दिल्ली में ‘अजीब दास्तां’ का ज़बर्दस्त मंचन, दर्शकों ने खड़े होकर देखा पूरा नाटक

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नई दिल्ली। रंगमंच संस्था ‘प्रासंगिक’ की दिल्ली इकाई द्वारा 5 जुलाई की शाम एलटीजी ऑडिटोरियम के ब्लैक कैनवास स्टूडियो में प्रस्तुत नाटक ‘अजीब दास्ताँ’ का तीसरा मंचन अभूतपूर्व सफलता के साथ सम्पन्न हुआ। वरिष्ठ रंगकर्मी आलोक शुक्ला द्वारा लिखित, निर्देशित एवं परिकल्पित इस नाटक ने इससे पूर्व हिन्दी भवन, गाज़ियाबाद तथा नेशनल थिएटर फेस्टिवल, पटियाला में भी दर्शकों की भरपूर सराहना प्राप्त की थी।

दिल्ली में हुए इस मंचन को लेकर दर्शकों का उत्साह इतना अधिक था कि निर्धारित समय से पहले ही पूरा सभागार भर गया। स्थिति यह रही कि टिकट खिड़की समय से पहले बंद करनी पड़ी, अनेक दर्शकों को वापस लौटना पड़ा, जबकि कई रंगप्रेमियों ने पूरे नाटक का आनंद खड़े होकर लिया। यह प्रस्तुति संस्था के लिए एक यादगार और ऐतिहासिक मंचन बन गई।

नाटक के समापन के बाद आयोजित ‘निर्देशक से संवाद’ सत्र भी अत्यंत भावुक और स्मरणीय रहा। इस अवसर पर नोएडा से आए एक माँ-बेटे ने अपने जीवन का मार्मिक अनुभव साझा किया, जो नाटक में दर्शाए गए नशे की गिरफ्त में फँसे किशोर और उसकी माँ की कहानी से काफी मेल खाता था। उनकी आपबीती सुनकर सभागार में उपस्थित दर्शक, कलाकार और निर्देशक सभी भावुक हो उठे। उल्लेखनीय है कि दर्शक इस संवाद सत्र में भी अंत तक पूरे मनोयोग से उपस्थित रहे तथा नाटक की विषयवस्तु, लेखन और प्रस्तुति पर खुलकर चर्चा की।

प्रस्तुति से एक दिन पूर्व अंतरराष्ट्रीय रंग समीक्षक पंकज शुक्ला द्वारा प्रकाशित नाटक की विस्तृत समीक्षा ने भी दर्शकों में उत्सुकता पैदा की। अनेक दर्शकों ने स्वीकार किया कि वे विशेष रूप से वह समीक्षा पढ़ने के बाद नाटक देखने पहुँचे थे।

प्रस्तुति की सफलता का श्रेय पूरी टीम को देते हुए निर्देशक आलोक शुक्ला ने कहा कि यह उपलब्धि कलाकारों, तकनीकी सहयोगियों और दर्शकों के स्नेह, विश्वास और सहयोग का परिणाम है। उन्होंने कहा कि किसी भी नाट्य रचना को वास्तविक जीवन मंच पर कलाकार ही देते हैं और इस सफलता का सबसे बड़ा श्रेय पूरी टीम को जाता है।

नाटक में मोनाली की भूमिका में कविता, सुरभि के रूप में नतेशा, जानकी के रूप में अंजली, प्रदीप और अनुराग की दोहरी भूमिका में एडवोकेट टेकचंद राजपूत, प्रणय के रूप में मृदुल कुमार. आदित्य उर्फ़ अप्पू की भूमिका में निखिल कुमार, डाकिया की भूमिका में विनय शर्मा, पिता के रूप में प्रताप सिंह, मकान मालकिन के रूप में विजय लक्ष्मी तथा अटेंडेंट की भूमिका में स्वयं आलोक शुक्ला ने प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों की भरपूर प्रशंसा अर्जित की।

मंच सज्जा और सेट निर्माण का पूरा दायित्व टेकचंद ने अत्यंत कुशलता से निभाया। सेट की विशेषता यह रही कि दो परिवारों की समानांतर चलने वाली कहानी में एक परिवार का घर स्टूडियो के ग्रीन रूम को ही रचनात्मक ढंग से रूपांतरित कर तैयार किया गया, जिसने दर्शकों को विशेष रूप से आकर्षित किया। सहयोगी के रूप में लकी मल्होत्रा, तुषार और सौरभ मिश्रा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नाटक का भावपूर्ण संगीत अभ्युदय मिश्रा ने तैयार किया। ध्वनि संचालन की जिम्मेदारी विनय शर्मा ने निभाई, जबकि प्रकाश व्यवस्था का दायित्व टेकचंद और लकी मल्होत्रा ने संभाला। नेपथ्य प्रमुख के रूप में प्रताप सिंह ने कार्य किया। वेशभूषा एवं मेकअप की जिम्मेदारी विजय लक्ष्मी और नीतू शुक्ला ने सफलतापूर्वक निभाई।

प्रस्तुति के समापन पर दर्शकों ने कलाकारों और पूरी टीम का लंबे समय तक तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया। रंगमंच प्रेमियों ने नाटक की संवेदनशील विषयवस्तु, सशक्त लेखन, प्रभावी निर्देशन, सधी हुई मंच-सज्जा और कलाकारों के सजीव अभिनय की मुक्त कंठ से सराहना की।

‘प्रासंगिक’ रीवा की दिल्ली इकाई की इस सफल प्रस्तुति ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि सार्थक, संवेदनशील और सामाजिक सरोकारों से जुड़ा रंगमंच आज भी दर्शकों के मन को गहराई से स्पर्श करने और उन्हें सोचने के लिए प्रेरित करने की अद्भुत क्षमता रखता है।



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