, परिवार और पड़ोस से ही उपजा था। जहाँ अक्सर लेखकों के जीवन और उनके साहित्य के बीच दूरी दिखाई देती है, वहीं विनोद कुमार शुक्ल के जीवन और लेखन में यह अंतर लगभग मिट गया था। साहित्य ही उनका जीवन बन गया था।

उन्होंने आगे कहा कि विनोद कुमार शुक्ल ने जीवन में कभी आरोप-प्रत्यारोपों का सहारा नहीं लिया। उन्होंने जिस राह को चुना उस पर जीवन भर स्थिर रहे। उनकी भाषा और दृष्टि देखने में सहज लगती थी, लेकिन उसके भीतर गहरी संवेदनशीलता और अर्थवत्ता थी। साहित्य उनके लिए एक प्रकार का आश्रम था जिसमें वे रहते थे और बाहरी हलचलों से लगभग अप्रभावित रहते हुए रचना करते थे। वे किसी बड़े दार्शनिक सत्य की खोज में नहीं थे बल्कि जीवन से भरे हुए, शांत और सहज लेखक थे।

मासूमियत उनके जीवन और लेखन दोनों की पहचान थी

आशुतोष भारद्वाज ने कहा, विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य उनकी निर्मिति नहीं, वह उनके जिए हुए जीवन की प्रतिलिपि है। उम्र तक के आखिरी पड़ाव तक भी उनकी मासूमियत उतनी ही प्रामाणिक बनी रही। आधुनिक इतिहास में शायद ही किसी एक लेखक ने अपने गृहराज्य को उतना दिया हो जितना छत्तीसगढ़ को विनोद कुमार शुक्ल ने दिया है।

भालचन्द्र जोशी ने विनोद कुमार शुक्ल के साथ बिताए पलों को याद करते हुए कहा, रायपुर में विनोद जी का जन्मदिन भव्य रूप से मनाया जाता था, लेकिन वे स्वयं हमेशा उसी विस्मय और सादगी से बैठे रहते थे। जब पहली बार उनकी कविताएँ मंच पर गाई गईं तो उन्होंने सहज भाव से पूछा-‘अच्छा, मेरी कविताएँ गाई भी जा सकती हैं?’ यही मासूमियत उनके जीवन और लेखन दोनों की पहचान थी। उनके यहाँ आकस्मिकता-चाहे प्रेम हो या मृत्यु-कभी शोर नहीं करती, रचना के शिल्प में घुली रहती है। जो जीवन में नहीं था, उसे वे कविता में जगह दे देते थे। इतनी गहरी संवेदना के साथ जिया गया यह जीवन बिना किसी प्रदर्शन के पूरा हुआ और उसी सहजता से विदा भी हो गया।

उनकी पंक्तियाँ रोशनी से भरी है

प्रत्यक्षा ने कहा, मेरा विनोद कुमार शुक्ल से मिलना किसी निजी अनुभव से नहीं, उनके शब्दों से है-एक लेखक और पाठक के बीच का वह निर्मल रिश्ता, जिसमें कोई अतिरिक्त भार नहीं होता। उन्होंने साधारण जीवन को असाधारण बना दिया और छोटी-छोटी पंक्तियों में ऐसी रोशनी भरी कि कठोरतम संसार में भी मनुष्य की गरिमा, जिजीविषा और सपने बचे रहें। आज हम किसी एक लेखक को नहीं, बल्कि उस मूल्यबोध को याद कर रहे हैं, जिसकी स्मृति उनके शब्दों से भी अधिक देर तक हमारे भीतर ठहरी रहेगी।

विस्मित करता है उनका लेखन

विभूति नारायण राय ने कहा, विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ते हुए मुझे हमेशा यह विस्मय रहा कि कितनी साधारण, रोज़मर्रा की भाषा में वे कितना कठिन और गहन गद्य रच देते थे। उनके शब्द इतने परिचित होते थे कि हम उन्हें हल्का समझ लेते थे, लेकिन वही भाषा बड़े से बड़े सजग पाठक को भी थका देती थी। वे कम बोलते थे, लेकिन उनके साथ बैठना ही एक समृद्धि थी, जैसे उनकी मौन उपस्थिति भी कुछ सिखा रही हो। उनसे मेरी मुलाकातें कम रहीं, लेकिन पचास वर्षों का पाठक होना यही बताता है कि उनकी सादगी के भीतर ही उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक जटिलता थी।

ममताभरी गोद की तरह हैं उनकी रचनाएँ

शिराज़ हुसैन ने कहा, जब शब्दों में कुछ कहना मुमकिन नहीं होता तब भी विनोद कुमार शुक्ल उसे अपने शब्दों में कह देते हैं, यही उनके लेखन की पहचान है। उनकी रचनाएँ उस गोद की तरह हैं, जहाँ डाँट खाकर रोता हुआ बच्चा सुकून पाता है। वे अधूरी तस्वीरों की तरह हैं-ज़िंदा, खुली हुई, लगातार अर्थ रचती हुई। आज विनोद जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी पंक्तियों की लहरों में वे हमारे साथ हैं, समुद्र में उतर चुके दरिया की तरह।

उन्होंने प्रतिरोध का साहित्य रचा

संजीव कुमार ने कहा, मैं विनोद कुमार शुक्ल को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता, लेकिन यह निश्चित रूप से जानता हूँ कि उनका साहित्य सचेत या अचेत रूप से प्रतिरोध का साहित्य है। वे किसी नारे या प्रत्यक्ष वक्तव्य के लेखक नहीं थे; उनकी ताक़त उस दृष्टि में थी, जो यथास्थिति की विचारधारा में धीरे-धीरे सेंध लगाती है। दृश्य में मौजूद अनगिनत चीज़ों में से वे वही दिखाते हैं जो हमें असहज करती है, क्योंकि हम उसे देखने के आदी नहीं हैं। यही विचित्रता, यही अनपेक्षित दृष्टि उनके लेखन को राजनीतिक बनाती है और उन्हें हमारे समय का एक अनिवार्य लेखक।

विद्वत्ता से अधिक प्रज्ञा के लेखक

पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा, विनोद कुमार शुक्ल विद्वत्ता से अधिक प्रज्ञा के लेखक थे। उनकी सबसे बड़ी क्षमता यह थी कि वे जटिल को सहज और बोधगम्य बना देते थे। उनका लेखन किसी पाठक को चुनौती नहीं देता, बल्कि आमंत्रित करता है। उनके यहाँ विस्मय पात्रों में नहीं, पाठकों में पैदा होता है, क्योंकि वे भाषा के ज़रिये उस अर्थ की खिड़की खोलते हैं जिसे हम रोज़ देखते हैं पर पहचानते नहीं। छोटे-छोटे वाक्यों में गूँजता यह लेखन देर तक मन में बना रहता है और यही किसी बड़े लेखक की असली पहचान है।

विनोद कुमार शुक्ल का परिचय

विनोद कुमार शुक्ल का जन्म 1 जनवरी, 1937 को राजनांदगाँव, छत्तीसगढ़ में हुआ। उन्होंने जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं-‘लगभग जयहिन्द’, ‘वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह’, ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’, ‘अतिरिक्त नहीं’, ‘कविता से लम्बी कविता’, ‘कभी के बाद अभी’, ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, ‘आकाश धरती को खटखटाता है’ (कविता-संग्रह); ‘पेड़ पर कमरा’ तथा ‘महाविद्यालय’ (कहानी-संग्रह); ‘नौकर की क़मीज़’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’, ‘हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़’ (उपन्यास)। मेरियोला आफ़्रीदी द्वारा इतालवी में अनूदित एक कविता-पुस्तक का इटली में प्रकाशन, इतालवी में ही ‘पेड़ पर कमरा’ का भी अनुवाद। कई रचनाएँ मराठी, मलयालम, अंग्रेज़ी तथा जर्मन भाषाओं में अनूदित।

मणि कौल द्वारा 1999 में ‘नौकर की क़मीज़’ उपन्यास पर फ़िल्म का निर्माण। ‘आदमी की औरत’ और ‘पेड़ पर कमरा’ सहित कुछ कहानियों पर अमित दत्ता के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘आदमी की औरत’ को वेनिस फ़ि‍ल्म फ़ेस्टिवल के 66वें समारोह (2009) में स्पेशल इवेंट पुरस्कार।

1994 से 1996 तक निराला सृजनपीठ में अतिथि साहित्यकार रहे। उन्हें ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’, ‘गजानन माधव मुक्तिबोध फ़ेलोशिप’,‘राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’, ‘शिखर सम्मान’ (म.प्र. शासन), ‘हिन्दी गौरव सम्मान’ (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान), ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान’, ‘रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ तथा अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य में उपलब्धि के लिए 2023 के ‘पेन अमेरिका नाबोकोव अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया।

वे इन्दिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय से कृषि-विस्तार के सह-प्राध्यापक पद से 1996 में सेवानिवृत्त हुए। 23 दिसम्बर, 2025 को रायपुर, छत्तीसगढ़ में उनका निधन हुआ।



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