नई दिल्ली। साहित्य अकादेमी द्वारा अखिल भारतीय साहित्य परिषद के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘मातृस्वरूप, मातृभाव और मातृभूमि : वंदे मातरम् और भारतीय राष्ट्रीय चेतना का अभ्युदय’ मंगलवार को संपन्न हुई। संगोष्ठी के दूसरे और अंतिम दिन विभिन्न सत्रों में वक्ताओं ने भारतीय साहित्य, स्वतंत्रता आंदोलन, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में वंदे मातरम् की भूमिका पर विचार व्यक्त किए।
भारतीय साहित्य पर वंदे मातरम् का प्रभाव
दूसरे दिन के चौथे सत्र का विषय ‘भारतीय साहित्य पर वंदे मातरम् का प्रभाव’ था। नीलम राठी की अध्यक्षता में आयोजित इस सत्र में मुकेश नौटियाल ने अपने बचपन के अनुभव साझा करते हुए बताया कि विद्यालयों में नियमित रूप से वंदे मातरम् गाए जाने से इस गीत के प्रति गहरा भावनात्मक जुड़ाव पैदा हुआ। उन्होंने इसकी तुलना मां की लोरी से होने वाले आत्मीय संबंध से की।
मंजू सरकार ने वंदे मातरम् को स्वतंत्रता संघर्ष का शक्तिशाली मंत्र बताते हुए कहा कि इसने लोगों के मन में स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गौरव की भावना जगाई। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के पौत्र सजल चट्टोपाध्याय ने गीत की रचना से जुड़ी पारिवारिक स्मृतियां साझा कीं। उन्होंने बताया कि किस प्रकार एक मंदिर में देवी की जीर्ण-शीर्ण प्रतिमा देखकर उनके दादा के मन में मातृशक्ति और भारत माता की मुक्ति का विचार आया, जिसने वंदे मातरम् की रचना की प्रेरणा दी।
सत्र की अध्यक्ष नीलम राठी ने कहा कि साहित्य हमेशा राजनीति और समाज को दिशा देता रहा है। प्रेमचंद के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम् के माध्यम से राष्ट्र को प्रेरित करने और मार्गदर्शन देने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
वंदे मातरम् के 150 वर्ष और समग्र शिक्षा की अवधारणा
पांचवें सत्र ‘150 साल के वंदे मातरम्’ की अध्यक्षता कृष्णा शर्मा ने की। सुशील द्विवेदी ने वंदे मातरम् की 150 वर्षों की यात्रा को भारतीय इतिहास और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ी महत्वपूर्ण विरासत बताया। उन्होंने गीत के छह छंदों को संपूर्ण साहित्यिक कृति बताते हुए बंकिम चंद्र की समग्र शिक्षा संबंधी दृष्टि की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
ओ.पी. झा ने कहा कि अकादमिक विमर्श तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने वंदे मातरम् को केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का साकार मंत्र बताया। सत्राध्यक्ष कृष्णा शर्मा ने कहा कि वंदे मातरम् की यात्रा भारत के संघर्ष, इतिहास और परिवर्तन की यात्रा है। उन्होंने भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों का उल्लेख करते हुए इस गीत को राजनीतिक विचारधाराओं से ऊपर उठकर संरक्षित की जाने वाली राष्ट्रीय विरासत बताया।
मातृभूमि की अवधारणा और भारतीय सांस्कृतिक चेतना
छठे सत्र का विषय ‘वंदे मातरम् और मातृभूमि भारत की कल्पना’ था। अवनिजेश अवस्थी की अध्यक्षता में आयोजित इस सत्र में शलीना चतुर्वेदी ने नृत्य के माध्यम से वंदे मातरम् के भावों और कल्पनाओं को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि गीत के छह छंदों में वात्सल्य, भक्ति और वीर रस सहित अनेक भाव समाहित हैं।
राजेश अत्रेय ने कहा कि मां केवल जन्म देने और पालन-पोषण करने वाली नहीं, बल्कि मार्गदर्शन और संरक्षण प्रदान करने वाली भी है। मातृभूमि भी हमें जन्म देती है, हमारा पोषण करती है और अंततः हम उसी प्रकृति में विलीन हो जाते हैं। उन्होंने युवाओं से अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने और मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने का आह्वान किया।
प्रणव खुल्लर ने कहा कि भारत की राष्ट्रीयता उसकी दार्शनिक और सांस्कृतिक विरासत में निहित है। श्री अरविंद के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि वंदे मातरम् ने मातृभूमि को दिव्य मातृशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया। अध्यक्ष अवनिजेश अवस्थी ने आधुनिक चुनौतियों के बीच इस गीत की प्रासंगिकता पर बल दिया। उन्होंने ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ के भाव को भारतीय सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण आधार बताया।
स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की भूमिका पर चर्चा
सातवें सत्र ‘150 साल का वंदे मातरम्’ की अध्यक्षता जगबीर सिंह ने की। महेश कुमार पांडे ने स्वतंत्रता आंदोलन में इस गीत की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने मध्य प्रदेश के चुरखी गांव का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां दिन की शुरुआत वंदे मातरम् के गायन से करने की परंपरा है, जिसके बाद राष्ट्रगान जन गण मन गाया जाता है।
डी. उमा देवी ने प्रख्यात तमिल साहित्यकार सुब्रमण्य भारती द्वारा वंदे मातरम् के तमिल अनुवाद और उसके प्रकाशन तथा दक्षिण भारत में पड़े प्रभाव पर चर्चा की। पान सिंह ने समकालीन युवाओं की जिम्मेदारी और वंदे मातरम् की प्रासंगिकता पर विचार रखे। अध्यक्ष जगबीर सिंह ने युवाओं के बीच इस गीत के महत्व और उसकी ऐतिहासिक भूमिका के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता बताई।
वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर पुस्तिका का विमोचन
समापन सत्र में ‘वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ का उत्सव’ शीर्षक पुस्तिका का विमोचन किया गया। साहित्य अकादेमी के सचिव वरुण गुलाटी ने कहा कि वंदे मातरम् राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है और किसी राजनीतिक समर्थन पर निर्भर हुए बिना अपनी स्वतंत्र पहचान रखता है। उन्होंने भारत को निरंतर विकसित होती सभ्यता बताया।
शफी शौक ने छठी शताब्दी में कश्मीर में रचित नीलमत पुराण का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें देश के विभिन्न हिस्सों को पवित्र बताया गया है। उन्होंने वंदे मातरम् की मूल भावना को मातृभूमि की पवित्रता की रक्षा और संरक्षण से जोड़ा।
संजीव चोपड़ा ने बंगाल के भीषण अकाल के दौरान वंदे मातरम् की रचना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने मदन लाल ढींगरा का भी उल्लेख किया, जिन्हें अंग्रेजों ने इस गीत के गायन के दौरान फांसी दी थी। गीत की समकालीन प्रासंगिकता पर बात करते हुए उन्होंने स्वच्छ हवा और स्वच्छ पानी जैसे विषयों को भविष्य की आवश्यकताओं से जोड़ा।
मुख्य अतिथि एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी ने वंदे मातरम् को ‘शब्दों का शासन’ बताते हुए कहा कि यह गीत लोगों और उनकी भूमि के बीच गहरा संबंध स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि यह भारतीयता के सार, संस्कृति और इतिहास पर गर्व की भावना को मजबूत करता है तथा राष्ट्रीय चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अंत में साहित्य अकादेमी के उप सचिव एन. सुरेश बाबू ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस प्रकार दो दिवसीय संगोष्ठी का समापन वंदे मातरम् की ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने तथा नई पीढ़ी तक पहुंचाने के संकल्प के साथ हुआ।
