मातृभाषा ही चिन्‍तन और विचारों को आकार देती है : चन्द्रशेखर कंबार


केंद्रीय हिंदी संस्‍थान, अंतरराष्‍ट्रीय सहयोग परिषद तथा विश्‍व‍ हिंदी सचिवालय के तत्‍वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार की ओर से अंतरराष्‍ट्रीय मातृभाषा दिवस की पूर्व संध्‍या पर मातृभाषा और रचनाशीलता विषयक संगोष्‍ठी आयोजित हुई…


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साहित्य Updated On :

केंद्रीय हिंदी संस्‍थान, अंतरराष्‍ट्रीय सहयोग परिषद तथा विश्‍व‍ हिंदी सचिवालय के तत्‍वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार की ओर से अंतरराष्‍ट्रीय मातृभाषा दिवस की पूर्व संध्‍या पर मातृभाषा और रचनाशीलता विषयक संगोष्‍ठी आयोजित हुई। उक्त संगोष्ठी में कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि तथा साहित्य अकादमी के अध्यक्ष चन्‍द्रशेखर कंबार ने अपने उद्बोधन में मातृभाषा की महत्‍ता को रेखांकित करते हुए कहा कि मातृभाषा ही चिन्‍तन और विचारों को आकार देती है। कन्‍नड़ साहित्‍य के विभिन्‍न आयामों पर प्रकाश डालते हुए उन्‍होंने कहा कि मातृभाषा के साथ-साथ अन्‍य स्‍थानीय भाषाओं को बढ़ाने के लिए हमें अनुवाद और प्रौद्योगिकी का उपयोग करना चाहिए।

प्रसिद्ध नाटककार एवं इस वर्ष साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित दयाप्रकाश सिन्‍हा ने भाषा के विकास के लिए राजाश्रय का संकेत देते हुए भारत में भी शिक्षा का माध्‍यम मातृभाषा में किए जाने की बात कही। वहीं साहित्य अकादमी से सम्मानित तेलुगु लेखक निखिलेश्‍वर ने जहाँ भाषायी विवधिता को बढ़ावा देने के लिए अनुवाद की वकालत की तो मराठी लेखक सदानन्‍द श्रीधर मोरे ने चक्रधर जी तथा संतज्ञानेश्‍वर के कामों को रेखांकित करते हुए मराठी साहित्‍य की परंपरा के अनछुए पहलुओं को उजागर किया तथा उसके संदर्भ में भारतीय भाषाओं के विकास की बात प्रमुखता से की। इस क्रम में विचारक मनोज श्रीवास्‍तव ने मातृभाषा को व्‍यक्ति के विकास के लिए अनिवार्य बताते हुए कहा कि जिस तरह मां बच्‍चे का पोषण करती है उसी तरह मातृभाषा सजृन शीलता को पल्‍लवित पुष्पित करती है।
अंतरराष्‍ट्रीय सहयोग परिषद के मानद निदेशक नारायण कुमार ने कहा कि दुनिया की सभी श्रेष्‍ठ रचनाएं मातृभाषा में ही हुई है। वहीं वरिष्‍ठ पत्रकार व भाषाकर्मी राहुल देव ने कहा कि मातृभाषा आत्‍म को निर्मित करती है। परिवेश और एकात्‍मकता ही सभी तरह की सजृनशीलता का उत्‍स है। संगोष्‍ठी का समाहार करते हुए केंद्रीय हिंदी शिक्षण मण्‍डल के उपाध्‍यक्ष अनिल शर्मा जोशी ने कहा कि रचनाशीलता का मातृभाषा से सीधा रिश्ता है।

संगोष्‍ठी का संचालन करते हुए हंसराज कॉलेज के सहायक प्रोफेसर विजय कुमार मिश्र ने कहा कि अंतरराष्‍ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने का उद्देश्‍य है भाषाओं और भाषायी विविधता को बढ़ावा देना। प्रकृति में बने रहने की शर्त ही सृजन और रचनाशीलता है। उन्होंने कहा कि दुनिया की सारी भाषाएं, सारी संस्‍कृतियां एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं तथा एक दूसरे से संजीवनी प्राप्‍त करती हैं।

हिंदी भवन, भोपाल के निदेशक जवाहर कनार्वट ने संगोष्‍ठी की आधारशिला रखी और शिलांग केंद्र के क्षेत्रीय निदेशक ने अतिथियों का स्‍वागत किया। अंत में प्रो. राजेश कुमार ने सभी प्रतिभागियों को धन्‍यवाद ज्ञापित किया।



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