दाखिल खारिजों से नहीं
जब हमलावर आते हैं तो भाग खड़े होते हैं
हाकिम, हुक्काम, सहाफी, दानिश्वर, लीडर
तब एक छोटी-सी तरकारी और एक छोटा-सा फल सीना तानकर खड़ा हो जाता है
मैं बचाऊंगा अपने शहर का वजूद
मैं बंडा हूं फैजाबादी
मैं अमरूद हूं इलाहाबादी
बंडे को अयोध्या से कोई सोहबत नहीं
न अमरूद को प्रयागराज से….
सोचो-सोचो, एक तरकारी, एक फल भी तुम नहीं बदल सकते
इतिहास तो क्या ही बदलोगे
वे जो तुमसे पहले आए थे, तुम्हारे जुड़वां-घोड़ों की रासें थामें
शमशीरें लहराते,खूनों-खच्चर मचाते
भले ही उनके नाम रहे हों-गोरी, गजनी, अब्दाली,नादिर, तैमूर
वे भी इतिहास ही पलटलने आए थे
नहीं पलट सके कुछ भी-
न गंगा को
न यमुना को
न चिनाब को
न झेलम को
जो सोचते हैं कि वे बदल सकते हैं कुछ भी
दरअसल वे न नदियों के बारें कुछ जानते हैं, न तरकारियों के, न फलों के
जबकि सभ्यताएं इन्हीं चीजों से जिंदा रहती हैं
दाखिल-खारिजों से नहीं।
रात (एक)
रात, गहरी रात है
डूबता है एक सितारा और अपनी गर्त में
बांहों में सिमटता जा रहा हूं उस अमा के
खांसती है चांदनी और फिर
मखमली सपने तिमिर में डोलते हैं
पर, नहीं कुछ बोलते हैं
और एक मकतूल अपना ही जनाजा यों उठाए जा रहा है
एक ही तो रात है
बीत जाएगी, रीत जाएगी कुटिल सत्ता भी आखिर एक दिन। और तब, तुम तब भी इसी छल को बल कहोगे
सूखते हैं गात सबके एक दिन
उनके भी जो स्वर्णावलेहलसित हैं
तनिक सोचो,सोचो तनिक
वधिक होने में भला क्या मिलता रहा है तुम्हें ।
रात (दो)
एक रुनझुन तुम्हारी है, झनकती रात प्यारी है
अलसाया हुआ वह एक सूरज
है उदित होने को आतुर
उदयाचल पर कौन दस्तक दे रहा है
डोलती है नाव डगमग
और मैं विरही, हजारों बार का शापित
तुम्हारे उर से निष्कासित भंवर की पतवार लेकर
बढ़ रहा हूं घोर माया के डगर में
कामना के पंख सब टूटे हुए हैं
लुट चुका है बाजार
और, रात , फिर बेबात पागल हो रही है
हंस रही है सर्पिणी सी।
रात (तीन)
घुग्घू घूरते हैं, सरसराती रैन में
बेचैन परछाइयों के पाछे-पाछे भागती हैं लोमड़ियां, हुआंते हैं सियार
दूर, उस पार मरजीवणों की तीव्र उठती चिरायंध
रगड़ खाती हैं टहनियां
और फिर धधक उठता है दावानल
रक्तरंजित दिशाएं कूकती हैं
छूटती है महानिल की धार
जंगजू जख्मी पड़े हैं हर तरफ
सहस्रों वासुकि फण फुलाए घूमते हैं
झूमते हैं आक्षितिज रजनीचर।









