भारतीय पत्रकारिता अंग्रेजी हुकूमत के तानाशाही और भ्रष्टाचार से लड़ते हुए आगे बढ़ी – रामशरण जोशी

प्रदीप सिंह प्रदीप सिंह
मत-विमत Updated On :

उदन्त मार्तण्ड भारत का पहला हिंदी भाषा का समाचार पत्र था। इसकी शुरुआत 30 मई 1826 को कलकत्ता से पंडित जुगल किशोर शुक्ल द्वारा की गई थी। इस लिहाज से 30 मई को हिंदी पत्रकारिता का दो सौ वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। भारतीय पत्रकारिता अंग्रेजी हुकूमत के तानाशाही और भ्रष्टाचार से लड़ने के साथ शुरू होती है। जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने पत्रकारिता का जो मानक तैयार किया, भारतीय पत्रकार आजादी के पहले तक उसे अपना मूल धर्म मानते रहे। तब नई-नई आजादी पाए देश के सामने समाज की बेहतरी और आधुनिक भारत का निर्माण करने का सपना था। देश की राजनीति का जो आदर्श था वही भारत के पत्रकारिता का भी लक्ष्य था। लेकिन राजनीति के क्षरण के साथ ही भारतीय पत्रकारिता अब सत्ता और कॉर्पोरेट के गोद में बैठ गयी है। भारतीय पत्रकारिता के विगत, वर्तमान और भविष्य पर वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी से प्रदीप सिंह की बातचीत का संपादित अंश:

प्रश्न :  भारत में छापे की पहली मशीन 1674 में आयी थी। लेकिन पत्रकारिता इसके 100 साल बाद 1776 में शुरू हुई। क्या भारत के लोग स्वभावत: समाचार लेना और देना कम पसंद करते हैं?  

राम शरण जोशी :  भारतीय पत्रकारिता के चरित्र को समझने के लिए हमें इसके विगत में जाना होगा। भारतीयों का मिजाज औपचारिक संवाद में नहीं के बराबर रहा। हम लोग अनौपचारिक और श्रुति परंपरा के रहे हैं। यहां तक कि मुगल काल और अंग्रेजी शासन तक हमारे समाज में श्रुति परंपरा किसी न किसी रूप में रही है। इसलिए औपचारिक पत्रकारिता की शुरुआत हमारे देश में देर से हुई। इस दृष्टि से हमलोग पश्चिम और चीन की पत्रकारिता से कुछ पीछे रहे हैं। बहुत अधिक विगत में जाते हुए मैं यह कह सकता हूं कि राजा-महाराजा या सामंती काल में दूसरे तरह की पत्रकारिता रही है, वह राजदरबारी पत्रकारिता थी। हम सभी जानते हैं कि दरबारी कवि हुआ करते थे। मुगल काल में दरबारी इतिहासकार रहा करते थे। लेकिन 17वीं सदी में औरंगजेब ने जरूर इस दिशा में कुछ प्रगति की। उन्होंने सुनियोजित ढंग से अपने आदमियों के माध्यम से अपनी रियाया की खबरों को एकत्रित करना शुरू किया। जिसमें विरोधियों की गतिविधियों के अलावा बाजार भाव जैसे मुद्दे भी शामिल थे। ये सही है कि छापाखाना के भारत में प्रवेश 17वीं सदी में हो गया था। आप जानते ही हैं कि 14वीं सदी में सबसे पहले जर्मनी में छापाखाना या प्रिटिंग प्रेस का अविष्कार हुआ था और इसके जनक थे जोहान गुटेनबर्ग।

प्रश्न : भारत का पहला अखबरा 1780 में निकलने वाला बंगाल गजट है। जेम्स ऑगस्टस हिक्की का दो पन्ने वाला यह अखबार ईस्ट इंडिया कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए सिरदर्द था। इस तरह भारत में पत्रकारिता की शुरुआत बहुत ही निर्भय तरीके से हुई। लेकिन बाद में यह धारा लुप्त हो गयी?   

राम शरण जोशी :  चूंकि यूरोप में सबसे पहले औद्योगिक क्रांति हुई। तो जाहिर है कि वहां पत्रकारिता की शुरुआत पहले होनी ही थी। जहां तक भारत का सवाल है, जैसा कि हम सभी जानते है कि 18वीं सदी के अंतिम चरण में दो अंग्रेजों ने ही इसकी शुरुआत की थी। लेकिन जो सबसे औपचारिक अखबार था वह जेम्स ऑगस्टस हिक्की का बंगाल गजट था। इसे कलकत्ता गजट के नाम से भी जानते हैं। इसके संस्थापक जेम्स ऑगस्टस हिक्की स्वयं ईस्ट इंडिया कंपनी के मुलाजिम थे। तत्कालीन ईंस्ट इंडिया कंपनी के कुछ अधिकारियों में भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर फैला हुआ था। हिक्की को ये बर्दाश्त नहीं हुआ। उन्होंने अंग्रेज होते हुए भी अपने सह-जातीय अधिकारियों के भ्रष्ट कारनामों को उजागर करना शुरू कर दिया। उन्हें कई बार चेतावनी दी गई। लेकिन वे अड़े रहे। उन्हें नौकरी से बर्खास्त किया गया। लेकिन भ्रष्टाचार, कदाचार पर उन्होंने कोई समझौता नहीं किया। अंतत: उन्हें जेल में डाल दिया गया। और फिर वह इंग्लैंड चले गए। इस प्रकरण से ये तो स्पष्ट हो जाता है कि पत्रकारिता का मूल धर्म क्या है? और वह किसके प्रतिबद्ध है। दूसरे शब्दों में पत्रकारिता का मूलकर्म है सत्ताधारियों के चरित्र को जनता के समक्ष रखना। चाहे वह किसी की सत्ता क्यों न रहे। जेम्स हिक्की चाहते तो वो भी “गोदी पत्रकारिता” की शुरुआत कर सकते थे। लेकिन वह ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता के सामने नहीं झुके और पत्रकारिता के मूल कर्म को निभाते रहे।

प्रश्न : गुलामी के दौर में और आजादी के बाद भी हिक्की और उनकी पत्रकारिता ही भारतीय पत्रकारिता और पत्रकारों के आदर्श रहे, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी कई पत्रकार जेल गए, यातनाएं सहीं लेकिन सत्य और तथ्य का मार्ग नहीं छोड़ा?

राम शरण जोशी :  जब हम 19वीं सदी में प्रवेश करते हैं तब हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं की शुरूआत मिशनरी पत्रकारिता से होती हैं। तत्कालीन ईसाई मिशनरियों ने ईसाइत के प्रचार के लिए कलकत्ता से दो एक पत्र प्रकाशित करने शुरू किया। पहले अंग्रेजी में फिर हिंदी व बांग्ला में। हिंदी अनुवाद के लिए उन्होंने राजस्थान से कुछ लोगों को चर्च में नियुक्त किया। और ईसा मसीह का प्रचार पत्रिकाओं के माध्यम से शुरू किया।

इसके पश्चात 1826 में उदंत मार्तंड का प्रकाशन शुरू हुआ। इसके कर्ताधर्ता थे जुगल किशोर शुक्ल। उन्होंने आर्थिक तंगी के बावजूद उदंत मार्तंड को निकाला। लेकिन इसकी अकाल मृत्यु आर्थिक कारणों से हुई। यह वह समय था जब भारतीय पत्राकारिता एक तरह से मिशनरी पत्रकारिता की विचारधारा को सामने रख कर चल रही थी। 19वीं सदी के पूर्वाद्ध में समाज सुधार की अनेक पत्र-पत्रिकाएं निकलीं। जिनमें प्रमुख नाम है राजा राम मोहन राय का। इन्होंने सती प्रथा के विरुद्ध, विधवा विवाह के पक्ष में पत्र-पत्रिकाएं निकाली। ये पत्रिकाएं बंगला, अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी में छपती रही। जब तक वह जीवित रहे तब तक इनका प्रकाशन होता रहा। इसके बाद 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय उर्दू के अखबारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस संदर्भ में दिल्ली, आगरा और कुछ अन्य जगह से छपने वाले अखबार रहे हैं। जो खुलकर के स्वतंत्रता सेनानियों के पक्ष में लिखा करते थे। 10 मई 1857 से जो क्रांति की चिंगारी शुरू हुई थी वो पूरे उत्तर भारत और अन्य राज्यों में फैली। जहां तक मुझे याद है उर्दू का एक अखबार होता था पयामे आजादी। इसके संपादक और पाठक तक को फांसी की सजा हुई।

ऐसा ही अन्य जगह हुआ। एक अन्य अखबार था बंगला और हिंदी में ‘समाचार सुधावर्षण’। इसके संपादक श्यामसुंदर सेन थे। पत्र अपनी निर्भीकता एवं प्रगतिशीलता के कारण कई बार अंग्रेज़ सरकार का कोपभाजक बना। इसके अलावा कई और अखबार उत्तर भारत से निकले।

प्रश्न : आजादी के पहले अधिकांश अखबारों और पत्रिकाओं का स्वर समाज सुधार का था, चाहे वे सत्ता समर्थक रहे हों या सत्ता विरोधी। उनके सामने एक जागरूक समाज और आदर्श राज्य बनाने का लक्ष्य था?

राम शरण जोशी: देश में जैसे-जैसे राजनीतिक चेतना का विस्तार हुआ। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र से कई पत्र-पत्रिकाएं निकलीं। जिसमें पाक्षिक, साप्ताहिक और दैनिक निकलते रहे। पूरा 19वीं सदी मिशनवादी पत्रकारिता की रही है। मिशनवादी पत्रकारिता से सीधा तात्पर्य ये है कि आप समाज और देश के कार्यों के प्रति समर्पित हैं। और इस समर्पण में हानि-लाभ की चिंता नहीं करते। कबीर के शब्दों में “जो घर फूंके आपनो चले हमारे संग”।

मैं बता दूं कि भारत में ही नहीं पश्चिम में भी मिशनवादी पत्रकारिता का एक दौर रहा है। इस दृष्टि से कार्ल मार्क्स का लेखन प्रसिद्ध है। कार्ल मार्क्स ने अंग्रेजी साम्राज्यवाद और 1857 के संग्राम के बारे में काफी कुछ लिखा है। वे अमेरिका के न्यूयार्क ट्रिब्यून को अपना लेख भेजा करते थे। पत्रकारिता को मैं राजनीति और समाज सापेक्ष मानता हूं। जैसे-जैसे समाज, राजनीति औऱ आर्थिक गतिविधियों का विस्तार होगा, वैसे-वैसे पत्रकारिता का विस्तार होता जायेगा। हम सभी जानते हैं कि 19वीं सदी में भारत मे रेल की शुरुआत हो चुकी थी। टेलिग्राफ की शुरुआत हो चुकी थी। 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई थी। इस सदी में ही बंगाल में पुनर्जागरण देखने को मिलता है। चाहे समाज का क्षेत्र हो या शिक्षा का, वहां बड़े-बड़े समाज सुधार हुए। आर्य समाज का उदय भी इसी समय हुआ। जाहिर है इसका प्रभाव पत्र-पत्रकारिता पर पड़ा।

आप जानते हैं कि भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक पत्रकारिता का पितामह माना जाता है। उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाएं निकालीं।19वीं सदी के अंत तक हिंदी में कई साहित्यिक पत्रिका निकलने लगी। इसमें प्रमुख थी सरस्वती। इसके संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी रहे। इसके साथ ही आगरा, लखनऊ, बनारस, पटना, इंदौर और जयपुर जैसी जगहों से पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ। अभी तक एक मिशनवादी पत्राकारिता का दौर था। क्योंकि अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक वातावरण बनता जा रहा था। लेकिन अंग्रेजी अखबार अंग्रेजी शासन के समर्थक थे। लेकिन देसी पत्र-पत्रिकाएं अंग्रेजी शासन के विरोध में थी। गुजराती, तमिल और मराठी भाषाओं में भी पत्र निकले। जिसमें मुंबई समाचार, मराठा, केसरी जैसे अखबारों को गिन सकते हैं।

प्रश्न : स्वतंत्रता संग्राम में शामिल अधिकांश नेता पत्रकार भी थे। इसका क्या कारण था?

राम शरण जोशी: देश की आजादी में शामिल नेता कार्यकर्ता अपनी बात को जनता तक ले जाने के लिए पत्र-पत्रिकाओं का सहारा लिया। क्योंकि अंग्रेजी अखबार सत्ता के समर्थक थे तो देशभक्तों की बात तो वह चापते नहीं थे। 20वीं सदी में प्रवेश करने के साथ-साथ भारत में राजनीतिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं। इसी दौरान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कई नेता भारतीय क्षितिज पर चमकना शुरू हो जाते हैं। जिनमें बाल गंगाधर तिलक और  बंगाल के कई नेता शामिल हैं। और इसके साथ ही दैनिक अखबारों की शुरुआत होती है। अभी तक भारत की पत्रकारिता की धारा मिशनवादी हो रहती है। 1915 में महात्मा गांधी के आगमन के साथ-साथ राजनीतिक आंदोलन तेज होता है। गांधी जी स्वयं एक अच्छे पत्रकार थे। उनका हिंद स्वराज प्रश्नोत्तर शैली में लिखी गई है।

गांधी एक अच्छे संपादक रहे हैं। उन्होंने गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी में पत्रिकाएं निकाली। वे अपनी पत्रिकाओं के लिए विज्ञापन स्वीकार नहीं किया करते थे। वे पाठक के दम चला करती थीं। मौलाना आजाद ने भी दो पत्रिकाएं उर्दू में शुरू की थी ताकि मुस्लिम समाज में जागरुकता फैलाया जा सके। पं नेहरु ने भी हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में दैनिक निकाले। नेशनल हेरल्ड का स्थापना हुई। मैं गणेश शंकर विद्यार्थी को याद करना चाहूंगा। जिन्होंने ‘प्रताप’ निकाला था। वे आजादी की लड़ाई और सांप्रदायिक सद्भाव को समर्थन देते रहे और अंत में सांप्रदायिकता से लड़ते हुए अपनी शहादत दी।

माखन लाल चतुर्वेदी ने ‘कर्मवीर’ साप्ताहिक निकाला। कालाकांकर से ‘दैनिक हिंदोस्थान’ निकला करता था। सारांश में मिशनवादी पत्रकारिता भारतीय पत्रकारिता की मुख्यधारा 20वीं सदी के मध्य तक बनी रही। इसके समानांतर व्यावसायिक पत्रकारिता का भी अस्तित्व था। उस काल में अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया और स्टेट्समैन जैसे प्रमुख पत्र थे। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स जैसे अखबार का प्रकाशन भी उसी समय हुआ, जो स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन करते रहे। देसी व्यावसायिक पत्रों में आज, अमर उजाला, आर्यावर्त, प्रदीप, राष्ट्रदूत और दैनिक नवज्योति जैसे हिंदी दैनिक अखबार व्यावसायिक होते हुए भी स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थक थे।

यहां मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि व्यावसायिक होना बुरा नहीं है। एक ईमानदार प्रोफेशनल होना अच्छी बात है। क्योंकि प्रत्येक व्यवसाय की एक आचार संहिता होती है। मिशनवादी पत्रकारिता मे जहां देश-समाज को सबसे ऊपर ऱखा जाता है वहीं व्यावसायिक पत्रकारिता में लाभ-हानि को सबसे ऊपर रखा जाता है।

प्रश्न : आजादी के बाद भी भारत की पत्रकारिता मिशनरी थी। मालिकों के लिए यह व्यवसाय नहीं था और पत्रकारों के लिए यह करियर नहीं था। बल्कि यह सेवा का माध्यम था?

राम शरण जोशी: 1947 में आजादी मिलने के बाद देश की मिशनवादी पत्रकारिता लुप्तप्राय हो गई। अब व्यावसायिक पत्रकारिता की शुरूआत हो चुकी थी। लेकिन कई अखबारों ने अपनी आचार संहिता के साथ पत्रकारिता का मूलधर्म निभाया। इसमें देशबंधु, प्रदीप, स्वतंत्र भारत, विश्वमित्र जैसे दैनिक अखबारों के मालिक और संपादक में स्वतंत्रता आंदोलन के आदर्श मौजूद थे। वे भौतिक लाभ-हानि को ध्यान में रखने के बावजूद उस दौर की पत्रकारिता में अपने मूलधर्म का पालन करते दिखाई देते हैं। साप्ताहिक पत्रिका जैसे धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान ने जहां साहित्य की सेवा की वहीं लोकपक्ष को भी स्थान दिया। कुल मिलाकर व्यवसाय करते हुए भी पांचवे-छठे दशक में अखबारों ने जमींदारी उन्मूलन, अस्पृश्यता कानून, योजना आयोग का गठन जैसे प्रमुख विमर्श भी पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे। वह नेहरू काल था।

प्रश्न : इंदिरा गांधी के शासन में आने के साथ राजनीति के साथ-साथ पत्रकारिता में गिरवट आई ?

रामशरण जोशी: यह सही है कि इंदिरा काल में पत्रकारिता की कमजोरियां जरूर उजागर हुईं। 1975 में आपातकाल में सेंसरशिप लागू होने पर अखबार और पत्रिकाएं अपना धर्म निभाने में बुदबुदी निकलीं। हिंदी के प्रमुख संपादकों ने अपनी अपेक्षित रीढ़ का परिचय नहीं दिया। उनका मेरुदंड पिलपिला निकला। बाद में पत्रकरिता अपनी पटरी पर जरूर वापस आई और कमोवेश अपने व्यावसायिक धर्म का पालन करती रहीं।

प्रशन : एक समय तक अखबार जन मानस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। लेकिन अब सत्ता के पीछे-पीछे चलने लगे हैं। इस दौर को आप कैसे देखते हैं ?  

राम शरण जोशी:  पत्रकारिता का वर्तमान दौर नितांत व्यावसायिक दौर में हैं। आज पत्रकारिता व्यापारीकरण के दौर से गुजर रही है। इस काल में मुनाफा ही आधारभूत धर्म है। व्यावसायिक धर्म हाशिए पर चला गया है। मिशनवादी पत्रकारिता लघु पत्रिकाओं में सिमट गई है। मैं ये कह रहा हूं कि व्यापारीकरण में मालिक और पत्रकार सत्ता के प्रति जवाबदार बन जाते हैं। यानि सत्ता के सामने अपने मूल धर्म का समर्पण कर देते हैं। आज वैसे ही हो रहा है। मैं यहां एक बात जोड़ना चाहूंगा कि नेहरु काल में पहला प्रेस आयोग की स्थापना हुई थी। दूसरे प्रेस आयोग का गठन इंदिरा काल में हुआ। लेकिन पिछले तीस-पैंतीस सालों में पत्रकारिता के चरित्र में अमूल-चूल परिवर्तन हो चुका है। अतएव आज तीसरे प्रेस आयोग की स्थापना की जरूरत है। क्योंकि इस दौर में मीडिया की चरित्र का और कॉर्पोरेटीकरण हो चुका है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया अस्तित्व में आ चुका है। परंपरागत वेज बोर्ड समाप्त हो चुके हैं। भारत की पत्रकारिता अब अपने तीसरे दौर में है। मुनाफा ही मुख्य आधार हो गया है। आज पत्रकारों को अनुबंध पर रखा जा रहा है। जाहिर है इससे अनिश्चितता और अस्थिरता की तलवार पत्रकारों पर लटकी हुई है। वह हमेशा मालिक और संपादक के दबाव में रहते हैं। जिससे वे पत्रकारिता के धर्म को वांछित स्तर पर नहीं निभा पा रहे हैं। इसीलिए इस दौर में पत्रकारिता का स्तर इतना गिर चुका है कि इसका नामाकरण ‘गोदी मीडिया’ किया गया है। गोदी मीडिया का उद्गम काल 2014 से माना जाता है। इस दौर में भाजपा का शासन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शुरू होता है। जिन्होंने मीडिया के महत्व को बिल्कुल हाशिए पर ला दिया है। इस दौर में मीडिया के विभिन्न माध्यमों का मोनोपॉलराइजेशन बढ़ा है। अर्थात चंद कॉर्पोरेट घरानों के हाथों में प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया समा गए हैं। इसका दुष्प्रभाव देश के लोकतंत्र के चरित्र पर पड़ रहा है। लोकतंत्र की कार्यक्षमता तेजी से घट रही है। मैं ये भी कहना चाहूंगा कि राज्य की “राजनीतिक आर्थिकी –political economy” मीडिया के चरित्र निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। नेहरू से लेकर राजीव गांधी के शासनकाल तक मिश्रित अर्थव्यवस्था का दौर रहा है। लेकिन भूमंडलीकरण की शुरुआत के साथ-साथ राज्य के चरित्र में बदलाव आया है। और इस बदलाव ने मीडिया के चरित्र को गहराई तक प्रभावित किया है।

प्रश्न : आपकी नजर में भारतीय पत्रकारिता का क्या भविष्य है?

राम शरण जोशी:  देश के वर्तमान आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य को सामने रखें तो मीडिया का भविष्य बहुत आशाप्रद दिखाई नहीं देता है। क्योंकि व्यापारीकरण अपने चरम पर है। जब मैं व्यापारीकरण की बात करता हूं तो केवल पत्रकारिता की नहीं आधुनिक विषमताओं के व्यापारीकरण की भी बात करता हूं। पूरे विश्व में चरम दक्षिणपंथ या कॉर्पोरेट पूंजीवाद अपने चरम पर है। बल्कि कॉर्पोरेट सत्ता परंपरागत राज्यसत्ता को विस्थापित न कर दे, इसका खतरा मंडरा रहा है। जाहिर है हमारा मीडिया इससे प्रभावित नहीं होगा, ऐसा मैं नहीं मानता। लेकिन मैं निराशावादी भी नहीं हूं। भारत और विश्व के अनेक देशों में लोकतंत्र के पक्ष में आवाजें उठने लगी हैं। यह आवाजें एक न एक दिन मजबूत होंगी, और याद रखें कोई भी दौर स्थायी नहीं होता है। जब हिटलर और मुसोलिनी का दौर स्थायी नहीं रहा तो वर्तमान दौर भी भारत में स्थायी नहीं रह सकता। मेरा यह पूर्ण विश्वास है कि यह दौर ज्यादा से ज्यादा 5 से 10 साल चलेगा। इसके बाद मीडिया अपनी पूर्व स्वतंत्रता पुन: अर्जित करेगा।

देखिए एक बात औऱ समझ लीजिए। 21 सदी में सूचना क्रांति हो चुकी है। सूचना का विस्फोट हो चुका है। आज के दौर में कोई भी शासक सूचना को लंबे समय तक जनता से छिपा कर नहीं रख सकता। सूचना प्राप्ति के बेशुमार माध्यम अस्तित्व में आ चुके हैं। इसने जनता में चेतना का विस्तार होता जा रहा है। आप देख ही रहे हैं कि इस समय गोदी मीडिया के कई चैनलों की टीआरपी घट चुकी है। मेन स्ट्रीम मीडिया से एक अरुचि सी पैदा हो गई है। इस पृष्ठभूमि में एक आशा की किरण दिखती है कि मीडिया अपनी असली आजादी फिर से हासिल करके रहेगा। निराश होने की आवश्यकता नहीं है।