हिंदी भवन में दो दिवसीय संगोष्ठी के पहले दिन स्वतंत्रता आंदोलन, साहित्य, राष्ट्रीय एकता और मातृभूमि की अवधारणा पर हुआ विमर्श।
नई दिल्ली। साहित्य अकादेमी ने अखिल भारतीय साहित्य परिषद के सहयोग से हिंदी भवन, नई दिल्ली में 2-3 नवंबर को ‘मातृस्वरूप, मातृभाव और मातृभूमि : वंदे मातरम् और भारतीय राष्ट्रीय चेतना का अभ्युदय’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। संगोष्ठी का उद्घाटन राष्ट्रगान और वंदे मातरम् के गायन के साथ हुआ। पहले दिन आयोजित तीन शैक्षणिक सत्रों में वक्ताओं ने वंदे मातरम् की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक चेतना के विभिन्न पहलुओं पर विचार व्यक्त किए।
वंदे मातरम् में प्रतिबिंबित होती है भारत की सांस्कृतिक चेतना
उद्घाटन सत्र में साहित्य अकादेमी के सचिव वरुण गुलाटी ने भारतीय बौद्धिक और दार्शनिक परंपरा की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन दृश्य के भीतर अदृश्य और प्रत्येक व्यक्ति में समग्र एकता की चेतना को पहचानने की दृष्टि प्रदान करता है। इसी कारण भारतीय परंपरा में नदी केवल जलधारा, पर्वत केवल चट्टानों का समूह और भूमि केवल भौगोलिक विस्तार नहीं है, बल्कि इनका गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भूमि केवल जन्मस्थान होने के कारण मां बनती है या हजारों वर्षों के सांस्कृतिक संबंध उसे मातृस्वरूप प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रश्न का सार वंदे मातरम् की आत्मा में निहित है।
मुख्य वक्ता एवं ऑर्गनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया में भाषा और साहित्य की भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा वंदे मातरम् की रचना, बंगदर्शन में इसके प्रथम प्रकाशन और बाद में उपन्यास आनंदमठ में शामिल किए जाने की ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में इस गीत को स्वरबद्ध कर प्रस्तुत किया और 1905 में बंगाल विभाजन के दौरान यह राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभावशाली आह्वान बन गया।
उन्होंने दो महत्वपूर्ण सवाल उठाए कि संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में रचित यह गीत किस प्रकार राष्ट्रीय मंत्र बना और बाद में राजनीतिक विवाद का विषय क्यों बना। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ का वास्तविक महत्व इन सवालों को समझने और उनके उत्तर तलाशने में है।
भारतीय शिक्षा मंडल के अखिल भारतीय संगठन मंत्री बी.आर. शंकरानंद ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि 150 वर्ष बाद भी वंदे मातरम् के शब्द देशभक्ति और राष्ट्रीय गौरव की गहरी भावना जगाते हैं। उन्होंने एक क्रांतिकारी के बलिदान का प्रसंग साझा किया, जो फांसी से पहले अपनी मातृभूमि को अंतिम बार देखना चाहता था। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् लोगों को व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर मातृभूमि के सम्मान और गरिमा की रक्षा के लिए प्रेरित करता है। साहित्य अकादेमी की अंग्रेजी संपादक स्नेहा चौधरी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की महत्वपूर्ण भूमिका
पहले शैक्षणिक सत्र का विषय ‘भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और वंदे मातरम्’ था, जिसकी अध्यक्षता पवन पुत्र बादल ने की। वेद मित्रा शुक्ला ने भारतीय प्रतिरोध साहित्य की परंपरा में वंदे मातरम् के विभिन्न रूपों और अभिव्यक्तियों पर चर्चा की। मुन्ना तिवारी ने गीत की रचना के समय की ऐतिहासिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए इसके वास्तविक अर्थ को समझने के लिए अपनी सांस्कृतिक पहचान को जानने की आवश्यकता बताई।
महाराज कृष्ण भरत ने भारत की प्राचीन सनातन सांस्कृतिक विरासत, वसुधैव कुटुम्बकम के आदर्श और विदेशी आक्रमणों का प्रतिरोध करने वाले वीर योद्धाओं के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, विक्रमादित्य, महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को याद किया। सत्राध्यक्ष पवन पुत्र बादल ने समाज को जागृत करने की आवश्यकता पर बल देते हुए भगवान हनुमान द्वारा विभीषण को जगाने और कुंभकर्ण द्वारा रावण को जगाने के प्रसंग का उदाहरण दिया।
वंदे मातरम् : राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक
दूसरे सत्र का विषय ‘वंदे मातरम् : एकीकरण का स्रोत’ था। इसकी अध्यक्षता शाद रमजान ने की। नीलम सरिन ने कहा कि भारत की राष्ट्रीय चेतना विभिन्न भाषाओं, पहनावे, खानपान और जीवनशैली के बावजूद मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, एकता और देशभक्ति के भाव से जुड़ी है।
राजेश चौहान ने वंदे मातरम् को केवल गीत नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक चेतना का अभिन्न अंग बताया। जय सिंह यादव ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ के संदर्भों का उल्लेख करते हुए मां को सृष्टि की ऐसी महान अभिव्यक्ति बताया, जो अपनी संतानों का पालन-पोषण, संरक्षण और मार्गदर्शन करती है।
अध्यक्ष शाद रमजान ने कश्मीर की सांस्कृतिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भूमि, गाय और चंद्रमा को भी मातृस्वरूप में सम्मान दिया जाता है। उन्होंने ललद्यद और आनंदवर्धन जैसे साहित्यिक व्यक्तित्वों का स्मरण करते हुए कहा कि वंदे मातरम् की भावना कश्मीर की सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपराओं में भी गहराई से समाहित है।
वंदे मातरम् की आंतरिक चेतना और भारतीय पहचान
तीसरे सत्र का विषय ‘वंदे मातरम् की आंतरिक कार्यप्रणाली’ था। इसकी अध्यक्षता मुरलीमनोहर पाठक ने की। प्रियंका वैद्य ने कहा कि भारतबोध को समझने के लिए वंदे मातरम् की मूल भावना को समझना आवश्यक है। उन्होंने मन और समाज को विखंडित करने वाली प्रवृत्तियों के विरुद्ध इसकी भूमिका पर प्रकाश डाला।
मुक्ति शर्मा ने वंदे मातरम् को भारत की पहचान और सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति बताते हुए मातृभूमि को पोषण और संरक्षण देने वाली मां के रूप में प्रस्तुत किया। रंजीत कौर संधू ने मुगल आक्रमणों के दौरान श्री गुरु नानक देव की शिक्षाओं और प्रतिक्रियाओं का उल्लेख किया। उन्होंने सरबत दा भला और लंगर की परंपरा को समानता, सर्वकल्याण और मातृभूमि के प्रति प्रेम के महत्वपूर्ण आदर्शों के रूप में रेखांकित किया।
सत्राध्यक्ष मुरलीमनोहर पाठक ने कहा कि वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पिछले डेढ़ सौ वर्षों में राष्ट्र की यात्रा, सामूहिक चेतना और राष्ट्रीय भावना के विकास को समझने का अवसर है।
सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ पहले दिन के कार्यक्रम का समापन
शैक्षणिक सत्रों के बाद भारती दीक्षित ने ‘गाथा वंदे मातरम् की’ विषय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इसके साथ संगोष्ठी के पहले दिन के कार्यक्रम संपन्न हुए। संगोष्ठी के दूसरे और अंतिम दिन 3 नवंबर को इसी स्थान पर चार और शैक्षणिक सत्रों तथा समापन सत्र का आयोजन किया गया, जिनमें वंदे मातरम् के साहित्यिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व के विभिन्न आयामों पर विमर्श हुआ।
